उत्तराखंड में फिर जन्म ले रहा चिपको आंदोलन, 3000 से ज्यादा पेड़ों को बचाने सड़कों पर उतरे लोग

बागेश्वर की लोक गायिका कमला देवी जंगल के बीच माइक पर गीत गा रही हैं, जिसमें दर्द और आक्रोश दोनों झलकते हैं. उनके साथ पद्मश्री से सम्मानित लोग, युवा, महिलाएं और पर्यावरण प्रेमी भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं.

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सड़क चौड़ीकरण का असर सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं
देहरादून:

उत्तराखंड की पहाड़ियों में, जहां हरे-भरे जंगल और ऊंचे पेड़ प्रकृति की सुदंरता में चार चांद लगाते हैं, एक बार फिर विकास के नाम पर इनकी बलि लेने की तैयारी की जा रही है. सड़क चौड़ीकरण के लिए 3,000 से ज्यादा पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव है. यह कोई छोटी संख्या नहीं है, और न ही यह पहली बार हो रहा है कि जब प्रकृति को विकास की भेंट चढ़ाया जा रहा हो. लेकिन इस बार, स्थानीय लोग चुप नहीं बैठे. एक नया चिपको आंदोलन जन्म ले रहा है, और यह कहानी उसी संघर्ष की है.

आंदोलन की शुरुआत

सड़कों पर महिलाएं उतर आई हैं. उनके हाथों में चिपको आंदोलन की जनक गौरा देवी की तस्वीरें हैं. वे नारेबाजी कर रही हैं, पेड़ों की पूजा कर रही हैं, और उन्हें रक्षा सूत्र बांधकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही हैं. ये पेड़ उनके लिए सिर्फ लकड़ी का ढेर नहीं, बल्कि उनके सम्पूर्ण जीवन का आधार हैं. सड़क चौड़ीकरण के नाम पर इन पेड़ों पर आरी चलने वाली है, और इसे रोकने के लिए लोग एकजुट हो गए हैं.

हरियाली का स्वर्ग और उस पर संकट

ऊंचे पहाड़ों से लेकर सड़कों तक, चारों ओर हरियाली का नजारा है. बागेश्वर की लोक गायिका कमला देवी जंगल के बीच माइक पर गीत गा रही हैं, जिसमें दर्द और आक्रोश दोनों झलकते हैं. उनके साथ पद्मश्री से सम्मानित लोग, युवा, महिलाएं और पर्यावरण प्रेमी भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं. यह क्षेत्र शिवालिक एलिफेंट रिजर्व और एलिफेंट कॉरिडोर का हिस्सा है. वन विभाग ने पेड़ों पर कटाई के लिए मार्किंग कर दी है, और 600 करोड़ रुपये की लागत से यह सड़क चौड़ीकरण होना है. मामला नैनीताल हाई कोर्ट में भी विचाराधीन है, लेकिन अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं आया है.

ऋषिकेश का सात मोड़ भी खतरे में

सड़क चौड़ीकरण का असर सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं है. ऋषिकेश का प्रसिद्ध सात मोड़, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, अब इतिहास बनने जा रहा है. इस सड़क को सीधा करने की योजना है, जिससे क्षेत्र की पहचान और पर्यावरण दोनों पर असर पड़ेगा. आंदोलन में शामिल एक्टिविस्ट्स, युवा और पर्यावरण प्रेमी पेड़ों की पूजा कर रहे हैं और राष्ट्रपति के नाम हस्ताक्षरित पत्र तैयार कर रहे हैं. हाथों में पोस्टर ली महिलाएं कहती हैं, "ये जंगल हमारी धरोहर हैं, इन्हें बचाना हमारा कर्तव्य है."

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जलवायु परिवर्तन का संकट

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है. मौसमी चक्र बदल गया है, बारिश और बर्फबारी समय पर नहीं हो रही, और प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं. उत्तराखंड में भी यह संकट गहरा रहा है. फिर भी, नीति नियंता और सरकार सबक लेने को तैयार नहीं दिखते. सड़क चौड़ीकरण के नाम पर 3,000 से ज्यादा पेड़ काटे जाने का फैसला पर्यावरण और वन्यजीवों पर गहरा असर डालेगा. प्रदर्शनकारी कहते हैं कि अगर यह कटाई नहीं रुकी, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

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