- उत्तराखंड में इस साल चार धाम यात्रा के दौरान 48 श्रद्धालुओं की खराब स्वास्थ्य के कारण मौत हुई
- ऊंचाई 3000 मीटर से अधिक होने के कारण श्रद्धालुओं का शरीर वातावरण के अनुसार अनुकूलित नहीं हो पाता
- बेहतर सड़कों,निजी वाहनों के कारण श्रद्धालु बिना रुके सीधे धामों तक पहुंचकर अचानक कठिन चढ़ाई पर निकल जाते हैं
उत्तराखंड में 19 अप्रैल से शुरू हुई चार धाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. अब तक 48 यात्रियों की खराब स्वास्थ्य के चलते मौत हो चुकी है, जिसमें सबसे ज्यादा मामले केदारनाथ धाम से सामने आए हैं. इस साल उत्तराखंड में चार धाम यात्रा 19 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है. यात्रा के दौरान अब तक 48 श्रद्धालुओं की खराब स्वास्थ्य के चलते मौत हो चुकी है. इनमें केदारनाथ धाम में 26 श्रद्धालुओं की, बदरीनाथ धाम में 8 श्रद्धालुओं की मौत हुई है, जबकि गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में 7-7 श्रद्धालुओं की जान गई है.
19 अप्रैल 2026 से 16 मई 2026 तक यानी 28 दिनों में यह आंकड़ा सामने आया है, जो लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है. इन मौतों में सबसे ज्यादा कारण हार्ट अटैक के है, हालांकि कुछ अन्य कारणों से भी श्रद्धालुओं की मौत हुई है. ऐसा नहीं है कि 2026 की यात्रा में ही इस तरह की घटनाएं हुई हैं, इससे पहले भी चार धाम यात्रा के दौरान खराब स्वास्थ्य के कारण श्रद्धालुओं की मौत होती रही है. इसके पीछे एक बड़ी वजह श्रद्धालुओं की लापरवाही मानी जा रही है. दरअसल, उत्तराखंड के चारों धाम उच्च हिमालय क्षेत्र में स्थित हैं, जिनकी ऊंचाई लगभग 3000 मीटर से अधिक है.
देश के अन्य राज्यों से आने वाले श्रद्धालु सीधे इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जिससे उनका शरीर वहां के वातावरण के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाता, यानी उन्हें एक्लाइमेटाइज होने का समय नहीं मिल पाता. यही वजह कई बार स्वास्थ्य बिगड़ने और मौत का कारण बनती है. एक्सपर्ट के अनुसार, पहले चार धाम यात्रा के दौरान श्रद्धालु अलग-अलग पड़ावों पर रुकते हुए धामों तक पहुंचते थे, जिससे उनका शरीर धीरे-धीरे ऊंचाई के अनुरूप ढल जाता था.
उदाहरण के तौर पर, केदारनाथ जाने वाले श्रद्धालु ऋषिकेश-हरिद्वार से होते हुए रुद्रप्रयाग, गुप्तकाशी, फाटा या सोनप्रयाग में ठहरते थे और फिर अगले दिन यात्रा शुरू करते थे. लेकिन अब बेहतर सड़कों, अच्छी कनेक्टिविटी और निजी वाहनों की उपलब्धता के चलते लोग बिना रुके सीधे गौरीकुंड या सोनप्रयाग पहुंचकर केदारनाथ के लिए निकल जाते हैं. इसी तरह यमुनोत्री धाम के लिए पहले श्रद्धालु ऋषिकेश से होते हुए बड़कोट या जानकी चट्टी में रुकते थे, लेकिन अब सीधे कठिन चढ़ाई पर चढ़ने पहुंच जाते हैं.
बदरीनाथ और गंगोत्री धाम में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है, जहां लोग बिना रुके सीधे धाम पहुंच रहे हैं. गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में पैदल चढ़ाई काफी कठिन है, जहां सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं को परेशानी होती है. ऊंचाई बढ़ने के साथ मौसम भी बेहद ठंडा होता जाता है और ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होती है, जिससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इसके अलावा, कई श्रद्धालु पहले से हृदय रोग, हाई और लो ब्लड प्रेशर, शुगर और दमा जैसी बीमारियों से पीड़ित होते हैं, लेकिन इसके बावजूद बिना डॉक्टर की सलाह के यात्रा पर निकल जाते हैं.
उत्तराखंड सरकार ने इस साल भी श्रद्धालुओं के लिए एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें ऐसी बीमारियों से ग्रसित लोगों को यात्रा से पहले डॉक्टर से सलाह लेने और जरूरी दवाइयां साथ रखने को कहा गया था, लेकिन ज्यादातर मामलों में इसका पालन नहीं किया गया. यही कारण है कि कई लोगों को स्वास्थ्य खराब होने के चलते जान गंवानी पड़ी. वहीं, सरकार की ओर से स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए भी इंतजाम किए गए हैं. चार धाम यात्रा मार्ग पर 47 डेडिकेटेड अस्पताल बनाए गए हैं, इसके अलावा कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी स्थापित किए गए हैं.
केदारनाथ और यमुनोत्री के पैदल रूट पर डॉक्टरों की टीम तैनात की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को तत्काल चिकित्सा सहायता मिल सके. स्वास्थ्य विभाग ने 28 स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के साथ करीब 400 डॉक्टरों की तैनाती भी की है.














