- भारत अपनी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA को 2034 तक सेना में शामिल करने की योजना बना रहा है
- भारत छठी पीढ़ी के फाइटर जेट विकास में यूरोप के दो गठबंधनों में शामिल होने पर विचार कर रहा है
- फ्रांस और जर्मनी ने परियोजना को बचाने के लिए मध्यस्थता मिशन शुरू करने का फैसला किया है जिसमें भारत का फायदा है
भारत अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA की युद्धस्तर पर तैयारी कर रहा है. इसके 2034 तक सेना में शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है. मगर, भारत इस मामले में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों से पिछड़ी चुका है. अब वो छठी पीढ़ी के फाइटर जेट में नहीं पिछड़ना चाहता. दुनिया में अभी अमेरिका और चीन फिलहाल छठी पीढ़ी के विमानों पर काम कर रहे हैं. ये दोनों तो भारत को तकनीक या पार्टनर बनाने से रहे, सो भारत ने छठी पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने वाले दो अन्य गठबंधनों पर निगाह रख रखी है.
यूं तो इस बात की चर्चा काफी दिनों से थी, मगर आज रक्षा मंत्रालय ने संसद की स्थायी समिति (रक्षा) को अवगत कराया कि भारत यूरोप के दो वैश्विक कंसोर्टिया द्वारा विकसित किए जा रहे छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में से किसी एक में शामिल होने पर विचार कर रहा है. यह पहली बार है जब भारतीय सरकार की ओर से IAF के इस स्तर पर जुड़ने की इच्छा को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया है. यूरोप में एक तो ब्रिटेन, इटली और जापान UK‑Italy‑Japan का GCAP (Tempest) छठी पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने का प्रोग्राम पाइपलाइन में है और दूसरा Germany‑France और स्पेन का FCAS (Future Combat Air System) प्रोग्राम.
फिर दिक्कत क्या है
हालांकि, भारत की दिक्कत ये थी कि ब्रिटेन-इटली-जापान वाले गुट में जापान को सबसे ज्यादा दिक्कत भारत के जुड़ने से रूस को लेकर थी. जापान को डर था कि कहीं भारत में एस 400 होने की वजह से छठी पीढ़ी के विमानों की तकनीक रूस तक नहीं पहुंच जाए. हालांकि, जापान और भारत अच्छे मित्र हैं, जापान चाहता है कि भारत इस गुट से जुड़े, लेकिन उसके कुछ सवाल हैं. वहीं फ्रांस वाले गुट में दिक्कत ये थी कि फ्रांस और जर्मनी आपस में ही उलझ गए थे. दोनों आपस में तकनीक शेयर करने को लेकर झगड़ रहे थे, इस कारण भारत इसमें भी झिझक रहा था.
तो गुड न्यूज क्या है
मगर आज फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने खुशखबरी दी है. मैक्रों ने गुरुवार को जर्मनी के साथ छठी पीढ़ी के फाइटर जेट कार्यक्रम को बचाने के लिए अंतिम प्रयास की घोषणा करते हुए कहा कि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने संबंधित कंपनियों के बीच मध्यस्थता करने के लिए एक "मिशन" पर सहमति जताई है. फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के बीच अगली पीढ़ी के फाइटर जेट का निर्माण फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन और एयरबस के बीच मतभेदों के कारण लड़खड़ा गया है.
कैसे बनी बात
ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन में पत्रकारों से बात करते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा, "हमने आने वाले हफ्तों में एयरबस और डसॉल्ट को करीब लाने और आम सहमति तक पहुंचने के लिए एक मिशन शुरू करने का फैसला किया है." यह घोषणा मैक्रों और मर्ज़ के बीच बुधवार को बेल्जियम की राजधानी में रात्रिभोज के दौरान हुई बातचीत के बाद हुई है, जिसमें परियोजना के भविष्य पर राजनीतिक निर्णय को एक बार फिर स्थगित कर दिया गया, जो मूल रूप से पिछले दिसंबर में होना था. जर्मन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (बीडीएलआई) ने इस घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अप्रैल के मध्य तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. बीडीएलआई की सीईओ मैरी-क्रिस्टीन वॉन हैन ने कहा, "यह एक महत्वपूर्ण संकेत है और जर्मन उद्योग के प्रति एक मूल्यवान प्रतिबद्धता है कि सरकार, फ्रांस के साथ मिलकर, अब शीघ्र समाधान के लिए प्रयासरत है. महीनों की अनिश्चितता के बाद, अब एक ऐसे व्यवहार्य समाधान की आवश्यकता है जो जर्मनी के रक्षा, औद्योगिक और आर्थिक हितों की भी पूर्ति करे."
दोनों कंपनियों में क्या है दिक्कत
फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (एफसीएएस) कार्यक्रम 2017 में जर्मनी और स्पेन द्वारा उपयोग किए जाने वाले राफेल जेट और यूरोफाइटर विमानों के प्रतिस्थापन के लिए शुरू किया गया था. इसे अक्सर फ्रांस और जर्मनी के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग का सूचक माना जाता है, क्योंकि यूरोपीय संघ की ये दोनों महाशक्तियां रूस और अमेरिका की अस्थिर सुरक्षा प्रतिबद्धता के सामने एकजुट होकर खड़ी होने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के बीच कड़वे मतभेदों ने इस परियोजना को खतरे में डाल दिया है. इस महीने डसॉल्ट ने एयरबस पर परियोजना को विफल करने का आरोप लगाया, जिसके बारे में मर्ज़ ने फरवरी में संकेत दिया था कि बर्लिन इसे पूरी तरह से छोड़ सकता है.
भारत के लिए क्यों गुड न्यूज
मैक्रों ने गुरुवार को कहा, "मुझे इस परियोजना पर पूरा भरोसा है. मुझे लगता है कि यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. फ्रांस और जर्मनी की सशस्त्र सेनाएं, साथ ही इसमें शामिल कंपनियां भी इसे महत्वपूर्ण मानती हैं, लेकिन बाद वाली कंपनियां "समझौते पर नहीं पहुंच पा रही हैं. हमारा काम उन्हें सहमत कराना है." आपको बता दें कि एयरबस कंपनी मुख्य रूप से फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और यूनाइटेड किंगडम के साझा सहयोग से बनी है. अब अगर फ्रांस और जर्मनी के बीच सहयोग बन जाता है तो भारत के लिए फैसला लेना आसान हो जाएगा कि वो ब्रिटेन वाले गुट में शामिल होगा या फ्रांस वाले गुट में.
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