- भारत ने संयुक्त राष्ट्र को अब अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली प्रभावी संस्था नहीं माना है.
- पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की चुनौतियां बजटीय नहीं, बल्कि संघर्षों से निपटने में जड़ता है.
- बहुपक्षीय चर्चाएं समानांतर ढांचों की ओर बढ़ रहीं, जिनमें निजी क्षेत्र भी शांति सुरक्षा में भागीदार बन रहा.
भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को अब अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली प्रभावी संस्था के रूप में नहीं देखा जा रहा है और शांति‑सुरक्षा से जुड़े ठोस परिणाम हासिल करने के लिए चर्चाएं अब ‘समानांतर बहुपक्षीय ढांचों' की ओर बढ़ रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने सोमवार को सुरक्षा परिषद की खुली बहस में यह टिप्पणी की. बहस का विषय था, ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन की पुनः पुष्टि: शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के मार्ग'
'UN का प्रभाव कम हुआ'
हरीश ने कहा, 'सार्वभौमिक सदस्यता वाले बहुपक्षवाद, जिसके केंद्र में संयुक्त राष्ट्र है, पर लगातार दबाव बढ़ रहा है. संगठन की चुनौतियां केवल बजटीय नहीं हैं. संघर्षों से निपटने में जड़ता और प्रभावहीनता इसकी बड़ी कमजोरी बन चुकी है.'
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उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोग संयुक्त राष्ट्र को ऐसी संस्था के रूप में नहीं देखते जो अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित कर सके. हरीश के अनुसार, 'चर्चाएं अब समानांतर बहुपक्षीय ढांचों की ओर बढ़ गई हैं, जिनमें कुछ मामलों में निजी क्षेत्र के भागीदार भी शामिल हैं, ताकि संयुक्त राष्ट्र के ढांचे से बाहर शांति और सुरक्षा से जुड़े परिणाम हासिल किए जा सकें.'
भारत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब वैश्विक भू‑राजनीतिक संघर्षों को रोकने और सुलझाने में संयुक्त राष्ट्र और उसके सबसे शक्तिशाली अंग सुरक्षा परिषद की विफलता लगातार सामने आ रही है.
ट्रंप बना रहे UN जैसा 'शांति बोर्ड'
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा के लिए प्रस्तावित ‘शांति बोर्ड' को संयुक्त राष्ट्र के एक संभावित विकल्प या प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है. ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वैश्विक नेताओं को इस पहल में शामिल होने का आमंत्रण दिया है. इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में स्थायी शांति स्थापित करना और वैश्विक संघर्षों को सुलझाने के लिए ‘नए और साहसपूर्ण तरीकों' पर काम करना है.
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ट्रंप बनेंगे 'शांति बोर्ड' के अध्यक्ष
पिछले सप्ताह दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान ट्रंप ने इस शांति बोर्ड के घोषणापत्र को औपचारिक मंजूरी दी. ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे. जिन देशों ने इसके घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, उनमें अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाकिस्तान, कोसोवो, मंगोलिया, मोरक्को, पाकिस्तान, पैराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं.
हरीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन का अनुप्रयोग निरंतरता, वस्तुनिष्ठता और पूर्वानुमेयता पर आधारित होना चाहिए और इसमें दोहरे मानदंडों की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन का उपयोग किसी देश की संप्रभुता पर सवाल उठाने या उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि भारत अपने संविधान, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने वाली पहलों के माध्यम से कानून के शासन को अपने राष्ट्रीय शासन की आधारशिला मानता है और यही दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की नीति को दिशा देता है.
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भारत ने UN में कहा- तत्काल सुधार की जरूरत
भारत ने सुरक्षा परिषद में यह भी कहा कि कानून का शासन बिना प्रभावी क्रियान्वयन के 'निष्प्रभावी' है और वैश्विक शासन संरचनाओं, विशेष रूप से सुरक्षा परिषद के ढांचे में व्यापक और तत्काल सुधार की जरूरत है, ताकि वह समकालीन वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर सके और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखे.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)












