भारत के लिए बांग्लादेश में तारिक रहमान की प्रचंड जीत के क्या मायने हैं? 6 फैक्टर समझिए

Bangladesh Election Result 2026: तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 13वें आम चुनावों में अपना परचम लहरा दिया है और अबतक के रुझानों में सरकार बनाती दिख रही है.

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India Bangladesh Ties: खालिदा जिया की मौत पर विदेश मंत्री जयशंकर खुद बांग्लादेश गए थे
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  • बांग्लादेश की जनता ने BNP को प्रचंड बहुमत दिया है और तारिक रहमान प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं
  • वर्तमान में बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय हैं और भारत को उम्मीद होगी कि नई सरकार में हालात बदलेंगे
  • पाकिस्तान बांग्लादेश में भारत-विरोधी विकल्पों का समर्थन करता रहा है जबकि भारत ने BNP को ग्रीन सिग्नल दिया है
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Bangladesh Election Result 2026: बांग्लादेश की जनता ने अपना चुनावी फैसला सुना दिया है. वहां के लोगों ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP को प्रचंड बहुमत दिया है और उसके नेता तारिक रहमान पीएम की कुर्सी पर बैठने को तैयार हैं. पीएम मोदी ने भी तारिक रहमान और उनकी पार्टी को इस शानदारी जीत पर बधाई दी है. नई दिल्ली की नजर तारिक रहमान और उनकी पार्टी की इस जीत पर करीबी से है क्योंकि यह नतीजा न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति के लिए बल्कि भारत के लिए भी बहुत मायने रखता है. खासकर उस समय जब भारत समर्थक अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था, शेख हसीना भारत में शरण लेने को मजबूर हैं और बांग्लादेश में भारत विरोधी नैरेटिव को खूब हवा दी गई है.

भारत के लिए BNP की जीत के 6 मायने

1- BNP की जीत को भारत न तो संकट मानेगा, न ही जश्न का मौका. एक तरह से यह भारत के लिए टेस्ट केस होगा. भारत के लिए सुरक्षा सहयोग, विदेश नीति का संतुलन और आर्थिक साझेदारी तय करेंगे कि बांग्लादेश की नई सरकार के साथ उसके रिश्ते किस दिशा में जाते हैं. अगर BNP भरोसा दे पाती है, तो भारत सहयोग बढ़ाएगा. भारत पूरी तरह से प्रैक्टिकल होकर अपने विकल्पों को तौलेतगा और आगे के फैसलों को लेगा.

2- भारत के लिए एक चीज तो साफ है कि उसने हमेशा जनादेश का सम्मान किया है और वो इसबार भी वही करेगा. पीएम मोदी ने बधाई देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, "मैं बांग्लादेश में संसदीय चुनावों में बीएनपी को निर्णायक जीत दिलाने के लिए मिस्टर तारिक रहमान को हार्दिक बधाई देता हूं. यह जीत आपके नेतृत्व में बांग्लादेश की जनता के भरोसे को दर्शाती है. भारत लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा. मैं हमारे बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और हमारे सामान्य विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं."

3- इस वक्त बांग्लादेश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है. देश में कट्टरपंथी ताकतें खुलकर सक्रिय हो गई हैं और अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में भारत के खिलाफ माहौल बनाया गया. नई दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता जमात-ए-इस्लामी को लेकर थी, जिसे भारत में अक्सर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के प्रभाव में माना जाता है. जमात इस चुनाव में सत्ता हासिल करने की पूरी तैयारी में था और उसने 11 दलों को साथ लेकर एक गठबंधन भी खड़ा कर लिया था.

हालात ऐसे बन गए कि भले ही ऐतिहासिक रूप से बीएनपी और दिल्ली के रिश्ते सहज नहीं रहे हों, फिर भी मौजूदा परिदृश्य में भारत उसे अपेक्षाकृत नरम और लोकतांत्रिक विकल्प के तौर पर देखने लगा. अवामी लीग पहले ही राजनीतिक दौड़ से बाहर हो चुकी थी, इसलिए नई दिल्ली की उम्मीद यही रही कि रहमान के नेतृत्व में बीएनपी सरकार बनाए. अंततः वही हुआ. इस स्थिति में भारत के सामने विकल्प सीमित थे और उसे दो कठिन विकल्पों में से कम नुकसानदेह रास्ता चुनना था.

4- दूसरी ओर, पाकिस्तान की सोच इससे बिल्कुल उलट रही है. वह अक्सर हालात में सबसे अधिक भारत-विरोधी विकल्प का समर्थन करता आया है. शेख हसीना के दौर में बांग्लादेश ने पाकिस्तान से दूरी बनाए रखी थी, लेकिन उनके सत्ता से हटने के बाद यूनुस के नेतृत्व में नीति में अचानक बदलाव देखने को मिला. जिस भारत की मदद से बांग्लादेश आजाद हुआ था, उससे दूरी बढ़ाते हुए अब पाकिस्तान के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया गया. अगर जमात सत्ता में आती, तो इस नजदीकी के और गहराने की आशंका थी. भारत यह देखेगा कि BNP सत्ता में आकर चीन और पाकिस्तान के साथ किस स्तर तक निकटता बढ़ाती है. संतुलन साधा गया तो दिल्ली सहज रहेगी; झुकाव बढ़ा तो सतर्कता बढ़ेगी.

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5- भारत ने अपनी तरफ से BNP को पूरी तरह से ग्रीन सिग्नल दिया. चाहे वो खालिदा जिया के बीमार होने पर चिंता जाहिर करना हो या उनकी मौत पर विदेश मंत्री का खुद बांग्लादेश जाना. 1 दिसंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने गंभीर रूप से बीमार खालिदा जिया के स्वास्थ्य पर चिंता जाहिर की थी और भारत के समर्थन की पेशकश की थी. जवाब में BNP ने भी ईमानदारी से आभार जताया. नई दिल्ली और BNP के बीच वर्षों में जैसे कठिन संबंध रहे हैं, उसके बाद यह राजनीतिक गर्मजोशी का एक दुर्लभ उदाहरण था.

6- जब सामने जमात जैसी कट्टरपंथी पार्टी की चुनौती हो तब बांग्लादेश के हिंदुओं को BNP की जीत कुछ हद तक राहत की खबर जैसी होगी. BNP ने अपना चुनाव जमात के पिच पर नहीं लड़ा है. हाल ही में इकबाल मंच के नेता उस्मान हाद की हत्या के बाद बांग्लादेश में जिस तरह हिंसा देखी गई, जैसे एक हिंदू युवक की लिंचिंग कर उसकी हत्या की गई, BNP ने उसकी आलोचना की है. जमात से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी. बांग्लादेश के हिंदुओं के दिल में छोटी ही सही लेकिन उम्मीद जरूर होगी कि नई सरकार में उनकी स्थिति में सुधार हो, उन्हें भी दूसरे बांग्लादेशी नागरिकों की तरह ही मानवाधिकार मिले.

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