'प्रोपेगैंडा की धुंध से बाहर निकलें और हकीकत देखें...', ईरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी जनता को खुला पत्र

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिकी लोगों के लिए खुला खत लिखा है. इसमें उन्होंने कहा कि युद्ध के प्रोपेगैंडा की धुंध से बाहर निकलें और हकीकत देखें.

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  • ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिकी जनता से युद्ध के प्रोपेगैंडा से दूर रहने की अपील की
  • पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान ने कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की
  • उन्होंने बताया कि ईरान और अमेरिका के बीच दुश्मनी का आरंभ 1953 के तख्तापलट से हुआ
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तेहरान:

ईरान की अमेरिका और इजरायल के साथ जंग जारी है. इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिकियों के लिए खुला खत लिखा है. इसमें उन्होंने अमेरिकी लोगों से युद्ध के प्रोपेगैंडा के धुंध से बाहर देखने और मनगढ़ंत खतरे को नकारने की अपील की है. इसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या अमेरिका सचमुच 'अमेरिका फर्स्ट' को आगे रख रहा है या फिर वह केवल 'इजरायल के लिए एक प्रॉक्सी' के तौर पर काम कर रहा है, जो आखिरी अमेरिकी सैनिक के बलिदान तक लड़ने के लिए तैयार है.

पेजेश्कियान का यह खुला खत ऐसे समय में आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ ही घंटों में देश को संबोधित करने वाले हैं. माना जा रहा है कि इस संबोधन में ट्रंप कुछ बड़ा ऐलान कर सकते हैं.

अब अमेरिकियों के नाम खुले खत में पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान ने कभी भी युद्ध की शुरुआत नहीं की. अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए पेजेश्कियान ने कहा कि उन्हें राजनीतिक बयानबाजी से परे देखना चाहिए और ईरान के अतीत, वर्तमान और भविष्य की आकांक्षाओं की वास्तविकताओं पर फिर से विचार करना चाहिए. एक ऐसा भविष्य जो टकराव से नहीं, बल्कि सच्चाई, गरिमा और आपसी समझ का हो. 

अपने खुले खत में पेजेश्किया ने यह भी कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच का संबंध सबसे ज्यादा गलत समझे जाने वाले संबंधों में से एक है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईरान ने अपने आधुनिक इतिहास में कभी भी आक्रामकता, विस्तारवाद, उपनिवेशवाद या प्रभुत्व का रास्ता नहीं चुना है और न ही कभी किसी युद्ध की शुरुआत की है.

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पेजेश्कियान ने और क्या कहा?

खत में पेजेश्कियान ने कहा कि ईरानियों के मन में अमेरिका, यूरोप या किसी भी पड़ोसी देश के लिए कोई दुश्मनी नहीं है. उन्होंने कहा कि ईरान को एक खतरे के तौर पर दिखाना न तो ऐतिहासिक सच्चाई के मुताबिक है और न ही आज के देखे जा सकने वाले तथ्यों के मुताबिक. ऐसी सोच ताकतवर लोगों की राजनीतिक और आर्थिक मनमर्जी का नतीजा है. उन्होंने कहा कि फौजी दबदबा बनाए रखने और हथियारों का बाजार चलाने के लिए एक दुश्मन को खड़ा करने की जरूरत है. ऐसे में, अगर कोई खतरा मौजूद नहीं होता, तो उसे गढ़ लिया जाता है.

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उन्होंने कहा कि इसी सोच के तहत, अमेरिका ने अपनी सबसे ज्यादा फौजें, ठिकाने और फौजी ताकत ईरान के आस-पास जमा कर रखी है. एक ऐसा देश जिसने, कम से कम अमेरिका के बनने के बाद से, कभी भी किसी युद्ध की शुरुआत नहीं की है. इन्हीं ठिकानों से शुरू किए गए हाल के अमेरिकी हमलों ने यह दिखा दिया है कि ऐसी फौजी मौजूदगी असल में कितनी खतरनाक होती है. जाहिर है, ऐसी स्थितियों का सामना करने वाला कोई भी देश अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना नहीं छोड़ेगा. ईरान ने जो किया है और जो करता आ रहा है, वह वैध आत्मरक्षा पर आधारित एक नपा-तुला जवाब है, और किसी भी तरह से युद्ध या हमले की शुरुआत नहीं है.

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पेजेश्कियान ने बताया- कैसे हुई दुश्मनी?

पेजेश्कियान ने अपने खत में आगे कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच रिश्ते शुरू में दुश्मनी वाले नहीं थे, और ईरानी और अमेरिकी लोगों के बीच शुरुआती मेल-जोल में कोई दुश्मनी या तनाव नहीं था. हालांकि, अहम मोड़ 1953 का तख्तापलट था. उस तख्तापलट ने ईरान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बिगाड़ दिया, तानाशाही को फिर से लागू कर दिया, और ईरानियों के मन में अमेरिकी नीतियों के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया. 

उन्होंने कहा कि फिर भी, ये सभी दबाव ईरान को कमजोर करने में नाकाम रहे हैं। इसके उलट, देश कई क्षेत्रों में और ज्यादा मजबूत हुआ है. साक्षरता दर तीन गुना बढ़ गई है. इस्लामी क्रांति से पहले के लगभग 30% से बढ़कर आज 90% से ज्यादा हो गई है. उच्च शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है. आधुनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की गई हैं, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं और बुनियादी ढांचे का विकास ऐसी गति और पैमाने पर हुआ है, जिसकी अतीत से कोई तुलना नहीं की जा सकती. 

'क्या ईरान से वाकई कोई खतरा था?'

उन्होंने अपने खत में आगे कहा कि इससे एक बुनियादी सवाल उठता है: आखिर इस युद्ध से अमेरिकी लोगों के किन हितों की सचमुच सेवा हो रही है? क्या ईरान की तरफ से कोई ऐसा वास्तविक खतरा था जो इस तरह के व्यवहार को सही ठहरा सके? क्या बेगुनाह बच्चों का नरसंहार, कैंसर के इलाज की दवाएं बनाने वाली फैक्ट्रियों को तबाह करना, या किसी देश पर बमबारी करके उसे 'पाषाण युग में पहुंचा देने' की शेखी बघारना, अमेरिका की वैश्विक साख को और नुकसान पहुंचाने के अलावा कोई और मकसद पूरा करता है?

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उन्होंने कहा कि क्या यह भी सच नहीं है कि अमेरिका इस आक्रामकता में इजरायल के एक मोहरे के तौर पर शामिल हुआ है? क्या यह सच नहीं है कि इजरायल, ईरान से खतरे का हौव्वा खड़ा करके, दुनिया का ध्यान अपने उन अपराधों से हटाना चाहता है जो उसने फिलिस्तीनियों के खिलाफ किए हैं? क्या यह साफ नहीं है कि इजरायल अब ईरान से तब तक लड़ने का इरादा रखता है जब तक आखिरी अमेरिकी सैनिक और आखिरी अमेरिकी करदाता का डॉलर खर्च न हो जाए और अपने नाजायज हितों को पूरा करने की चाह में अपने भ्रमों का बोझ ईरान, इस क्षेत्र और खुद अमेरिका पर डाल रहा है?

पेजेश्कियान ने आखिरी में कहा कि आज दुनिया एक चौराहे पर खड़ी है. टकराव के रास्ते पर चलना पहले से कहीं अधिक महंगा और व्यर्थ है. टकराव और सुलह के बीच का चुनाव वास्तविक और महत्वपूर्ण है. इसका परिणाम आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को आकार देगा. अपने हजारों वर्षों के गौरवशाली इतिहास में, ईरान ने कई आक्रमणकारियों को मात दी है. इतिहास में उनके केवल कलंकित नाम ही बचे हैं, जबकि ईरान दृढ़, गरिमामय और गौरवान्वित होकर कायम है.

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