फ्रांस में कई हफ्तों से चले आ रहे स्कूली छात्रों के प्रदर्शनों के बाद अब देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. राजधानी पेरिस की सड़कों पर धुएं का गुबार, पुलिस की गाड़ियों के सायरन और गुस्से से भरी पब्लिक के नारे सुने जा रहे हैं. प्रदर्शनों के दौरान और उसके बाद युवाओं के गुट पूरे शहर में घूम घूम कर पुलिस से भिड़ रहे थे. पेरिस, मासेय, नीस, नॉट, बोर्दो, लिमोज, लील, तुलूज और स्ट्रासबुर्ग में दुकानों में डकैती हो रही है. कई शहरों में आगजनी की जा रही है. लोग शहर में दुकानों को दिनदहाड़े लूट रहे हैं.
औपनिवेशिक दौर में फ्रांस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा औपनिवेशिक साम्राज्य था. उसका शासन अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, कैरेबियन, प्रशांत द्वीपों और उत्तरी अमेरिका के बड़े हिस्सों तक फैला हुआ था. इन उपनिवेशों से कच्चा माल, कृषि उत्पाद और श्रम लेकर फ्रांस ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया. इतिहासकार इस प्रक्रिया को 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' यानी उपनिवेशों की संपत्ति का व्यवस्थित दोहन बताते हैं.
फ्रांस की समृद्धि में उसकी उपनिवेशों की बड़ी भूमिका थी. कैरेबियन में स्थित हैती (तब सेंट-डोमिंग) चीनी और कॉफी उत्पादन का केंद्र था, जहां दास श्रम के दम पर भारी मुनाफा कमाया गया.
वहीं अल्जीरिया, पश्चिम अफ्रीका और इंडोचाइना (वियतनाम, लाओस, कंबोडिया) से संसाधन निकाले गए और इन क्षेत्रों को फ्रांसीसी उत्पादों के बाजार के तौर पर विकसित किया गया.
हैती को तो आजादी मिलने के बाद भी 1825 में फ्रांस को भारी 'मुआवजा' चुकाने के लिए मजबूर किया गया और वह दशकों तक कर्ज के बोझ तले दबा रहा. कई इतिहासकार इसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक लूटों में से एक मानते हैं.
आज भी फ्रांस दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है. लक्जरी फैशन उद्योग में L'Oréal, Louis Vuitton, Chanel और Hermès जैसे ब्रांड उसका वैश्विक दबदबा बनाए हुए हैं. एयरोस्पेस क्षेत्र में Airbus का मुख्यालय फ्रांस में है, जबकि Dassault Aviation का राफेल लड़ाकू विमान दुनिया के कई देशों को निर्यात किया जाता है.
पर्यटन, परमाणु ऊर्जा, कृषि और तकनीक उद्योग भी उसकी अर्थव्यवस्था की गहरी पैठ है. इसके बावजूद बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत और सामाजिक असंतोष ने हाल के सालों में फ्रांस में कई बार विरोध प्रदर्शनों और अशांति को जन्म दिया है.
विडंबना देखिए कि एक समय उपनिवेशों की संपत्ति से समृद्ध हुआ फ्रांस आज ऐसी स्थिति में है जहां महंगाई और आर्थिक दबावों से परेशान लोग दुकानों में लूटपाट कर रहे हैं.
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लेकिन सवाल है कि फ्रांस में प्रदर्शनकारी इतना उग्र प्रदर्शन कर क्यों रहे हैं?
दरअसल, इसकी दो मुख्य वजहें है. अव्वल तो देश में छात्र और शिक्षक स्कूल की बदहाल स्थिति और शिक्षा बजट में कटौती का विरोध कर रहे हैं. फ्रांस में ये छात्र आंदोलन पिछले महीने पेरिस में स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ था, फिर इसका दायरा बढ़कर पूरे देश में फैल गया.
दूसरा और बड़ा कारण है कि फ्रांस में जीवन यापन के खर्चों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. फिर मध्य पूर्व संकट ने महंगाई में आग में घी की तरह काम किया. यूरोप के ज्यादातर देश इस महंगाई से त्रस्त हैं. लोगों की क्रय शक्ति यानी परचेंजिक पावर लगातार गिर रही है. फ्रांस के लोगों का कहना है कि जी तोड़ मेहनत के बावजूद बचत नहीं हो रही है और किराए आसमान छू रहे हैं.
दुनिया जिस फ्रांस को एक खुशहाल, अमीर और तरक्कीपसंद मुल्क के तौर पर देखती आई है, वह आज अपने ही आर्थिक अंतर्विरोधों के बोझ तले छटपटा रहा है. मध्यम वर्ग की सिकुड़ती जेबें, ईंधन और रोजमर्रा की चीजों की असहनीय महंगाई, सोच से भी परे सरकारी कर्ज ने फ्रांस को एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी का हर रास्ता बेहद कठिन और नामुमकिन सा नजर आता है.
फ्रांस की मीडिया क्या कहती है?
फ्रांस के भीतर इस आर्थिक और सामाजिक संकट को कितनी गंभीरता से देखा जा रहा है, इसका सबसे सटीक अंदाजा वहां के बड़े अखबारों के संपादकीय पन्नों से लगाया जा सकता है.
अखबार 'ले मोंद' लगातार अपने विश्लेषणों में इस बात को लिख रहा है कि देश 'महंगाई और बदहाली' के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है जहां से निकलना मुहाल है. अखबार के आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली मामूली राहतें केवल गहरे जख्म पर मरहम लगाने जैसी हैं, जबकि अंदरूनी अंग काम करना बंद कर रहे हैं.
अखबार ने आगाह किया है कि अगर सरकार ने कर्ज घटाने के लिए सरकारी सुविधाओं को बंद किया या जनता पर नए टैक्स लगाए, तो फ्रांस में एक गृहयुद्ध जैसे हालात बन सकते हैं.
फ्रांस की प्रमुख अखबार 'ले फिगारो' संकट की जड़ को सियासी नाकामी और बजट की फिजूलखर्ची में देखता है. ले फिगारो ने तीखी आलोचना करते हुए लिखा है कि फ्रांस दशकों से अपनी औकात से ज्यादा खर्च कर रहा है. अखबार के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार अब फ्रांस को शक की निगाह से देख रहे हैं. कभी यूरोप की रहनुमाई करने वाला फ्रांस आज कर्ज के बाजार में स्पेन और पुर्तगाल जैसे उन देशों से भी अधिक जोखिम भरा माना जा रहा है, जिन्हें कभी माली रूप से बेहद कमजोर समझा जाता था.
फ्रांस की अपनी रिपोर्ट में कहा गया कि देश में 10 से 20 फीसदी सरकारी स्कूलों की इमारत जर्जर हो रही है. फ्रांस का 2027 का शिक्षा बजट 64 अरब यूरो है.
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एनर्जी प्रतिबंधों की भारी कीमत फ्रांस ने चुकाई
दुनिया भर में तेल और गैस की किल्लत बीते कुछ महीनों से जारी है. ईरान और अमेरिका के युद्ध की वजह से ये किल्लत लगातार बढ़ती चली जा रही है. होर्मुज और लाल सागर में तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने का खामियाजा फ्रांस पर भी पड़ा. लेकिन कुटनीतिक दांव उल्टा पड़ने की वजह से फ्रांस इस मुसीबत से उबर नहीं पा रहा है.
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के साथ ही फ्रांस ने यूरोप के दूसरे देशों के साथ मिलकर रूस से आने वाले सस्ते कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी. आर्थिक रूप से यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था.
इस महंगे ईंधन ने फ्रांस की बड़ी फैक्ट्रियों, रासायनिक कारखानों और विनिर्माण उद्योगों की लागत को इतना बढ़ा दिया कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुकाबले से बाहर होने लगे. इसके साथ ही, फ्रांस का परमाणु बिजली ढांचा भी इस नाजुक वक्त पर दगा दे गया. फ्रांस अपनी सत्तर फीसदी बिजली परमाणु रिएक्टरों से बनाने का दम भरता था, लेकिन देखरेख की कमी और पुराने पड़ चुके रिएक्टरों में खराबी आने के कारण संकट के ऐन वक्त पर उसके आधे से ज्यादा परमाणु संयंत्र बंद पड़े थे. जिस समय फ्रांस को दूसरों को बिजली बेचकर मुनाफा कमाना चाहिए था, उस समय उसे पड़ोसी देशों से बेहद महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही थी. इस नाकामी की वजह से अंतिम बोझ आम जनता की जेब पर पड़ा.
फ्रांस पर कर्ज बेतहाशा बढ़ा है. पिछले कुछ तिमाही के आंकड़े.
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तो अब जवाब देते हैं कि भारत कैसे इस मुश्किल से निकला?
मध्य पूर्व का संकट और तेल के बढ़ते दाम भारत के लिए फ्रांस से कहीं ज्यादा खतरनाक होने चाहिए थे, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने इस क्राइसिस का मुकाबला बेहद सूझबूझ से किया, जबकि फ्रांस इसके सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गया.
भारत की स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति रही. जब पश्चिमी मुल्क रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा रहे थे, तब भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव को पूरी तरह खारिज करते हुए अपने देश के हितों को सर्वोपरि रखा. भारत ने रूस से भारी छूट पर मिलने वाले कच्चे तेल को खरीदना शुरू किया और उसका आयात कई गुना बढ़ा दिया. जहां फ्रांस जिद में आकर महंगी अमेरिकी गैस खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था का दिवाला निकाल रहा था, वहीं भारत ने सस्ते रूसी तेल के दम पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाया और अपने रिफाइनिंग उद्योग को भारी मुनाफा कमा कर दिया.
सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों के घाटे को खुद संभाला और जरूरत पड़ने पर टैक्स में कटौती करके आम जनता को वैश्विक महंगाई के सीधे झटके से बचा लिया. इसके विपरीत, फ्रांस ने अपने खाली हो चुके खजाने को भरने के लिए ईंधन पर टैक्स बढ़ा दिए. इससे जनता का सब्र पूरी तरह टूट गया.
भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर से घरेलू मांग यानी Domestic Consumption पर टिकी है. हमारी जीडीपी का सत्तर फीसदी हिस्सा देश के भीतर होने वाली खरीद-बिक्री से आता है. जब तक देश के भीतर मांग मजबूत है, तब तक भारत के बाजार और खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा. इसके उलट, फ्रांस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वैश्विक आपूर्ति और यूरोपीय संघ के बाजारों पर निर्भर है.
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