क्या जमात-ए-इस्लामी को अमेरिका के साथ 'सीक्रेट मीटिंग' ले डूबी? बांग्लादेश चुनाव में हार की वजह समझिए

Bangladesh Election Result 2026: जमात-ए-इस्लामी को तारिक रहमान के नेतृत्व वाली BNP ने मात दे दी है. BNP दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बना रही है जबकि जमात-ए-इस्लामी के गठबंधन की झोली में उसकी आधी सीटें भी नहीं आ रही हैं.

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Bangladesh Election Result 2026: जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश चुनाव में मिली करारी हार
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  • बांग्लादेश चुनाव में जमात-ए-इस्लामी को करारी हार का सामना करना पड़ा है
  • तारिक रहमान के नेतृत्व वाली BNP ने दो-तिहाई बहुमत के साथ चुनाव जीता है
  • कट्टरपंथी छवि, महिलाओं का समर्थन न मिलना और अल्पसंख्यकों का डर.. जमात की हार के कई कारण माने जा रहे हैं
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Bangladesh Election Result 2026: बांग्लादेश चुनाव में कट्टरपंथी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी को मुंह की खानी पड़ी है. 2024 के आंदोलन और शेख हसीना सरकार के पतन के बाद सत्ता की कुर्सी तक जाने का सपना देखने वाली जमात को तारिक रहमान के नेतृत्व वाली BNP ने मात दी है. BNP दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बना रही है जबकि जमात-ए-इस्लामी के गठबंधन की झोली में उसकी आधी सीटें भी नहीं आई है. सवाल है कि जमात-ए-इस्लामी की हार क्यों हुई. चलिए समझने की कोशिश करते हैं.

जमात को मिली शुरुआती बढ़त, लेकिन टिक नहीं पाई

जुलाई 2024 में हुए छात्र आंदोलन ने शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की सरकार गिरा दी. उसके बाद जमात-ए-इस्लामी को शुरुआत में काफी संगठित और मजबूत माना जा रहा था. सड़कों पर हुए प्रदर्शनों में जमात की अहम भूमिका थी. अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक लगने और शेख हसीना के भारत जाने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक मैदान काफी सीमित हो गया. कई सालों बाद पहली बार जमात हाशिए पर नहीं थी, बल्कि मुख्य राजनीति में दिखने लगी. इस दौरान उसे एक रणनीतिक मौका भी मिला. तारिक रहमान ने चुनावी दौड़ में देर से एंट्री मारी. वो 25 दिसंबर 2025 को 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे थे और चुनाव में 2 महीने से भी कम का वक्त था. इस देरी का फायदा कुछ समय तक जमात को मिला, खासकर उन इलाकों में जहां बीएनपी का संगठन अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ था.

लेकिन यह बढ़त ज्यादा समय तक नहीं रही. जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज हुआ, जिन मतदाता समूहों से जमात को उम्मीद थी, वे दूसरी ओर चले गए. कई युवा मतदाता, जिन्होंने जुलाई के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी, उन्होंने जमात की बजाय बड़ी संख्या में बीएनपी को वोट दिया. महिला मतदाता भी उस संख्या में जमात के साथ नहीं आईं, जैसी पार्टी को उम्मीद थी. हिंदुओं सहित अल्पसंख्यक समुदायों ने भी BNP का समर्थन किया क्योंकि जमात कट्टरपंथी राजनीति करती है.

सबसे अहम बात यह रही कि जो अवामी लीग समर्थक चुनाव में हिस्सा लेने आए, वे जमात की ओर नहीं गए. उन्होंने भी बीएनपी को ही चुना.

अमेरिका वाला एंगल

जब जमात का चुनाव अभियान चल रहा था, तभी द वॉशिंगटन पोस्ट में खबर आई कि अमेरिकी राजनयिक (डिप्लोमैट) जमात से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. अखबार ने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला दिया और कहा कि यह संपर्क चुपचाप किया जा रहा था. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक अमेरिकी राजनयिक ने इस चिंता को कम करके दिखाया कि जमात इस्लामी क़ानून की अपनी सख्त व्याख्या लागू करेगी. इस रिपोर्ट के बाद चुनावी माहौल का रुख बदल गया.

BNP के वरिष्ठ नेता और महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने ठाकुरगांव में एक चुनावी रैली के दौरान आरोप लगाया कि जमात और अमेरिका के बीच कोई सीक्रेट डील हो गई है. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी समझौता बांग्लादेश की शांति, स्थिरता और संप्रभुता के लिए खतरा हो सकता है. जमात ने किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं की, लेकिन विदेशी राजनयिकों से बातचीत जारी रखी. पार्टी ने कहा कि उसने चुनाव से पहले सामान्य कूटनीतिक बैठकें की हैं.

पश्चिमी राजनयिकों से मुलाकात के बाद जमात ने बयान जारी कर कहा कि बातचीत दोस्ताना माहौल में हुई और इसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर चर्चा हुई. ढाका में फ्रांस के राजदूत ज्यां-मार्क सेरे-शार्ले ने भी अपने सहयोगियों के साथ जमात प्रमुख शफीकुर रहमान से पार्टी कार्यालय में मुलाकात की. जमात ने बताया कि इस बैठक में भी आने वाले चुनाव और आपसी सहयोग पर चर्चा हुई.

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कट्टरपंथी छवि ने पीछा नहीं छोड़ा

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में इस्लामी विद्वान सैयद अबुल आला मौदूदी ने की थी. 1971 की आजादी की जंग के दौरान जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया और पश्चिमी पाकिस्तान का साथ दिया था. पार्टी के नेताओं पर रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे अर्धसैनिक समूह बनाने के आरोप लगे, जिन पर हज़ारों नागरिकों की हत्या, बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंदू समुदाय को निशाना बनाने के आरोप हैं. आजादी के बाद 1972 में धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल के कारण जमात पर बैन लगा दिया गया. 1979 में यह बैन हटा. जमात कट्टरपंथी पार्टी है, इस इमेज ने उसका पीछा नहीं छोड़ा.

जुलाई 2024 के आंदोलन के बाद जमात ने खुद को फिर से संगठित किया, औपचारिक राजनीति में वापसी की और खुद को आंदोलन समर्थक और फासीवाद विरोधी बताना शुरू किया. पार्टी ने अल्पसंख्यक अधिकारों की बात की, पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार उतारा और शरीया कानून पर सार्वजनिक बयान नरम किए. चुनावी भाषणों में शफीकुर रहमान ने कहा कि महिलाएं और पुरुष मिलकर कल का बांग्लादेश बनाएंगे. उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बर्दाश्त न करने की बात कही और कहा कि न्याय व्यवस्था मजबूत होने के बाद भ्रष्टाचार, आतंकवाद, हत्या, बलात्कार और लूटपाट नहीं चलेगी. उन्होंने भेदभाव से मुक्त और न्याय आधारित बांग्लादेश की बात कही और जमात के नेतृत्व वाले 10 दलों के गठबंधन को समर्थन देने की अपील की.

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लेकिन सच्चाई तो यह थी कि वो अभी भी शरीया आधारित कानूनों की वकालत करती थी. महिलाओं के अधिकारों के विरोध का उसका पुराना रिकॉर्ड है और उसने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था.

उसके छात्र संगठन पर हिंसा के आरोप हैं. अल्पसंख्यकों की अपनी चिंताएं हैं और और उसके नेताओं पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप हैं. चाहकर भी जमान इस नैरेटिव से बाहर नहीं निकल पाया कि वो कल का नहीं, कट्टरपंथी नीतियों से चलने वाला अतीत का बांग्लादेश बनाना चाहता है. नतीजा साफ है- जनता ने उसे चुनाव में नकार दिया है.

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बांग्लादेश चुनाव के नतीजे लाइव पढ़िए 

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