ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल 8 मुस्लिम देश, इन 5 वजहों से पुतिन-जिनपिंग को होगी टेंशन- Explained

Donald Trump's 'Board of Peace' Explained: आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए चुनौती क्यों माना जा रहा है?

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Donald Trump's 'Board of Peace': ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल 8 मुस्लिम देश
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  • अमेरिकी राष्ट्रपति ने बोर्ड ऑफ पीस नाम की अंतरराष्ट्रीय शांति पहल शुरू की, UNSC का प्रतिद्वंदी माना जा रहा है
  • पाकिस्तान, सऊदी अरब और UAE समेत 8 मुस्लिम देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए सहमति जताई है
  • ट्रंप ने दावा किया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की हामी भर दी है
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पाकिस्तान और सात अन्य मुस्लिम देशों ने बुधवार, 21 जनवरी को एक बयान जारी कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तथाकथित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के अपने फैसले की घोषणा की. डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी इसमें शामिल होने के लिए हामी भर दी है. चलिए आपको यहां बताते हैं कि बोर्ड ऑफ पीस क्या है? कौन से मुस्लिम देश इसमें शामिल होने के लिए राजी हो गए हैं? क्या रूस सच में इसमें शामिल हो गया है? इसे संयुक्त राष्ट्र के खिलाफ ट्रंप की नई चाल क्यों माना जा रहा है?

Q- बोर्ड ऑफ पीस क्या है?

'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू की गई एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल है. कहा जा रहा है कि ट्रंप इसके जरिए अपना संयुक्त राष्ट्र बना रहे हैं. वैसे तो इसे मुख्य रूप से गजा में शांति स्थापित करने और वहां के पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए बनाया गया है लेकिन लॉन्ग टर्म प्लान कुछ और है. इसके चार्टर के अनुसार यह दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी शांति और स्थिरता के लिए काम कर सकता है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस बोर्ड के चेयरमैन हैं.

Q- कौन से मुस्लिम देश इसमें शामिल हुए हैं?

बुधवार को जारी एक संयुक्त बयान में, कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के विदेश मंत्रियों ने शांति बोर्ड में शामिल होने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा अपने नेताओं को दिए गए निमंत्रण का स्वागत किया. बयान में कहा गया है कि, "मंत्री शांति बोर्ड में शामिल होने के लिए अपने देशों के साझा निर्णय की घोषणा करते हैं. हर देश अपने संबंधित प्रासंगिक कानूनी और अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं के अनुसार शामिल होने वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेगा, जिसमें अरब गणराज्य मिस्र, इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, जो पहले ही इसमें शामिल होने की घोषणा कर चुके हैं."

Q- मुस्लिम देशों का शामिल होना बड़ी बात क्यों?

  1. प्रमुख मुस्लिम देशों का अमेरिका-नेतृत्व वाली पहल में शामिल होना पारंपरिक UN कूटनीति से अलग है.
  2. इससे गाजा जैसे मुद्दों पर बोर्ड को मुस्लिम दुनिया में वैधता मिलती है.
  3. अमेरिका की आलोचना के बावजूद इन देशों ने बहिष्कार के बजाय संवाद चुना है.
  4. इससे मिडिल ईस्ट के शांति प्रयासों में अमेरिका की पकड़ UN, यूरोप, चीन और रूस से मजबूत होती है.
  5. 'बोर्ड ऑफ पीस' से कई यूरोपीय देशों के दूर रहने के बीच मुस्लिम देशों की भागीदारी कूटनीतिक दरार भी दिखाती है.

Q- क्या रूस भी इसमें शामिल हो चुका है?

डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि रूस के व्लादिमीर पुतिन 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के लिए सहमत हो गए हैं. जबकि रूसी सरकार की तरफ से कहा गया है कि वह अभी भी न्योते का अध्ययन कर रहा है. ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में संवाददाताओं से कहा, "उन्हें (पुतिन) आमंत्रित किया गया था, उन्हें स्वीकार कर लिया गया है. कई लोगों ने स्वीकार कर लिया है." 

वहीं मॉस्को में पुतिन ने एक कैबिनेट बैठक में कहा कि उन्होंने अपने विदेश मंत्रालय को प्रस्ताव का अध्ययन करने का आदेश दिया है. पुतिन ने कहा कि इसके बाद ही हम निमंत्रण का जवाब दे पाएंगे.

Q- क्या भारत को न्योता मिला है?

बोर्ड में शामिल होने के लिए कई वैश्विक नेताओं को आमंत्रित किया गया है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं. हालांकि इसकी सदस्यता के लिए विशेष शर्तें हैं. ट्रंप ने कहा है कि अगर किसी देश को स्थायी सदस्यता चाहिए तो उन्हें $1 बिलियन डॉलर (लगभग ₹8300 करोड़) देना होगा, जिसका उपयोग गजा के पुनर्निर्माण में किया जाएगा. अगर वो पैसा नहीं देते हैं तो उन्हें 3 साल की अस्थाई सदस्यता ही मिलेगी.

Q- इसे संयुक्त राष्ट्र के खिलाफ ट्रंप की नई चाल क्यों माना जा रहा है?

भले ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' की शुरुआत गाजा संघर्ष के लिए हुई थी, लेकिन इसके चार्टर के अनुसार यह दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी शांति और स्थिरता के लिए काम कर सकता है. ट्रंप की "शांति बोर्ड" की महत्वाकांक्षा को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दरकिनार करने का नवीनतम अमेरिकी प्रयास बताया जा रहा है. सुरक्षा परिषद सैन्य कार्रवाई को अधिकृत करने की शक्ति के साथ संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली निकाय (बॉडी) है. लेकिन हाल के वर्षों में गाजा और यूक्रेन सहित युद्धों को समाप्त करने में विफल रहा है. इस पर ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही बात करते रहे हैं और उन्होंने इस सप्ताह भी कई बार ऐसा किया है.

सुरक्षा परिषद ने नवंबर में इस 'बोर्ड ऑफ पीस' को गाजा में इजरायल-हमास युद्ध में सीजफायर की निगरानी के लिए एक संक्रमणकालीन निकाय के रूप में काम करने का पावर दिया था. लेकिन जब बोर्ड का गठन हुआ तो ट्रंप ने चार्टर में लिख दिया कि यह दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी शांति और स्थिरता के लिए काम कर सकता है. यह कीम तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का भी है और इसी लिए इसे संभावित प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है.

रिटायर हो चुके अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट वुड ने रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी मिशन में काम किया था. उन्होंने कहा है कि अगर ट्रंप सुरक्षा परिषद को गाजा से परे मुद्दों से निपटने वाले  'बोर्ड ऑफ पीस' के साथ रिप्लेस करने की कोशिश कर रहे हैं, तो मुझे नहीं लगता कि यह सफल होगा.

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