कत्ल-ए-आम को धर्म का नाम देकर जायज ठहराने की कोशिश कर रहे ईरान-इजरायल-अमेरिका?

5 हजार साल पुराने खूनी इतिहास के क्या सबूत मौजूदा युद्ध में मिलते हैं, जिनसे दुनिया का भविष्य खतरे में पड़ गया है-इस रिपोर्ट में समझिए

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  • अमेरिका, ईरान और इज़रायल के बीच चल रहे संघर्ष में धर्म और धार्मिक प्रतीकों का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है
  • डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध के दौरान खुद को धार्मिक प्रतीकों जैसे यीशु मसीह और पोप के रूप में प्रस्तुत किया
  • इजरायल और ईरान ने अपने सैन्य अभियानों के नाम धार्मिक प्रतीकों और इतिहास से जुड़े नामों पर आधारित रखे हैं
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ईरान-अमेरिका-इज़रायल की लड़ाई के बारे में दावा किया जा रहा है कि ये धर्मयुद्ध है. धर्मयुद्ध के दावे का कारण क्या है? क्या मौजूदा विवाद में इसके सबूत मौजूद हैं? अगर मौजूद हैं तो वो क्या हैं? और अगर धर्मयुद्ध का दावा सही नहीं है तो फिर बड़े पैमाने पर ऐसी बातें क्यों हो रही हैं? ईरान के साथ युद्ध की इस कहानी के सबसे बड़े मिस्ट्रीप्वाइंट और फ्लैशप्वाइंट की जांच आज इस रिपोर्ट में होगी. हर चीज एक दूसरे से जुड़ी है. पूरे ध्यान से हर प्वाइंट पर नजर रखिए. इसके बाद युद्ध के प्रति आपका -नजरिया बदल भी सकता है.

  • 12 अप्रैल 2026: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर एक तस्वीर के साथ संदेश दिया. तस्वीर में ट्रंप यीशू की तरह एक बीमार व्यक्ति का उपचार करते हुए दिखाई दे रहे हैं. ट्रंप ने इस तस्वीर की पुष्टि की है. आपत्ति उठायी गयी तो कहा “तस्वीर में मुझे डॉक्टर दिखाया गया है, मैं लोगों को ठीक करता हूं, मुझे ये पसंद है” लेकिन फिर जब पूरी दुनिया में ईशू मसीह वाली ट्रंप की तस्वीर पर आपत्ति उठायी गयी.
  • 13 अप्रैल 2026: यीशू मसीह के वेश में उपचार करने वाली ट्रंप की तस्वीर को उनके ट्रूथ सोशल एकाउंट से डिलीट कर दिया गया. सवाल उठा कि अगर डॉक्टर बनकर लोगों को ठीक कर रहे  थे फोटो डिलीट क्यों कर दी?
  • 15 अप्रैल 2026: जवाब मिलते उससे पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर फिर एक ऐसी तस्वीर शेयर की जिसमें यीशू मसीह ने ट्रंप को गले लगा रखा है. तस्वीर के बैकग्राउंड में अमेरिकी झंडा है. ट्रंप को ईसा मसीह के साथ ऐसी नजदीकियों के प्रदर्शन की आखिर जरूरत क्या है? वो भी तब जबकि अमेरिका ईरान के खिलाफ एक बड़े युद्ध में फंसा हुआ है. जबकि पूरी दुनिया में अमेरिकी डॉलर और सुपर पॉवर को चीन की तरफ से चुनौती मिल रही है. सवाल का जवाब खोजने के क्रम में हमें ट्रंप की एक और तस्वीर मिली जो उन्होंने खुद ट्रूथ सोशल में शेयर की थी.
  • 2 मई 2025: डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसी तस्वीर शेयर की जिसमें ट्रंप पोप के परिधान में नजर आ रहे हैं. पोप ईसाइयों के सबसे बड़े गुरू माने जाते हैं. इटली के पास वेटिकन में रहते हैं. ऐसा सब जानते हैं और शायद ये भी कि पोप की परंपरा में पहली बार ऐसा हुआ है कि वेटिकन के प्रमुख पोप के पद पर अमेरिका में जन्मा कोई व्यक्ति बैठा है. इनका नाम है पोप लियो-14TH.
  • 5 मार्च 2026: इस घटना का वीडियो बहुत चर्चित हुआ था. राष्ट्रपति के ओवल ऑफिस में ट्रंप के लिए प्रार्थना करने वालों की एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई जिसमें ट्रंप बीचो बीच बैठे हुए हैं. क्राइस्ट फेलोशिप के संस्थापक पादरी टॉम मॉलिन्स ने प्रार्थना पढ़ी. चारो ओर खड़े लोगों में ट्रंप की आध्यात्मिक सलाहकार पॉला व्हाइट केन, प्रसिद्ध इवैंजिकल पादरी ग्रेग लॉरी, फ्री चैपल के सीनियर पादरी जेंटज़न फैंकलिन, इवैंजिकल नेता जॉनी मूर, फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च ऑफ डलास के पादरी रॉबर्ट जेफ्रेस, रूढ़िवादी नेता गैरी बाउर सहित कई प्रमुख इसाई शख्सियत मौजूद थीं. ये सब तब हो रहा था जबकि अमेरिका डंके की चोट पर ईरान में घुस घुस कर 13,600 किलो के बम बरसाने की प्लानिंग कर रहा था. मिसाइल और दूसरे बम के हमले चल रहे थे. दावा किया जाता है कि ऐसा वीडियो अमेरिका के राष्ट्रपति ऑफिस से पहले देखने को नहीं मिला.

धर्म की अफीम हर तरफ

युद्ध के दौरान धर्म का सार्वजनिक और भड़कीला प्रदर्शन केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है. ईरान और इजरायल के फ्रंट पर भी धर्म के भीषण विस्फोट देखने को मिले हैं. एक्सपर्ट्स तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि मोर्चे पर तीन देश नहीं तीन धर्म लड़ रहे हैं. क्रिश्चियन, यहूदी और इस्लाम आमने सामने हैं. मिडिल ईस्ट के इतिहास में इन तीन धर्मों जिन्हें हमकिताबी भी कहते हैं, के विरोध प्रमुखता से दर्ज हैं. आश्चर्य इस बात का है कि 21वीं सदी के सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाला अमेरिका भी युद्ध में धर्म का आईना चमका रहा है. ट्रंप युद्ध के विरोधी थे,मागा समर्थक भी शांति के प्रेमी थे. फिर भी दूसरी पारी में ट्रंप डील और वॉर पर अड़े हुए हैं. धर्म और धार्मिक प्रतीकों का बढ़ चढ़ कर इस्तेमाल कर रहे हैं. अमेरिकी सेना के भीतर भी सैनिकों को धर्म के नाम पर भड़कने की शिकायतें आ रही हैं.

इजरायल में युद्ध का धार्मिक चेहरा

इजरायल ने जब युद्ध शुरू किया तो नाम दिया ऑपरेशन ROARING LION. इसमें यहूदी धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं का सतर्क इस्तेमाल किया गया. नाम में मौजूद LION यानी शेर का प्रतीक है लॉयन ऑफ जुडाह . रोरिंग ल्यॉन सीधे हिब्रू बाइबिल की शेर संबंधित छवियों से जुड़ा  हुआ है. शेर यहूदा के क़बीले और आगे चलकर यहूदी पहचान का केन्द्रीय प्रतीक है. बाइबिल में शेर- शक्ति,नेतृत्व, दैवी संरक्षण और न्याय का प्रतीक है. इसका इस्तेमाल करीब 150 बार किया गया है. हांलाकि अब इस इलाके में कोई शेर नहीं मिलता है. इस तरह से ऑपरेशन रोरिंग लॉयन के नाम का चुनाव केवल सैनिक कार्रवाई में उत्साह भरने के लिए नहीं दिया गया बल्कि इसमें इतिहास और इज़रायली स्टेट की स्थापना की धार्मिक भविष्यवाणी का इमोशन पुट भी दिया गया. संदेश देने की कोशिश की गयी कि जब शेर दहाड़ता है तो निष्क्रिय रहना संभव नहीं है. इससे पहले 2025 में जब इज़रायल ने ईरान के खिलाफ सैनिक अभियान शुरू किया था तो उसे नाम दिया था OPERATION RISING LOIN. इस तरह से ये दैवीय आशीर्वाद या नैतिक न्याय का संकेत देकर घरेलू समर्थन जुटाने और सेना का मनोबल बढ़ाने की सोच को भी दर्शाता है.

ईरान में युद्ध का धार्मिक चेहरा

ईरान ने अपने जवाबी हमले का नाम रखा है- ट्रू प्रॉमिस. ट्रू प्रॉमिस भी केवल सैन्य कोड नहीं है. इसके पीछे गहरी  धार्मिक परंपरा और प्रतीक हैं. अंग्रेजी के ट्रू प्रॉमिस को अरबी में वाद-ए-सादिक कहा जाता है. ये कुरान की आयतों से प्रेरित है. इसमें ईश्वर के प्रति सच्ची प्रतिज्ञा का भाव है. भावना ये है कि अत्याचार के खिलाफ डट कर लड़ने वालों से किया गया वादा जरूर पूरा होगा. ईरान के अधिकारियों ने कुरान की ऐसी आयतों का इस्तेमाल भी किया है जिसका अर्थ था कि फिर हमने उनसे किया हुआ अपना वादा पूरा किया है. ईरान अपने प्रतिरोध को ईश्वर के नैतिक विधान से जोड़ कर प्रस्तुत करता है मकसद ये होता है कि जवाब केवल स्ट्रेटजिक न लगे बल्कि लोगों की आस्था भी उससे जुड़े.

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अमेरिका में धर्म का प्रयोग

युद्ध के मैदान पर जो हिंसक और बर्बर घात प्रतिघात होता है उसे धार्मिक आस्थाओं और प्रतीकों से जायज ठहराने की कोशिश होती है. अमेरिका की सेना ईरान के ऊपर हुए हमलों को हर हाल में नैतिक ठहरा रही है. अमेरिका के राष्ट्रपति, युद्धमंत्री और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सेना के कमांडर ने जो दुनिया के सामने कहा है उसके पीछे सैन्य कमांडरों ने अपने सैनिकों के लिए इसे धार्मिक युद्ध की तरह ही पेश किया है. अमेरिकी सेना में मिलिट्री रिलीजियस फ्रीडम फाउंडेशन (MRFF) को मिली शिकायतों के मुताबिक, कुछ कमांडरों ने कहा कि ईरान के साथ युद्ध ईश्वर की योजना का हिस्सा है और आर्मागेडॉन यानी अंतकाल की ओर ले जाएगा. दूसरे कुछ कमांडर्स ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को ईरान में ‘signal fire' जलाने के लिए यीशू द्वारा अभिषिक्त बताया गया. राष्ट्रपति ट्रंप के बारे में ऐसा दावा सार्वजनिक रूप से भी किया गया. तब जबकि युद्ध के दौरान ही एक महिला पॉस्टर राष्ट्रपति भवन आयीं और उन्होंने सबके सामने  प्रेसीडेंट ट्रंप की तुलना यीशू मसीह से कर दी थी.

आप यहां पर गॉड की वजह से हैं. मिस्टर प्रेसीडेंट किसी ने इतना कष्ट नहीं उठाया जितना कि आपने ने उठाया है. आप पर हमला हुआ. आपको धोखा दिया गया. आप अरेस्ट हुए. गलत तरह से दोषी बनाए गए. ये बहुत प्रचलित तरीका है. ईश्वर ने हमें बताया है. लेकिन ये उनके हाथ में नहीं था.  ईश्वर के पास कुछ और ही प्लान थे. वो अपनी मृत्यु के तीसरे दिन फिर जीवित हुए. उन्होंने बुराई को हराया. वो जीते. चूंकि वो जीते थे इसलिए आप भी जीतेंगे.

लेडी पॉस्टर

अमेरिका में युद्ध के दौरान धर्म के भड़कीले इस्तेमाल पर ईसाइयों के सबसे बड़े गुरू पोप ने वेटिकन से पाम संडे और बाद के भाषणों में कहा कि यीशु को किसी भी युद्ध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. ईश्वर उन लोगों की प्रार्थनाएं नहीं सुनता जो युद्ध छेड़ते हैं. जिनके हाथ खून से भरे हैं, उनकी प्रार्थनाएं अस्वीकार कर दी जाती हैं.

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इसके बाद ट्रंप ने जब एक रात में ईरान के खिलाफ 'सभ्यता के अंत' वाली धमकी दी तो उसे भी पोप ने 'बहुत गलत और धर्मविरूद्ध' कहा. इस पर डोनाल्ड ट्रंप नाराज हो गए और उन्होंने  पोप के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया.

नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा, क्योंकि पोप लियो ने कुछ ऐसी बातें कही हैं जो गलत हैं.  ईरान के संबंध में जो मैं कर रहा हूं, वह उसके बहुत खिलाफ थे. हम परमाणु शक्ति संपन्न ईरान को स्वीकार नहीं कर सकते. पोप लियो अंतिम परिणाम से खुश नहीं होंगे. सैकड़ों मिलियन लोग मारे जा सकते हैं और मैं ऐसा होने नहीं दूंगा. इसलिए मैं माफी नहीं मांग सकता. मुझे लगता है कि वह अपराध और कुछ अन्य मुद्दों पर बहुत कमजोर हैं. तो मैं मतलब, उन्होंने सार्वजनिक रूप से बात कही. मैं सिर्फ पोप लियो की बातों का जवाब दे रहा हूं और आप जानते हैं, उनके भाई एक बड़े MAGA समर्थक हैं और वे बहुत अच्छे इंसान हैं, लुईस. और मैंने कहा कि मुझे लुईस पोप से ज़्यादा पसंद हैं. हम कानून और व्यवस्था में मजबूती से विश्वास करते हैं और उन्हें इससे समस्या लगती है, तो—इसमें माफी मांगने जैसी कोई बात नहीं है. वह गलत हैं. दूसरी बात यह है कि उन्हें ईरान के बारे में हमारा रुख पसंद नहीं आया, लेकिन ईरान एक परमाणु राष्ट्र बनना चाहता है ताकि वे दुनिया को खत्म कर सकें. ऐसा नहीं होने वाला.

डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति
पोप ने ट्रंप के बयानों का विरोध किया और कहा कि वो उनसे डरते नहीं हैं. यहां ये बताना जरूरी है कि इस समय वेटिकन के प्रधान पोप लियो अमेरिकी मूल के हैं.
मैं मूल रूप से यही कह रहा था कि चर्च का संदेश, मेरा संदेश, गॉस्पेल का संदेश ‘धन्य हैं वे जो शांति स्थापित करते हैं'. मैं अपनी भूमिका को राजनीतिक या किसी राजनेता की भूमिका के रूप में नहीं देखता. मैं उनके साथ किसी बहस में नहीं पड़ना चाहता. मुझे नहीं लगता कि कुछ लोग गॉस्पेल के संदेशों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. मैं युद्ध के खिलाफ खुलकर बोलता रहूंगा, शांति को बढ़ावा देने के लिए, संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए, और देशों के बीच बहुपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए, ताकि समस्याओं का न्यायसंगत समाधान खोजा जा सके. आज दुनिया में बहुत से लोग पीड़ा झेल रहे हैं, बहुत से निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, और मुझे लगता है कि किसी न किसी को खड़ा होकर यह कहना होगा कि इसे करने का एक बेहतर तरीका भी है.

पोप लियो

वेटिकन के प्रधान पोप

युद्ध के दौरान धर्म के इस्तेमाल का मुद्दा पोप प्रकरण के बाद थोड़ा ज्यादा ही घूम गया. युद्ध छेड़ने के लिए आलोचना झेल रहे ट्रंप को पोप के खिलाफ बोलने पर भी विरोध झेलना पड़ा. उनके करीबी राजनीतिक नेताओं ने भी ट्रंप का विरोध किया. दावा किया गया कि ट्रंप चाहते हैं कि महान धार्मिक गुरू उनके युद्ध को जायज ठहराएं जबकि ऐसा हो नहीं रहा तो ट्रंप ने पोप को भी नहीं  छोड़ा.

पोप के बारे में दिए गए बयानों का विरोध करती हूं. मैं पोप लियो के समर्थन में उनके साथ खड़ी हूं. मैं यहां ये भी कहना चाहती हूं कि मुझे बिल्कुल वो समाज बिल्कुल अच्छे नहीं लगते हैं जहां धार्मिक नेता राजनीतिक नेताओं के इशारे पर चलते हैं,बोलते हैं. मैं नहीं चाहती की मुझे वैसी दुनिया से पहचाना जाए. इसलिए मैं असहमत हूं और मैंने इसे जाहिर भी किया है.

जियोर्जिया मेलोनी

इटली की प्रधानमंत्री

ईसा मसीह की वह छवि ईमानदारी से कहूं तो वह उन लोगों के लिए कुछ भी सकारात्मक योगदान नहीं देती जो बहुपक्षीय व्यवस्था में विश्वास करते हैं, और जो लोकतंत्र में आस्था रखना चाहते हैं. मैं पोप लियो XIV के साथ एकजुटता दिखाना चाहता था, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप को लेकर उनकी आलोचना सही है. किसी को भी किसी से डरने की जरूरत नहीं है. किसी को भी किसी से डरने की जरूरत नहीं है. मैंने ट्रंप से कहा कि तुम्हें बार बार यह कहने की जरूरत नहीं है कि तुम्हारे पास दुनिया का सबसे बड़ा युद्धपोत है. मैं तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करना चाहता.

लूला डीसिल्वा

राष्ट्रपति,ब्राजील

यहां आपको बता दें कि मध्ययुग में जब ईसाई और इस्लाम के बीच यरुशलम पर कब्जे के कुख्यात युद्ध क्रूशेड्स शुरू हुए तो पहले युद्ध को पोप का आशीर्वाद प्राप्त था. इस्लाम, यहूदी और क्रिश्चियन्स के बीच धर्मयुद्ध का इतिहास पुराना है. इस्लाम के जन्म लेने के बाद से ही मिडिल ईस्ट में धर्म के नाम पर सत्ता और शक्ति का बंटवारा रहा है. इजरायल और वेस्टबैंक के बीच में यरुशलम इसका सबसे बड़ा सबूत है. एक छोटी सी जगह में तीनो धर्मों के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं. यहूदियों की वेस्टर्न वॉल, ईसाइयों का चर्च ऑफ़ द होली सेपल्कर, इस्लाम का अल-अक्सा-मस्जिद परिसर या डोम ऑफ दि रॉक्स. इनपर कब्जे की लड़ाई चार-पांच हजार से चली आ रही है. आजतक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला है. ईरान में जब से अयातुल्लाह का शासन आया तो उनका घोषित एजेंडा है यरूशलम पर अधिकार।ऐसे इतिहास से जब वर्तमान टकराता है तो उसके दामन पर भी धर्म का चित्र सबसे बड़ा नजर आता है. ईरान के साथ इज़रायल और अमेरिका की लड़ाई में भी यही हो रहा है.

धर्मयुद्ध का इतिहास और इस्लाम

दुनिया के नक्शे पर इजरायल और वेस्टबैंक की सीमा पर बना यरूशलम है. यहां की तस्वीरें जैसे ही सामने आती हैं तो सोने के रंग में चमकता गुंबद सबसे ज्यादा दिखाई देता है. इसे इस डोम ऑफ रॉक कहा जाता है. दावा है कि ये ईमारत 691-692 ई. में तैयार की गयी है. इसे इस्लामिक आर्किटेक्चर के प्राचीनतम निर्माण में से एक माना जाता है. इसके बारे में मान्यता है कि मोहम्मद साहब यहीं से मिराज के लिए गए थे. ये इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद तीसरी पवित्र जगह मानी जाती है.

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इसे अल-कुदूस भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पवित्र. इसी के नाम पर 1979 में अयातुल्लाह रुहेल्ला खुमैनी ने अल-कुदस डे की शुरूआत की थी. ये दिन रमजान के आखिरी जुमे को मनाया जाता है. इसका सीधा संदेश है यरुशलम में इज़रायली कब्जे का विरोध और फिलिस्तीनी राज्य की मांग का समर्थन. ईरान के पास एक सेना भी है, जिसका नाम है- कुदुस फोर्स- ये IRGC की वो शाखा है जो विदेश में इस्लामिक क्रांति के मकसद को पूरा करती है. ईरान से बाहर देश के एजेंडे को पूरा करती है. हिज्बुल्लाह हमास, हूती, शिया मिलिशिया, इराक और सीरिया में सक्रिय रेजिस्टेंस फ्रंट का रेग्यूलेशन कुदुस फोर्स ही करती है. इसी के प्रमुख का नाम कासिम सुलेमानी था. जिसकी तारीफ ट्रंप भी करते हैं और कहते हैं कि अगर कासिम सुलेमानी को इराक में न मारा गया होता तो ईरान पर हमला करना मुश्किल था. ये कुदुस फोर्स ही ईरान के एसेमेट्रिक वॉर की जान है. शिया क्रिसेंट के पीछे भी कुदुस फोर्स की ही ताकत मानी जाती है. ईरान जब होर्मुज में घिरता दिखता है तो यमन में बैठा हूती बाब अल मंदाब को घेरने का दावा करता है. हिज्बुल्लाह तो लगातार ईरान के कंधे से कंधा मिला कर इजरायल को लेबनान के मोर्चे पर  युद्ध में उलझा कर रखता है. इस तरह से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के खिलाफ ट्रू प्रॉमिस के युद्ध का धार्मिक चेहरा बहुत साफ साफ दिखता है.

धर्मयुद्ध का इतिहास और यहूदी

यरूशलम में यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल है. इसका नाम है वेस्टर्न वॉल या दीवारः ए-गिरियाह. यहूदी इसे अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक राजधानी मानते हैं. उनका दावा है कि 1000 ईसी पूर्व राजा डेविड ने टेंपल माउंट बनवाया था जोकि 586 ई.पूर बेबीलोनियन हमले में नष्ट हुआ था. इसके बाद यहीं सुलेमान का मंदिर बना. जिसे 76 ईस्वी में रोमन हमले के दौरान नष्ट कर दिया गया. तबसे यहूदी पवित्र मंदिर की निशानी वेस्टर्न वॉल ही बची है. यहूदी अपनी धार्मिक किताब के हवाले से मानते हैं कि जब यहूदी राष्ट्र की स्थापना होगी तो यहीं पर यहूदियों का पवित्र मंदिर फिर से जिंदा किया जाएगा. 1099-1187 तक यरूशलम के लिए क्रिश्चियन और इस्लामी शासक लड़ते रहे. 1517 से 1917 यहां तुर्की शासन रहा. ये दौर सहअस्तित्व का माना जाता है. 1917 से 1948 वो वक्त है जब यरूशलम के संघर्ष में यहूदियों की वापसी होती है. यहूदी-अरब संघर्ष शुरू होता है. 1947 में यूएन यरूशलम को अन्तरार्ष्ट्रीय शहर का प्रस्ताव आता है. 1948 से अरब-इजरायल युद्ध शुरू हो जाता है. इजरायल स्वतंत्र राष्ट्र बन जाता है. फिलिस्तीन राज्य की सत्ता और पहचान खतरे में पड़ जाती है. लेकिन फिलिस्तीनी दावा करते हैं कि यरूशलम उनकी राजधानी है. 1967 में प्रसिद्ध सिक्स डे वॉर होता है इजरायल यरूशलम पर पूरा नियंत्रण कर लेता है. 1979 में ईरान इस्लामिक रिपब्लिक बनता है तब से ईरान और इज़रायल के बीच यरूशलम भी युद्ध का मुद्दा है. इज़रायल के भीतर हमास, लेबनाम और जॉर्डन में हिज्बुल्लाह और इराक-सीरिया में एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस को समर्थन देकर ईरान इस धार्मिक लड़ाई को आगे बढ़ा रहा है और तभी से ईरान, अमेरिका और ब्रिटेन के निशाने पर है.

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धर्मयुद्ध का इतिहास और ईसाई

यरूशलम में ईसाइयों का प्रसिद्ध तीर्थ चर्च ऑफ दि होली सेपल्कर है. माना जाता है कि यहीं पर ईसा मसीह के जीवन से जुड़ी तीन प्रमुख घटनाएं हुईं. पहली लास्ट सपर, दूसरी यही यीशू को सलीब पर चढ़ाया गया और तीसरी यहीं ईसा मसीह दफनाए गए और यहीं पर फिर से जिंदा हुए. मध्यकाल में ईसाई और इस्लामिक शक्तियों के बीच लगातार युद्ध हुए जिनका मकसद यरूशलम पर कब्जा ही था. जिन्हें CRUSADES या धर्मयुद्ध कहा गया. क्रूसेड्स का इतिहास और दौर बहुत खूनी और हिंसक बताया जाता है. 

बीते 4000-से-5000 वर्षों में यरूशलम पर कब्जे की लड़ाई में तीनो धर्म के बीच में करीब 52 से अधिक बार हमले हुए हैं.23 बार यरुशलम की घेरेबंदी हुई है. यरूशलम 2 बार पूरी तरह से तबाह हो गया. करीब 44 बार किसी एक धर्म को हटा कर दूसरा धर्म यरुशलम पर कब्जा करने में सफल हुए.

धार्मिक विरोध का इतिहास वर्तमान की सोच में भी मौजूद है. ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना के कमांडर अपने सैनिकों को धार्मिक किताबों में लिखी गयी बातों का हवाला दे रहे हैं. अर्मागिडान और ईसा मसीह के फिर से जीवित होने की दुहाई दे कर युद्ध में उतरने के लिए तैयार कर रहे हैं.

युद्धमंत्री के भाषण में धर्म के अवशेष

धार्मिक तकरार की स्थिति सभ्याताओं के समाजिक व्यव्हार में आ गयी है. अमेरिका के युद्ध मंत्री बात बात में अपने देश के लिए ईश्वर की विशेष कृपा का दावा करते हैं. ईश्वर का हवाला देकर राष्ट्रपति ट्रंप से नैतिक सवाल पूछे जाते हैं. वो धार्मिक लहजे में ही उनका जवाब देते हैं. युद्ध के दौरान जब मीडिया सरकार को न पसंद आने वाले सवाल पूछता है तो अमेरिका के युद्ध मंत्री बाइबिल के खास शब्द फैरसी का इस्तेमाल करके उन्हें कटघरे में खड़ा करते हैं.

हमारा प्रेस ठीक उन्हीं फ़रीसियों की तरह है— आप सभी नहीं, आप सब नहीं, बल्कि ट्रंप विरोधी लिगेसीप्रेस. राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति आपकी राजनीतिक द्वेषपूर्ण भावना आपको हमारे अमेरिकी योद्धाओं की उत्कृष्टता देखने से लगभग पूरी तरह अंधा कर देती है. फ़रीसी हर अच्छे कार्य की बारीकी से जांच करते थे ताकि कोई कमी ढूंढ सकें; वे केवल नकारात्मक बातों पर ही ध्यान देते थे. हमारे प्रेस बहुत कठोर हैं वो केवल आरोप लगाने के लिए तैयार किए गए हैं. मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप अपनी आंखें खोलें—हमारे सैनिकों की अच्छाई, उनकी ऐतिहासिक सफलता, इस राष्ट्रपति के साहस और उस ऐतिहासिक क्षण को देखें जो ईरानी परमाणु खतरे को समाप्त कर सकने वाले समझौते की दिशा में है. आपकी आंखों के सामने खड़ी युद्धक्षेत्र में हुई असाधारण जीत को देखें. एक नहीं, बल्कि दो-दो अविश्वसनीय से लगने वाले रेस्क्यू मिशन पूरे किए हैं जो कि चमत्कार लगते हैं. लेकिन अमेरिकी जनता, जिनके दिलों में अच्छाई है, हमारे  प्रेस के इन फ़रीसियों से आगे देखती है. वे अच्छाई देखते हैं—आप भी जो देख रहे हैं, आप अच्छाई देखते हैं. वे सफलता देखते हैं, वे वास्तविकता देखते हैं और वे पूर्णता की मांग नहीं करते और किसी भी युद्धक्षेत्र में पूर्णता संभव नहीं होती.

पीट हेगसेथ

अमेरिका के वॉर मंत्री

अमेरिका के युद्धमंत्री पीट हेगसेथ जिस शब्द फरीसी का प्रयोग मीडिया की आलोचना के लिए कर रहे थे उसका इस्तेमाल प्राचीन इतिहास में उन यहूदियों के लिए किया जाता था जो धर्म के पालन में कोई ढील नहीं देते थे. ये ईसा मसीह के समकालीन थे. वक्त पहली सदी ईसा पूर्व या पहली सदी ईस्वी का माना जाता है. खुद ईसा मसीह ने फ़रीसियों को दिखावटी या पाखंडी कह कर उनकी आलोचना की है. धर्म के विरोध जब अपने समाज में इतनी लंबी दूरी तय करके मौजूद रहते हैं तो सोचिए अलग अलग धर्मों में उनकी गति कितनी ज्यादा होती होगी. ऐसे में क्या ये माना जाए कि राजनीति में धर्म का इस्तेमाल या धर्म को ही राजनीति बना लेने का अनिवार्य नतीजा है हिंसक टकराव और युद्ध.

ईरान युद्ध के दौरान जब एक अमेरिकी पायलट का रेस्क्यू किया गया तो प्रेसीडेंट ट्रंप ने उसे "ईस्टर का चमत्कार" कहा था. 7 फरवरी 2025 में ट्रंप ने व्हाइट हाउस फेथ ऑफिस की स्थापना करवायी जिसका मकसद है सरकार की हर नीति में धार्मिक समुदायों की आवाज को शामिल करना. अब अमेरिका के हर सरकारी विभाग में एक फेथ डायरेक्टर नियुक्त किया जाएगा. जो सुनिश्चित करेंगे कि सरकारी फैसले धार्मिक मान्यताओ के विरूद्ध न जाएं.  ईरान में भी सुप्रीम लीडर की संस्था यही एश्योर करती है कि संसद और सरकार शरिया कानून के मुताबिक चले.

धर्मयुद्ध के सामाजिक रूझान

अमेरिका में पीऊ रिसर्च ने एक सर्वे किया है. जिसमें उनका दावा है कि अमेरिका में 31% नागरिकों ने माना है कि सार्वजनिक जीवन में धर्म का प्रभाव बढ़ रहा है. 59% वयस्क ने माना की धर्म समाज के लिए अच्छा है. 58% अमेरिकी मानते हैं कि धार्मिक मान्यता और मुख्य अमेरिकी संस्कृति में टकराव होता है. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स में धर्म को लेकर स्पष्ट विभाजन है. 78% रिपब्लिकन धर्म को सकारात्मक मानते हैं.

इससे साफ लगता है कि अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां धर्म फिर से सत्ता और समाज के केन्द्र में आ रहा है. इज़रायल में लगातार यु्द्ध की वजह से लोगों में धर्म के प्रति सम्मान बढ़ा है. सरकार में ऐसे राजनीतिक दलों का महत्व बढ़ा है जो कट्टर धार्मिक हैं. इज़रायल में धर्म और लोकतंत्र में कौन श्रेष्ठ होगा इसे लेकर भी काफी विरोध है. ईरान तो एक धार्मिक गणतंत्र है वहां धर्म के बिना किसी भी चीज की कल्पना करना ही संभव नहीं है.

कोई सरकार या नेता कभी अपने समाज से अलग नहीं होता है. वो वही करता है जो उसका समाज सोचता या पसंद करता है. ये संयोग नहीं है कि तीनो ही देश धर्म की कतार में खड़े हैं और यही कारण है कि ईरान में आतंरिक विद्रोह की कोशिश सफल नहीं हुई. यही वजह है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप बार बार ईसा मसीह बनकर आते हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ईरान पर अपने हमले को सही साबित करने के लिए चंगेजखान और ईसा मसीह का उदाहरण देते हैं. युद्ध के दौरान धर्म के इस्तेमाल और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग सबूत है कि तीनो देशो में धर्म के प्रति आम नागरिक की सोच बदल रही है. धर्म का महत्व बढ़ रहा है. शायद इसीलिए इस युद्ध का डायरेक्ट चेहरा भले ही तेल,मिसाइल ,परमाणु कार्यक्रम और इजरायल के अस्तित्व की लडाई दिख रहा हो लेकिन पर्दे के पीछे असली चेहरा धर्म युद्ध ही है.