- SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में विश्व का सैन्य खर्च दो दशकों में लगातार ग्यारहवें वर्ष बढ़ा है
- अमेरिका का सैन्य खर्च 2025 में 7.5 प्रतिशत घटकर 954 अरब डॉलर रहा लेकिन यूरोप और एशिया में खर्च में वृद्धि हुई
- रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोप ने अपने सैन्य खर्च में 14 प्रतिशत वृद्धि कर 864 अरब डॉलर कर दिया है
रूस-यूक्रेन में 4 साल से जंग चल रही है... अमेरिका-इजरायल और ईरान भी लड़ रहे हैं... चीन हर कभी ताइवान को धमकाता रहता है... भारत और पाकिस्तान में भी तनाव बना ही रहता है. दुनिया में कई जगह चल रही जंग और जंग के खतरों के बीच स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नई रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया है कि दुनियाभर में सेना पर होने वाला खर्च लगभग 3 फीसदी बढ़ गया है. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने यूक्रेन से हाथ खींच लिए तो इससे यूरोप पर बोझ बढ़ गया. यूरोप को एक साल में सवा 9 लाख करोड़ रुपये ज्यादा खर्च करना पड़ा. वहीं, अमेरिका का सैन्य खर्च कम हो गया.
सैन्य खर्च यानी मिलिट्री एक्सपेंडिचर को लेकर SIPRI ने ये रिपोर्ट जारी की है. इसके मुताबिक, 2025 में दुनियाभर की सरकारों ने मिलिट्री पर 2.9 ट्रिलियन डॉलर खर्च किया है, जो 2024 की तुलना में 2.9% ज्यादा है.
दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका के सैन्य खर्च में कमी आई है लेकिन यूरोप ने अपना खर्च 14% और एशिया और ओशिनिया ने 8.1% खर्च बढ़ा दिया है. रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में अब भी मिलिट्री पर सबसे ज्यादा खर्च अमेरिका, चीन और रूस करते हैं. तीनों ने मिलकर 1.48 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए.
लगातार 11वें साल मिलिट्री पर खर्च बढ़ा
SIPRI की रिपोर्ट बताती है कि 2025 में मिलिट्री पर खर्च बढ़कर 2.9 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 272 लाख करोड़ रुपये) हो गया. यह लगातार 11वां साल था, जब इसमें बढ़ोतरी हुई है. इतना ही नहीं, अब दुनियाभर के देश अपनी GDP का 2.5% खर्च मिलिट्री पर कर रहे हैं, जो 2009 के बाद सबसे ज्यादा है.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2024 में मिलिट्री पर खर्च 9.7% बढ़ा था, जबकि 2025 में यह 2.9% ही बढ़ा. इसकी बड़ी वजह अमेरिका के सैन्य खर्च में आई कमी है. हालांकि, अमेरिका से इतर बाकी मुल्कों में सैन्य खर्च में 9.2% की बढ़ोतरी हुई है.
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अमेरिका का खर्च कितना कम हुआ?
2024 की तुलना में 2025 में अमेरिका का सैन्य खर्च 7.5% कम रहा. 2025 में अमेरिका ने अपनी सेना पर 954 अरब डॉलर का खर्च किया. इसका बड़ा कारण यह था कि इस साल अमेरिका ने यूक्रेन के लिए कोई नई सैन्य मदद को मंजूरी नहीं दी. जबकि, इससे पहले तीन सालों में कुल 127 अरब डॉलर की मदद दी गई.
हालांकि, अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध में अपना वर्चस्व बनाए रखने और इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकने के लिए सैन्य क्षमताओं में खर्च बढ़ाया है.
SIPRI के प्रोग्राम डायरेक्टर नान तियान ने कहा कि अमेरिका में सैन्य खर्च में यह कमी कुछ समय के लिए है. उन्होंने आगे कहा कि 2026 के लिए अमेरिकी संसद ने खर्च बढ़ाकर 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा करने की मंजूरी दी है. 2027 में यह बढ़कर 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है.
यूक्रेन के कारण यूरोप का खर्च बढ़ा
अमेरिका का खर्च जहां कम हुआ है, वहीं यूरोप में 14% बढ़ गया है. 2024 में यूरोप ने 694 अरब डॉलर खर्च किए थे. 2025 में यह बढ़कर 792 अरब डॉलर हो गया. इस हिसाब से ट्रंप के आने के बाद यूरोप का सैन्य खर्च 98 अरब डॉलर बढ़ा है. भारतीय करंसी में यह रकम 9.25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होती है. हालांकि, अगर इसे आज के हिसाब से देखें तो यह खर्च 864 अरब डॉलर होता है.
2025 में रूस का मिलिट्री पर खर्च 5.9% बढ़कर 190 अरब डॉलर हो गया. वहीं, यूक्रेन ने अपना खर्च 20% बढ़ाकर 84.1 अरब डॉलर कर दिया है. यूक्रेन अपनी GDP का 40% खर्च सिर्फ सेना पर कर रहा है.
रिपोर्ट कहती है कि युद्ध के कारण रूस और यूक्रेन, दोनों का ही खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. अगर युद्ध जारी रहता है तो 2026 में उनका खर्च बढ़ने की पूरी संभावना है. इसकी वजह यह है कि रूस की तेल बिक्री से होने वाली कमाई लगातार बढ़ रही है और यूक्रेन को भी यूरोप से एक बड़ा कर्ज मिलने की उम्मीद है.
SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में NATO के 29 यूरोपीय सदस्यों ने मिलकर कुल 559 अरब डॉलर खर्च किए. इनमें से 22 देश ऐसे थे, जिनका मिलिट्री खर्च उनकी GDP का कम से कम 2% था. जर्मनी का खर्च सबसे ज्यादा बढ़ा. जर्मनी ने अपना खर्च 24% बढ़ाकर 114 अरब डॉलर कर दिया है. स्पेन का खर्च 50% बढ़कर 40.2 अरब डॉलर हो गया. 1994 के बाद पहली बार स्पेन का खर्च उसकी GDP का 2% से ज्यादा पहुंच गया है.
रिपोर्ट कहती है कि 2025 में NATO सदस्यों का मिलिट्री पर होने वाला खर्च 1953 के बाद किसी भी समय की तुलना में सबसे तेजी से बढ़ा है.
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मिडिल ईस्ट ने कितना खर्च किया?
तनाव और संघर्ष के बावजूद मिडिल ईस्ट का सैन्य खर्च 2024 की तुलना में 2025 में सिर्फ 0.1% ही बढा. इजरायल के अलावा कई और देशों ने अपना खर्च बढ़ाया है.
इजरायल का सैन्य खर्च 4.9% बढ़कर 48.3 अरब डॉलर हो गया. यह खर्च और ज्यादा हो सकता था अगर जनवरी 2025 में हमास के साथ समझौता नहीं हुआ होता. इसके अलावा, तुर्की का सैन्य खर्च 2025 में 7.2% बढ़कर 30 अरब डॉलर हो गया. इसकी बड़ी वजह इराक, सोमालिया और सीरिया में चल रहे उसके मिलिट्री ऑपरेशन थे.
ईरान का खर्च लगातार दूसरे साल कम हुआ. ईरान के सैन्य खर्च में 2025 में 5.6% की गिरावट आई और यह 7.4 अरब डॉलर रह गया. इसकी वजह ईरान की महंगाई है. 2025 में ईरान में महंगाई दर 42% के स्तर पर पहुंच गई थी. इसकी एक वजह यह भी है कि ईरान अपना खर्च कम करके दिखाता है.
भारत-चीन-पाकिस्तान ने कितना खर्च किया?
2025 में एशियाई देशों ने भी अपना सैन्य खर्च जबरदस्त तरीके से बढ़ाया है. चीन ने अपना खर्च 7.4% बढ़ाकर 336 अरब डॉलर कर दिया. यह लगातार 31वां साल था, जब चीन ने अपना सैन्य खर्च बढ़ाया.
भारत और पाकिस्तान के खर्च में भी बढ़ोतरी हुई है. भारत दुनिया का 5वां देश है, जो अपनी सेना पर सबसे ज्यादा खर्च करता है. 2025 में भारत ने अपनी सेना पर 92.1 अरब डॉलर खर्च किया, जो 2024 की तुलना में 8.9% ज्यादा है. वहीं, पाकिस्तान का खर्च 11% बढ़र 11.9 अरब डॉलर हो गया.
भारत और पाकिस्तान का यह खर्च ऐसे समय बढ़ा, जब पिछले साल दोनों के बीच सैन्य टकराव बढ़ गया था. पहलगाम अटैक और फिर ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान में 4 दिन तक जबरदस्त संघर्ष हुआ था. दोनों के बीच जंग के हालात बन गए थे. बाद में पाकिस्तान की अपील पर सीजफायर हुआ था.
जापान ने भी अपना सैन्य खर्च 9.7% बढ़ाकर 62.2 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया, जो उसकी GDP का 1.4% है. यह 1958 के बाद सबसे ज्यादा है. चीन के साथ तनाव के चलते ताइवान ने भी अपनी खर्च 14% बढ़ाकर 18.2 अरब डॉलर कर दिया. यह 1988 के बाद हुई सबसे ज्यादा बढ़ोतरी है.
2025 में क्यों बढ़ा इतना खर्च?
जिस तरह से लगातार सैन्य खर्च बढ़ रहा है, उससे पता चलता है कि दुनिया अब हथियारों और सेना पर कितना दांव लगा रही है.
SIPRI के रिसर्चर शियाओ लियांग ने बताया कि '2025 में सैन्य खर्च में फिर से बढ़ोतरी हुई, क्योंकि दुनियाभर में युद्ध के कारण अनिश्चितता और जियोपॉलिटिक्स में उथल-पुथल बनी रही. इस कारण देशों ने बड़े पैमाने पर हथियार जुटाए.'
उन्होंने कहा कि जिस तरह के हालात अभी बने हुए हैं, उससे सैन्य खर्च में यह बढ़ोतरी 2026 और उसके बाद भी जारी रहेगी.
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