पाकिस्तान के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनना चाहते नवाज शरीफ? भाई शहबाज शरीफ को बढ़ाया आगे

पाकिस्तान में बिखड़े हुए जनादेश को समेत तक सरकार बनाने का फ़ॉर्मूला तय हो गया है. जैसा कि आपको सबसे पहले एनडीटीवी ने बताया था कि नवाज़ शरीफ़ नहीं, बल्कि शहबाज शरीफ़ को पीएम बनने की संभावना अधिक है.

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शहबाज शरीफ़ को पीएम बनने की संभावना अधिक है.

पाकिस्तान में चुनाव नतीजे साफ होने के बाद अब सरकार बनाने की कवायद जारी है. पीएमएल-एन सरकार बनाने जा रही है. लेकिन नवाज शरीफ पीएम नहीं बनने जा रहे. उनके भाई  शहबाज शरीफ पीएम पद के दावेदार बताए गए हैं. पीपीपी ने इस बार सरकार में शामिल होने से साफ मना कर दिया है. लेकिन वो पीएमएलएन को बाहर से समर्थन देगी. मुद्दा आधारित समर्थन देगी. नेशनल असेंबली के साथ साथ पंजाब और बलूचिस्तान प्रांतीय असेंबलियों के नतीजे भी त्रिशंकु हैं. ऐसे में नेशनल असेंबली के साथ साथ यहां भी सत्ता के बंटवारे का फ़ार्मूला तय हुआ है.

नेशनल असेंबली में क्या फ़ॉर्मूला बना है?
पाकिस्तान में बिखड़े हुए जनादेश को समेत तक सरकार बनाने का फ़ॉर्मूला तय हो गया है. जैसा कि आपको सबसे पहले एनडीटीवी ने बताया था कि नवाज़ शरीफ़ नहीं, बल्कि  शहबाज शरीफ़ को पीएम बनने की संभावना अधिक है.  शहबाज शरीफ़ प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे इसका औपचारिक ऐलान कर दिया गया है. वे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के समर्थन से पीएम बनेंगे. पीपीपी उनकी सरकार में शामिल नहीं होगी, बल्कि बाहर से समर्थन देगी. इसका ऐलान बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने खुद प्रेस कॉफ़्रेंस में किया.

पीपीपी का कोई मंत्री नहीं बनेगा. ये भी कहा कि पीपीपी देश में अस्थिरता और अराजकता नहीं चाहती और न ही तुरंत दुबारा चुनाव चाहती है. इसलिए ये फ़ैसला किया गया है. बिलावल ने ख़ुद को पीएम पद के रेस से भी बाहर बताय और कहा कि उनकी पार्टी के पास नंबर नहीं हैं. इसलिए वे पीएम नहीं बन सकते. तो सवाल है कि पीपीपी को सत्ता में किस रूप में भागीदारी मिलेगी? पीपीपी के नेता आसिफ़ अली ज़रदारी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया जा सकता है. बिलावल ने इस बात का ऐलान कर दिया है कि आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेंगे. मौजूदा राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी का कार्यकाल पिछले साल ही ख़त्म हो गया. आम चुनाव की वजह से ही राष्ट्रपति चुनाव रुका हुआ था. संघीय और प्रांतीय असेंबलियों में शपथ के बाद इलेक्टोरल कॉलेज पूरा होते ही पाकिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव होना है. लिहाजा, जरदारी का इंतजार अधिक लंबा नहीं होने वाला है. राष्ट्रपति की कुर्सी के अलावा पीपीपी संसदीय पदों पर भी अपने सांसदों को बिठाएगी.

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 पाकिस्तान में सत्ता बंटवारे में प्रांतीय स्तर पर क्या फ़ॉर्मूला तय किया गया है?
पंजाब की 297 सीटों में से पीएमएलन को 138 सीट मिली है. पीपीपी को 10 और एमक्यूएम को 7. पीएमएल-एन को यहां भी पीपीपी और एमक्यूएम का समर्थन चाहिए. मरियम नवाज को पंजाब के मुख्यमंत्री के लिए आगे किया गया है. पंजाब में गवर्नर का पद पीपीपी को मिलेगा.

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सिंध में 130 सीटों पर चुनाव हुए हैं. यहां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने 83 सीट जीत कर अपनी सरकार बनना सुनिश्चित किया है. पीएमएल-एन का समर्थन भी उसे मिलेगा. एमक्यूएम यहां गवर्नर का पद चाहती है. लेकिन पीपीपी से उसकी तनातनी बरक़रार है.

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ख़ैबर पख़्तूख्वा में 115 सीटों पर चुनाव हुए हैं. पीटीआई के 80 आज़ाद उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. इतना नंबर होने के बाद भी पीटीआई अपने बूते सरकार नहीं बना सकती है. आरक्षित सीटों के कोटा के लिए उसे रजिस्टर्ड पार्टी के बैनर तले आना होगा. पीटीआई जमात-ए-इस्लामी से समझौता कर सरकार बनाएगी. जमात-ए-इस्लामी ने 3 सीट जीतीं है.

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बलूचिस्तान की चुनाव 51 सीटों पर हुए हैं. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सबसे अधिक 11 सीट मिली है. पीएमएलएन को 9 सीट मिली है और JUIF को 8. यहां पीपीपी ने अपने नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा किया है.

 नवाज शरीफ क्यों नहीं बनना चाहते हैं प्रधानमंत्री?
बाहर से समर्थन पर टिकी सरकार अगर जल्दी गिर जाती है तो फिर पाकिस्तान में फिर चुनाव होना लाज़िमी है. नवाज अपनी क़िस्मत तब आज़मा सकते हैं. इसलिए उन्होंने  शहबाज शरीफ़ का नाम आगे कर दिया है. जब नवाज़ लंदन में थे तो  शहबाज शरीफ़ गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुके हैं जिसमें पीपीपी, एमक्यूएम और पीएमएलक्यू समेत 14 पार्टियां थीं. इस बार पीपीपी ने बाहर से समर्थन देने का फ़ैसला किया है. बिलावल ख़ुद पीएम बनना चाह रहे थे. लेकिन वो हो नहीं पा रहा. लिहाजा मौका देख कर पीपीपी कभी भी समर्थन वापसी का ऐलान कर सकती है. ऐसे में फिर से चुनाव हो सकता है. तब तक  शहबाज शरीफ़ सरकार अगर फेल साबित हुई तो ठीकरा  शहबाज शरीफ़ के सिर जाएगा और तब नवाज़ अपना चेहरा लेकर आगे सकते हैं.

जरदारी क्यों बोल रहे हैं इमरान के लिए मीठे बोल?
आसिफ अली जरदारी जो कि 2008 से 2013 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके हैं. इस बार फिर राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनने जा रहे हैं. उनको नेशनल असेंबली और सीनेट के सदस्यों के साथ साथ प्रांतीय असेंबलियों में भी वोट चाहिए होगा. 336 सीटों वाली नेशनल असेंबली में जहां पीएमएल-एन के नेतृत्व वाली सरकार को बहुत कम मार्जिन से बहुमत हासिल होगा. पीटीआई के आज़ाद उम्मीदवार नेशनल में सबसे अधिक तादाद में चुन कर आए हैं. ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव की वोटिंग में भी बड़ी चुनौती आ सकती है. राष्ट्रपति चुनाव में प्रांतीय असेंबलियों के कुल 749 सीटे हैं. लेकिन चाहे वो बलूचिस्तान हो या फिर पंजाब हर जगह प्रांत में इलेक्टॉरल कॉलेज की वैल्यू 65 की है. इनमें खैबर पख़्तूख्वा जहां इमरान के उम्मीदवारों ने अधिकतर सीटें जीती हैं. वहां भी 65 वोट है.

यही वजह है कि आसिफ़ अली ज़रदारी ने इमरान खान और उनकी पार्टी की तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए रिकॉसिलिएशन यानि कि मेलमिलाप की बात की है. मक़सद राष्ट्रपति का चुनाव जीतने की राह आसान करना है. इसलिए जब पीएमएल-एन, पीपीपी, एमक्यूएम और पीएमएल क्यू की साझा प्रेस कांफ्रेंस हो रही थी तो ज़रदारी ने रिकॉशिलिएशन पर ज़ोर दिया. इमरान खान ने जेल से बयान जारी कर कहा है कि वह बाकी पार्टियों से बात करने को तैयार हैं. लेकिन उनकी पार्टी पीएमएल-एन, पीपीपी और एमक्यूएम जैसी पार्टी से कोई समझौता नहीं करेगी. लेकिन देखना होगा कि ज़रदारी की अपील का कोई असर पड़ता है या नहीं.

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