बांग्लादेश चुनाव में किस ओर जाएंगे हसीना के वोटर? जमात और BNP की लड़ाई में हिंदू वोट बनेगा 'किंगमेकर'

Bangladesh Election 2026: BNP चुनाव रेस में आगे है लेकिन जमात चौंका सकती है. पार्टी को अपने राजनीतिक करियर के बेस्ट प्रदर्शन की उम्मीद है. हसीना विरोधी विरोध प्रदर्शनों के लिए उसकी लामबंदी से पार्टी को देशव्यापी समर्थन हासिल करने में मदद मिली है.

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Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश चुनाव BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच टक्कर
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  • बांग्लादेश में 12 फरवरी को हो रहे आम चुनाव में दो प्रमुख पार्टियों का मुकाबला है. साथ में जनमत संग्रह भी होगा.
  • अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद अवामी लीग पर बैन. जमात और BNP प्रमुख राजनीतिक ताकत बनकर उभरीं
  • जमात को बैन हटने के बाद मजबूती मिली है जबकि BNP में खालिदा की मृत्यु और तारिक रहमान की वापसी से समर्थन बढ़ा है
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बांग्लादेश में उसके हालिया इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव 12 फरवरी को होने जा रहा है. इस चुनाव के लिए पार्टियों का कैंपेन मंगलवार की सुबह 7 बजे आधिकारिक रूप में समाप्त हो जाएगा. यानी सोमवार प्रभावी प्रचार और रैलियों का आखिरी दिन है. ऐसे में बांग्लादेश के इस आम चुनाव के लिए वहां कि दो मुख्य पार्टियां, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्ट (BNP) मतदाताओं को लुभाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं. चुनाव एकतरफ नहीं है, यहां दोनों के बीच एक कड़ा मुकाबला दिख रहा है.

दरअसल अगस्त 2024 में हिंसक विरोध प्रदर्शन के बाद शेख हसीना की सरकार गिर गई. उसके बाद बांग्लादेश में जो अंतरिम सरकार बनी, उसने शेख हसीना की पार्टी, अवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर बैन लगा दिया. इस वजह से बांग्लादेश ने दो ताकतों को अपनी राजनीति में प्रमुख खिलाड़ियों के रूप में उभरते देखा है. कभी मिलकर चुनाव लड़ने वाली बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और शेख हसीना के कार्यकाल में मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, आज आमने-सामने हैं. आम चुनाव (Bangladesh Election 2026) इन दोनों ताकतों के बीच का मुकाबला बन गया है.

कई लोगों का मानना ​​​​है कि BNP चुनाव में सबसे आगे है. लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि जमात चौंका सकती है. पार्टी को अपने अबतक के राजनीतिक करियर में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की उम्मीद है क्योंकि 2024 में हसीना विरोधी विरोध प्रदर्शनों के लिए उसकी लामबंदी से पार्टी को देशव्यापी समर्थन हासिल करने में मदद मिली है. 2024 में अंतरिम सरकार के सत्ता संभालने के तुरंत बाद इसकी गतिविधियों पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया गया. बांग्लादेश में चुनाव आयोग ने जमात के रजिस्ट्रेशन को भी बहाल कर दिया.

इस तरह से राजनीति में वापसी ने जमात को मजबूत स्थिति में ला दिया है. हालांकि, 17 साल के राजनीतिक निर्वासन के बाद तारिक रहमान की देश वापसी ने BNP कैडर को फिर से सक्रिय कर दिया है. साथ ही पूर्व प्रधान मंत्री और तारिक रहमान कीं मां बेगम खालिदा जिया की मृत्यु ने भी BNP के पक्ष में सहानुभूति की एक भावना पैदा की है. इस स्थिति ने इस चुनाव को एक कड़ा मुकाबला बना दिया है और चुनावी कैंपेन के दौरान जमात और BNP एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं.

अवामी लीग के वोटर किस ओर जाएंगे?

BNP और जमात- दोनों ही अवामी लीग के समर्थकों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर उन सीटों पर जहां अवामी लीग का मजबूत आधार रहा है. ठाकुरगांव से अवामी लीग के बड़े नेता और हिंदू राजनेता रमेश चंद्र सेन की जेल में मौत हो गई थी. उसके बाद दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता उनके घर पहुंचे थे. इससे साफ दिखता है कि अवामी लीग के वोट अब कितने अहम हो गए हैं.

BNP के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर उनके घर शोक जताने पहुंचे थे. जेल में जान गंवाने वाले रमेश सेन पांच बार सांसद रह चुके थे और इस इलाके में उनका बड़ा प्रभाव था. अवामी लीग पर बैन के कारण इस बार के चुनाव में चुनौती नहीं है. इसलिए दोनों पार्टियां चाहती हैं कि उनके समर्थक उन्हें वोट दें. जमात के उम्मीदवार दिलवार हुसैन भी सेन के परिवार से मिलने पहुंचे. मिर्जा फखरुल खुद ठाकुरगांव से चुनाव लड़ रहे हैं और उन्होंने सेन के समर्थकों से अपने लिए वोट मांगे हैं. कड़े मुकाबले में ये बदलते वोट (फ्लोटिंग वोट) नतीजा तय कर सकते हैं.

जमात बनाम BNP: 1971 की विरासत पर टकराव

एनडीटीवी ने दोनों बड़ी पार्टियों की रैलियों को देखा और उनके समर्थकों से बात की. एक BNP समर्थक ने कहा, “जमात 1971 के मुक्ति संग्राम में अपनी भूमिका से इनकार नहीं कर सकती, जब लाखों बांग्लादेशियों को निशाना बनाया गया और मारा गया. यह वैसा ही था जैसा 2024 में शेख हसीना सरकार ने सख्ती से कार्रवाई करते समय किया.”

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वहीं जमात प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान ने तारिक रहमान पर निशाना साधते हुए कहा, “बांग्लादेश की राजनीति को विशेषाधिकार और भ्रष्टाचार की व्यवस्था बना दिया गया है, जहां नेतृत्व परिवार की संपत्ति की तरह सौंपा जाता है. यह देश किसी परिवार की जागीर नहीं है. मैं वंशवादी राजनीति को खारिज करता हूं.” इसपर  तारिक रहमान ने सीधे जवाब नहीं दिया, लेकिन BNP नेताओं ने याद दिलाया कि 1971 में जमात के नेता पाकिस्तान के साथ थे, जब पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेशियों पर अत्याचार किए थे.

जमात समर्थकों का कहना है, “तारिक रहमान शेख हसीना से लड़ने के लिए देश में नहीं थे, वे विदेश में निर्वासन में थे. हसीना सरकार का सबसे बड़ा निशाना जमात थी, जिस पर अवामी लीग ने बैन लगाया था. लोगों ने देखा है कि हसीना के खिलाफ कौन लड़ा- लड़ने वाले हम थे.”

अहम हिंदू वोट किस ओर जाएगा?

चुनाव कड़ा होने के संकेत हैं, इसलिए सभी पार्टी देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर रही हैं. माना जा रहा है कि हिंदू वोट निर्णायक साबित हो सकता है. इसकने नेता मंदिरों में जा रहे हैं, शिक्षा में हिंदुओं के योगदान की तारीफ कर रहे हैं. BNP और जमात, दोनों ने हिंदुओं की सुरक्षा का वादा किया है, जबकि ग्राउंड पर सच्चाई यह है कि हिंदुओं पर चुनाव से पहले कट्टरपंथी ताकतों के हमले भी हुए हैं.

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जमात प्रमुख और BNP, दोनों ने अल्पसंख्यकों को न्याय और बराबरी का भरोसा दिया है. लेकिन जमात की कठोर और कट्टर छवि के कारण, हिंदुओं में BNP की स्वीकार्यता ज्यादा मानी जा रही है. सुनामगंज में, BNP के अनुभवी उम्मीदवार नासिर उद्दीन चौधरी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान धमरई जगन्नाथ धाम मंदिर का दौरा किया. वहीं जमात उम्मीदवार ने भी हिंदुओं की शिक्षा में भूमिका की तारीफ करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में शिक्षा फैलाने में हिंदुओं का बड़ा योगदान रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ बातों से जमात को हिंदुओं का भरोसा नहीं मिलेगा. कट्टरपंथी हिंसा से पीड़ित रहे हिंदुओं के बीच BNP को बढ़त मिल सकती है.

बांग्लादेश चुनाव की प्रक्रिया

13वां राष्ट्रीय संसदीय चुनाव और जनमत संग्रह 12 फरवरी को होगा. सुबह 7:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक, पूरे बांग्लादेश की 299 सीटों पर पारदर्शी बैलेट बॉक्स और कागजी मतपत्र से मतदान होगा. अंतरिम सरकार ने कड़ी सुरक्षा के इंतजाम किए हैं, क्योंकि चुनाव से पहले बांग्लादेश में जमकर हिंसा हो रही है.

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खास बात है कि चुनाव के साथ ही जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी होगा. यह दस्तावेज बांग्लादेश की भविष्य की दिशा तय करेगा. जुलाई राष्ट्रीय चार्टर पर 17 अक्टूबर 2025 को हस्ताक्षर हुए थे, शेख हसीना सरकार गिरने के एक साल बाद. अगर जनमत संग्रह में हां पर बहुमत वोट मिलता है, तो राजनीतिक दलों को इसके बिंदुओं का पालन करना होगा, भले ही कुछ मुद्दों पर सहमति न हो. दरअसल 13 नवंबर 2025 को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने जुलाई राष्ट्रीय चार्टर (संवैधानिक सुधार) लागू करने का आदेश जारी किया था. जनमत संग्रह में संविधान सुधार के चार प्रस्ताव होंगे और मतदाताओं को इन सभी पर मिलाकर एक ही “हां" या “न” वोट देना होगा.

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