श्रीनगर/बडगाम: ईद की छुट्टियों के बाद सोमवार को कश्मीर में जैसे ही स्कूल‑कॉलेज खुले, घाटी में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली. बडगाम के एक इमामबाड़े में 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा आफरीन अपनी पढ़ाई पर निकलने से पहले ईरान के समर्थन में चल रहे चंदा अभियान का हिस्सा बनने पहुंचीं. पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच आफरीन और उनके परिवार ने ईरान की मदद के लिए नकद राशि और कीमती सामान दान किया. घाटी के अलग‑अलग इलाकों में स्थित इमामबाड़ों में ईरान के लिए दुआओं की गूंज के साथ‑साथ दान का सिलसिला भी लगातार जारी है. नगद पैसे, चेक, सोना‑चांदी, तांबे के बर्तन, कश्मीरी शॉल और दूसरी कीमती वस्तुएं बड़ी संख्या में संग्रह केंद्रों तक पहुंच रही हैं. यह अभियान सिर्फ आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि शिया समुदाय की भावनात्मक, धार्मिक और राजनीतिक एकजुटता को भी दर्शाता है.
आफरीन कहती हैं, “जब हम कहते हैं कि हमारी जान ‘रहबर’ (आयतुल्लाह खामेनेई) पर कुर्बान है, तो उनके मिशन में योगदान देना हमारा फर्ज बन जाता है। मेरे पास जो थोड़ी‑सी बचत थी, वह मैंने दान कर दी। मेरी एक सहेली ने अपना सोना भी दे दिया.”
महिलाएं और बच्चे भी निभा रहे भूमिका
बडगाम के एक संग्रह केंद्र पर एक बुजुर्ग महिला अपने दिवंगत पति की आखिरी निशानी सोने के गहने लेकर पहुंचीं. 28 साल पहले पति को खो चुकी इस महिला ने आंसुओं के साथ कहा कि वह खुद को रोक नहीं सकीं और ईरान की मदद के लिए अपनी सबसे कीमती चीजें दान कर दी.
ईद के मौके पर बच्चों को मिलने वाली ‘ईदी’ भी इस अभियान का हिस्सा बन गई. कई बच्चों को अपनी गुल्लकें और ईद के तोहफे दान करते हुए देखा गया. छोटे हाथों से बड़े जज्बे के साथ दिया गया यह योगदान पूरे माहौल को भावुक बना रहा है.
आभूषणों और नकदी का अंबार
दान केंद्रों पर झुमके, चूड़ियां, सोने के सिक्के, विभिन्न डिज़ाइन की अंगूठियां, भारी मात्रा में नकद और अनगिनत करेंसी नोट जमा हैं. दान देने वालों का कहना है कि वे इसे सिर्फ मदद नहीं, बल्कि अपने मजहब और इस्लाम की रक्षा का हिस्सा मानते हैं. कई लोगों ने इस बात पर अफसोस भी जताया कि मौजूदा हालात में किसी भी मुस्लिम देश की ओर से ईरान को खुला समर्थन नहीं मिल रहा.
एजाज हुसैन कहते हैं, “हम यह दान इस्लाम के लिए कर रहे हैं. जिस धर्म पर इज़रायल और अमेरिका ने हमला किया है, उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है. जब ईरान अपने दीन को बचाने के लिए लड़ रहा है, तब मुस्लिम मुल्कों की खामोशी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.”