बेंजामिन नेतन्याहू: कमांडो ऑपरेशन से लेकर सत्ता में ऐतिहासिक वापसी की दिलचस्प कहानी

Benjamin Netanyahu का जीवन सैन्य कार्रवाई, पारिवारिक त्रासदी, कूटनीतिक टकराव और चुनावी वापसी से अटा पड़ा है. चलिए उनके जीवन की कुछ दिलचस्प वाकयों से समझते हैं कमांडो ऑपरेशन से लेकर सत्ता में ऐतिहासिक वापसी तक की उनकी पूरी कहानी.

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  • नेतन्याहू युवावस्था में इजरायल की प्रतिष्ठित विशेष बल इकाई सायरेट मतकल के कमांडो रहे.
  • नेतन्याहू की 1972 में अपहृत हुए एक विमान के 100 यात्रियों को बचाने में भी भूमिका रही.
  • Massachusetts Institute of Technology से बिजनेस और आर्किटेक्ट की पढ़ाई की और इजरायल के पीएम बने.
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बात 1968 की है, तब बेंजामिन नेतन्याहू की स्कूली शिक्षा अमेरिका में चल रही थी. उसी साल इजराइल-लेबनान के बीच संघर्ष शुरू हो गया था. रिपोर्टों के अनुसार, इजराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तब स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ कर सेना में शामिल हुए. उसी दौरान इजरायल ने ऑपरेशन गिफ्ट चलाया था, बताया जाता है कि इस गुप्त ऑपरेशन में बेंजामिन नेतन्याहू की सक्रिय भागीदारी हुई थी. नेतन्याहू तब 19 साल के थे और उन्होंने एक युवा कमांडो के रूप में इस गुप्त मिशन में भाग लिया था.

नेतन्याहू ने इस यूनिट में पांच साल (1967-1972) बिताए और कप्तान के पद तक पहुंचे. उन्होंने बाद में 1972 में साबेना फ्लाइट 571 के बचाव अभियान में भी हिस्सा लिया, जहां उनके कंधे में गोली लगी थी. बाद में नेतन्याहू की 1972 में अपहृत हुए एक विमान के 100 यात्रियों को बचाने में भी भूमिका रही.

नेतन्याहू युवावस्था में इजरायल की प्रतिष्ठित विशेष बल इकाई सायरेट मतकल के कमांडो रहे. स्पेशल ऑपरेशंस और इंटेलिजेंस यूनिट सायरेट मतकल टोही मिशन, बंधकों के बचाव, और आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए मशहूर है. यह वही यूनिट है जिसने 1976 में युगांडा के एंटेबे एयरपोर्ट पर बंधकों को छुड़ाने का साहसिक अभियान चलाया, जिसे दुनिया ऑपरेशन एंटेबे के नाम से जानती है. इस ऑपरेशन का नेतृत्व उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू ने किया था. मिशन सफल रहा, लेकिन योनातन नेतन्याहू की मौत हो गई. यह घटना बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक जीवन में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की सोच की पृष्ठभूमि मानी जाती है. बाद के वर्षों में उनका पूरा राजनीतिक नैरेटिव राष्ट्रीय सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमता रहा.

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अमेरिका से रिश्ता और धाराप्रवाह अंग्रेजी

नेतन्याहू ने अपनी पढ़ाई अमेरिका में की. वे  Massachusetts Institute of Technology से बिजनेस और आर्किटेक्ट की पढ़ाई की और कुछ समय के लिए बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में भी काम किया. अंग्रेजी पर उनकी पकड़ और अमेरिकी संस्कृति की समझ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग पहचान दी. अमेरिकी कांग्रेस को उन्होंने कई बार संबोधित किया है. खास तौर पर 2015 में ईरान परमाणु समझौते के विरोध में दिया गया उनका भाषण अमेरिकी राजनीति में भी बड़ा मुद्दा बना.

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Photo Credit: AFP

सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड

नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्री रहे हैं. उनका पहला कार्यकाल 1996 में शुरू हुआ. उसके बाद 2009 से 2021 तक लगातार सत्ता में रहे और फिर 2022 में दोबारा वापसी की. इतनी बार चुनावी वापसी करने की उनकी क्षमता ने उन्हें इजरायल की राजनीति का सबसे टिकाऊ चेहरा बना दिया. आलोचकों के अनुसार वे सत्ता प्रबंधन में माहिर हैं, जबकि समर्थकों के लिए वे संकट के समय के नेता हैं.

संयुक्त राष्ट्र में बम का स्केच

2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक पोस्टर पर बम का चित्र दिखाया और लाल रेखा खींचकर चेतावनी दी. यह दृश्य वैश्विक मीडिया में छा गया. उनका तर्क साफ था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम इजरायल के अस्तित्व के लिए खतरा है. इस मुद्दे पर उनका रुख वर्षों से लगातार सख्त रहा है.

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अदालत और प्रधानमंत्री की कुर्सी साथ-साथ

2019 में नेतन्याहू पर रिश्वत, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगे. उन पर मुकदमा चला और वे अदालत में पेश भी हुए. इजरायल के इतिहास में यह अनोखी स्थिति थी कि एक मौजूदा प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के मामलों में ट्रायल का सामना कर रहा था और साथ ही चुनाव भी लड़ रहा था. यह मामला अब भी इजरायल की राजनीति का बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

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भारत यात्रा और कूटनीति

2018 में नेतन्याहू भारत आए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकातों ने काफी सुर्खियां बटोरीं. अहमदाबाद में रोड शो और समुद्र तट पर अनौपचारिक बातचीत की तस्वीरें प्रतीकात्मक बन गईं. भारत और इजरायल के रक्षा और तकनीकी सहयोग को इस दौर में खुलकर सार्वजनिक पहचान मिली.

मीडिया से टकराव और सोशल मीडिया की रणनीति

नेतन्याहू का पारंपरिक मीडिया के साथ संबंध अक्सर टकराव भरा रहा. वे मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते रहे हैं. इसके जवाब में उन्होंने सोशल मीडिया को अपने पक्ष की कहानी सीधे जनता तक पहुंचाने का हथियार बनाया. फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म पर उनकी सक्रियता ने उन्हें समर्थकों से सीधे जोड़ने में मदद की.

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सत्ता में वापसी की कहानी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं

इजरायल की राजनीति में बेंजामिन नेतन्याहू को यूं ही 'कमबैक किंग' नहीं कहा जाता. साल 2021 में 12 साल लगातार प्रधानमंत्री रहने के बाद उनकी कुर्सी चली गई. अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों ने एकजुट होकर उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया. ऐसा लगा कि नेतन्याहू का दौर खत्म हो गया. ऊपर से उन पर भ्रष्टाचार के मामले भी चल रहे थे, जिससे उनकी सियासी मुश्किलें और बढ़ गईं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.

नेफ्ताली बैनेट के नेतृत्व में बनी नई गठबंधन सरकार के अंदरूनी मतभेद धीरे-धीरे सतह पर आने लगे. आठ पार्टियों का गठबंधन ज्यादा समय तक एकजुट नहीं रह सका. 2021 में सरकार गिर गई और देश फिर चुनावी मोड में चला गया. ये इजरायल में चार साल के अंदर पांचवां चुनाव था, तो जनता भी लगातार होते चुनावों से थक चुकी थी. यहीं पर नेतन्याहू ने अपना पूरा राजनीतिक अनुभव लगा दिया. उन्होंने दक्षिणपंथी और धार्मिक पार्टियों को एक मजबूत ब्लॉक में जोड़ा. चुनाव प्रचार में सुरक्षा, ईरान का खतरा और सरकार की स्थिरता का मुद्दा जोर-शोर से उठाया. नतीजा यह हुआ कि उनकी लिकुड पार्टी ने चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया और सहयोगियों के साथ मिलकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया.

दिसंबर 2022 में नेतन्याहू फिर प्रधानमंत्री बन गए. यह छठी बार थी जब उन्होंने देश की कमान संभाली. आलोचकों ने कहा कि यह इजरायल की सबसे दक्षिणपंथी सरकार है, जबकि समर्थकों ने इसे मजबूत नेतृत्व की वापसी बताया.

कमांडो अतीत, भाई की शहादत, अमेरिका से गहरा रिश्ता, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सख्त बयान, घरेलू मुकदमे और सत्ता में वापसी, सब मिलकर बेंजामिन नेतन्याहू की कहानी उन्हें इजरायल की राजनीति का सबसे जटिल और प्रभावशाली चेहरा बनाता है. उनके समर्थकों के लिए वे सुरक्षा और स्थिरता के प्रतीक हैं. आलोचकों के लिए वे विभाजनकारी नेता हैं. कुल मिलाकर आधुनिक इजरायल की राजनीति का इतिहास लिखते समय बेंजामिन नेतन्याहू का अध्याय सबसे लंबा और सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला रहेगा.

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