2015 के बिहार चुनाव में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण समीक्षा वाले बयान को लालू यादव ने "आरक्षण खतरे में है" नैरेटिव में बदल दिया था और महागठबंधन ने NDA को हरा दिया था. अब लगभग एक दशक बाद वही कहानी 2027 के यूपी चुनाव में दोहराती दिख रही है, बस शब्द बदल गए हैं - "आरक्षण खत्म होगा" से "आरक्षण में सुधार होना चाहिए".यह सुधार की मांग NDA के सहयोगी दल ही कर रहे हैं, जो ओबीसी और अनुसूचित जाजि समाज से आते हैं. एक तरफ जाटव, कुर्मी-कोइरी, राजभर, निषाद, अपना दल जैसे नेता कह रहे हैं कि आरक्षण गरीब को मिलना चाहिए, जो सांसद-विधायक बन गया वो स्वेच्छा से छोड़े, क्रीमी लेयर लगे. बिहार में जीतन राम मांझी समीक्षा की हिमायत कर रहे हैं तो वहीं चिराग पासवान उन पर फायर हैं- "तो मान लीजिए दलित को घोड़ी पर चढ़ने से, मंदिर जाने से रोका जाएगा." विपक्ष इसे RSS के इशारे पर हो रहा बता रहा है.