मालिक ने AI से अपने कुत्ते के लिए बना ली वैक्सीन, लास्ट स्टेज का कैंसर भी ठीक होने लगा

AI vaccine for Dogs: कोनिंघम नाम के एक AI कंस्लटेंट ने AI प्रोग्राम का उपयोग करके वास्तविक mRNA अनुक्रम (सिक्वेंस) तैयार किया. कुत्ते का मास्ट सेल कैंसर अब आंशिक रूप से कम हो गया है और उसका सबसे बड़ा ट्यूमर (गांठ) काफी छोटा हो गया है.

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कोनिंघम ने AI से अपने कैंसर से बीमार कुत्ते के लिए वैक्सीन बना ली
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  • ऑस्ट्रेलियाई व्यक्ति पॉल कोनिंघम ने AI की मदद से अपने कुत्ते रोजी के कैंसर के लिए mRNA वैक्सीन विकसित की
  • कोनिंघम ने चैटजीपीटी और अन्य AI चैटबॉट्स से सलाह लेकर रोजी का जीनोम सीक्वेंसिंग कराकर डीएनए की खराबी पहचानी
  • रोजी के कैंसर के इलाज में AI आधारित वैक्सीन के बाद ट्यूमर का आकार कम हुआ और उसकी गतिविधि में सुधार आया
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AI vaccine: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI से आपने फोटो एडिट करना सुना होगा, कॉलेज प्रेजेंटेशन के लिए नोट्स तैयार करना सुना होगा... लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा था कि AI से एक आम इंसान वैक्सीन भी खुद से बना सकता है. वैक्सीन भी ऐसा जो वाकई काम भी करता है. ऑस्ट्रेलिया में ठीक यही है. अपने बीमार कुत्ते की मदद करने की बेताबी में एक ऑस्ट्रेलियाई व्यक्ति ने AI पर ही रिसर्च करने का लंबा और जटिल रास्ता अपनाया. उसने AI की मदद से अपने कुत्ते के लिए एक उसकी बीमारी के हिसाब से वैक्सीन तैयार किया और उसे लगाने के लिए टॉप के वैज्ञानिकों को भी खोज लिया.

एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार पॉल कोनिंघम नाम एक एक AI कंस्लटेंट ने एक कुत्ते रोजी को गोद लिया था लेकिन उसे कैंसर हो गया. सिडनी में रहने वाले कोनिंघम ने बताया कि इस इलाज के बाद आठ साल की रोजी को होने वाला मास्ट सेल कैंसर अब आंशिक रूप से कम हो गया है और उसका सबसे बड़ा ट्यूमर (गांठ) काफी छोटा हो गया है.

उन्होंने कहा कि दिसंबर में उनके बनाए mRNA वैक्सीन और शक्तिशाली इम्यूनोथेरेपी दिए जाने के बाद “उसकी चलने-फिरने और काम करने की क्षमता काफी हद तक वापस आ गई.” कोनिंघम ने अपनी खोज और इलाज को पूरा समाधान नहीं कहा है. लेकिन इस मामले से जुड़े न रहने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यह दिखाता है कि AI मेडिकल फिल्ड में रिसर्च को तेज करने में कितनी मदद कर सकता है.

कैसे बनाई वैक्सीन?

कोनिंघम ने कहा कि वे रोजी के कैंसर के इलाज को गहराई से समझने के लिए चैटजीपीटी, जेमिनी और ग्रो्क के साथ लगातार बातचीत करते रहते थे. ये सभी AI से लैस चैटबॉट हैं. चैटबॉट्स की सलाह पर उन्होंने 3000 डॉलर खर्च करके रोजी का जीनोम सीक्वेंसिंग करवाया और AI की मदद से उसके डीएनए के आंकड़ों का विश्लेषण किया. यानी पता किया कि डीएनए में क्या खराबी है.

इसके बाद उन्होंने अल्फाफोल्ड का उपयोग किया, जो एक वैज्ञानिक AI मॉडल है और जिसने 2024 का रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) का नोबेल पुरस्कार जीता था. इससे उन्होंने कुत्ते के एक बदले हुए जीन को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश की. इसके बाद कोनिंघम ने न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी की एक टीम की मदद ली. उनके पास जाने का यह सुझाव भी चैटजीपीटी ने ही दिया था. आखिर में कोनिंघम ने ऑस्ट्रेलिया के अन्य शिक्षाविदों की सहायता से अपने रिसर्च को वास्तविक रूप दिया.

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समय के साथ ठीक हो रहीं गांठ

डॉक्टर तो शुरू में बता नहीं पाए थे कैंसर है

कोनिंघम ने बताया कि डॉक्टर तो रोजी के कैंसर को लगभग एक साल तक तक पकड़ ही नहीं पाए. उन्होंने कहा, “मैं उसे तीन बार पशु चिकित्सक के पास ले गया. और दो बार डॉक्टर ने कहा कि चिंता मत करो, यह सिर्फ एक लाल चकत्ते (रैशेज) जैसा है.” लेकिन रोजी की हालत बिगड़ती गई और 2024 में की गई बायोप्सी से पता चला कि उसे वास्तव में अंतिम चरण का कैंसर है.

कीमोथेरेपी, सामान्य इम्यूनोथेरेपी और सर्जरी आजमाने के बाद इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा था और कोनिंघम को और विकल्प चाहिए थे. इसलिए उन्होंने AI की मदद से नए इलाजों की दुनिया में गहराई से खोज की, जिनमें mRNA वैक्सीन भी शामिल हैं. ये वैक्सीन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को प्रशिक्षित करती हैं और कोविड महामारी के दौरान इनका व्यापक उपयोग हुआ था.

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कोनिंघम ने AI प्रोग्राम का उपयोग करके वास्तविक mRNA अनुक्रम (सिक्वेंस) तैयार किया. फिर वह जानकारी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों को दी. न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्टिन स्मिथ, जिन्होंने रोजी का जीनोम सीक्वेंस किया, ने कहा, “यह किसी भी तरह से क्लीनिकल ट्रायल नहीं था” और “यह भी नहीं कहा जा सकता कि AI ने कैंसर ठीक कर दिया.” उन्होंने कहा कि असल में यह सब अपने कुत्ते की मदद करने की कोनिंघम की दृढ़ इच्छा से संभव हुआ.

स्मिथ ने कहा कि “तीन अलग-अलग नई तकनीकों का संयोजन- जीनोम सीक्वेंसिंग, AI और RNA आधारित इलाज- नई संभावनाएं और चुनौतियां दोनों प्रस्तुत करता है.”

AI की संभावनाएं और खतरे

चैटबॉट्स ने कोनिंघम को वैक्सीन की नैतिक अनुमति से जुड़ी लंबी कागजी प्रक्रिया को समझने में भी मदद की. अपने नए वैज्ञानिक नेटवर्क के माध्यम से उनकी मुलाकात क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर से हुई, जिन्होंने इस विशेष इलाज को लागू किया. हालांकि सभी ट्यूमर वैक्सीन को लेकर उतनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया नहीं दे पाए जितनी सबसे बड़े ट्यूमर ने दी. इसके बाद रोजी की एक और सर्जरी करनी पड़ी और यह स्पष्ट नहीं है कि वह और कितने समय तक जीवित रहेगी.

न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के आरएनए संस्थान के डॉयरेक्टर पॉल थॉरडारसन, जिन्होंने वैक्सीन बनाई, ने कहा कि “संक्षिप्त उत्तर यह है कि हमें पक्का नहीं पता” कि रोजी के सबसे बड़े ट्यूमर का आकार आखिर क्यों कम हुआ.

मेडिकल कॉलेज ऑफ विस्कॉन्सिन के निक सेमेनकोविच इस मामले से जुड़े नहीं हैं. उन्होंने एएफपी को बताया कि “AI में हमारे रिसर्च करने के तरीकों को बेहतर बनाने और तेज करने की बड़ी संभावना है.” वहीं हांगकांग की चीनी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पैट्रिक तांग मिंग-कुएन ने कहा कि AI आधारित रिसर्च पालतू जानवरों और इंसानों दोनों को जीवित रहने में मदद कर सकता है, हालांकि गलतियों का खतरा भी रहता है.

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उन्होंने कहा कि AI घास के ढेर में सुई खोजने जैसे काम को डेटा-आधारित चयन प्रक्रिया में बदल देता है, जिससे डाइग्नोसिस और वैक्सीन तैयार होने के बीच का समय बहुत कम हो जाता है.

कोनिंघम की कहानी दुनिया भर में फैलने के बाद स्मिथ ने कहा कि उनकी टीम को अब कई नए अनुरोध मिलने लगे हैं. उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं- मेरी बिल्ली को बीमारी है, मेरे कुत्ते को बीमारी है, मेरी मौसी को बीमारी है.” लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा, “हमारे लिए हर मामले में मदद करना आसान नहीं है. इसके लिए कई चीजों का सही तरीके से मिलना जरूरी होता है.”

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