Bhojshala case verdict: मुस्लिमों की नहीं, हिंदुओं की है भोजशाला... फैसले पर हरिशंकर जैन ने क्या कहा?

धार/इंदौर. भोजशाला विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब देशभर में नई बहस छिड़ गई है. कोर्ट ने इस परिसर को मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया है और 2003 के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें नमाज की अनुमति दी गई थी. इसके बाद दोनों पक्ष खुलकर सामने आ गए हैं, और मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक जाने की तैयारी में है.

हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन और हरिशंकर जैन ने इस फैसले को “सनातन की जीत” बताया है. उनका कहना है कि यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक न्याय है. उन्होंने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में मिले साक्ष्य—जैसे संस्कृत श्लोक, देवी-देवताओं की मूर्तियां और मंदिर के अवशेष—ने यह साबित कर दिया कि यह स्थल मूल रूप से मंदिर ही था.

बताया जा रहा है कि कोर्ट में पेश एएसआई रिपोर्ट सैकड़ों पन्नों की थी, जिसमें खुदाई के दौरान मिले प्रमाणों का विस्तृत उल्लेख किया गया. इन सबूतों ने ही हिंदू पक्ष के दावे को मजबूत किया और कोर्ट ने परिसर को मंदिर का स्वरूप माना.

वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने फैसले पर असहमति जताते हुए कहा है कि वे इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे. उनका कहना है कि 2003 में नमाज की अनुमति दी गई थी, जिसके पीछे भी कुछ आधार रहे होंगे. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित और जिम्मेदार भाषा का इस्तेमाल जरूरी है.

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला अयोध्या केस की तरह ही जटिल और संवेदनशील रहा है. 25 दिनों तक चली लगातार सुनवाई में कोर्ट ने न सिर्फ दस्तावेजी सबूत देखे, बल्कि जजों ने खुद मौके का निरीक्षण भी किया, जो ऐसे मामलों में बहुत कम देखने को मिलता है.

फैसले का एक अहम हिस्सा यह भी है कि मुस्लिम पक्ष चाहें तो सरकार से वैकल्पिक जमीन के लिए आवेदन कर सकता है. वहीं, कोर्ट ने सरकार को भोजशाला परिसर के प्रबंधन को लेकर उचित व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया है.

इस फैसले के बाद अब काशी और मथुरा जैसे अन्य विवादित स्थलों को लेकर भी सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. कई लोग इसे एक बड़े ट्रेंड की शुरुआत मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं. कुल मिलाकर, भोजशाला पर आए इस फैसले ने एक पुराने विवाद को नई दिशा दी है, लेकिन यह साफ है कि अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट में ही तय होगा.
 

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