- उत्तराखंड में 15 फरवरी से 18 मई तक 295 जंगल आग की घटनाओं में 239.47 हेक्टेयर क्षेत्र जलकर राख हो गया है
- गढ़वाल क्षेत्र में जंगल आग की घटनाएं सबसे अधिक हुई हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट आग पर नियंत्रण के लिए सक्रिय है
- तापमान में वृद्धि और बारिश की कमी के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं
उत्तराखंड में एक बार फिर से जंगल सुलग रहे हैं और इसकी वजह पिछले कुछ समय से बारिश का न होना है. उत्तराखंड में 93 दिनों में 239.47 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो गए हैं. अब तक आग लगने की 295 घटनाएं हुई हैं. उत्तराखंड के गढ़वाल रीजन में सबसे ज्यादा जंगलों में आग लगने की घटनाएं हुई हैं.
वहीं उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र ने अगले एक हफ्ते तक उत्तराखंड में बारिश नहीं होने की संभावना जताई है. मौसम विभाग के मुताबिक, अगले 7 दिनों तक उत्तराखंड में तापमान 3 डिग्री तक और बढ़ सकता है जिसकी वजह से गर्मी ज्यादा होगी. इस कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं और ज्यादा हो सकती हैं.
फॉरेस्ट डिपार्मेंट लगातार आग पर काबू पाने के लिए काम कर रहा है. फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य जंगलों की आग को रिहायशी इलाकों से दूर रखना है.
लगभग 240 हेक्टेयर जलकर राख
जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है वैसे-वैसे उत्तराखंड के जंगल में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं. उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन 15 फरवरी से शुरू होता है और अब तक यानी 15 फरवरी से 18 मई तक लगभग 295 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई हैं, जिसकी वजह से 239.47 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गया है. उत्तराखंड में जंगलों में आग लगने की वजह से 3.5 हेक्टेयर एरिया वह भी जलकर प्रभावित हुआ है जहां प्लांटेशन किया गया था.
क्यों जल रहे हैं जंगल?
उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से बारिश नहीं होने की वजह से तापमान तेजी से बढ़ रहा है , जिसकी वजह से जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं. हवा में नमी की मात्रा बेहद कम हो चुकी है. जमीन का तापमान भी तेज धूप के कारण बढ़ रहा है, जिस कारण जंगलों में सूखी पत्तियों में आग लगने की वजह और ज्यादा प्रबल हो गई है.
उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र ने अगले 7 दिनों तक उत्तराखंड में बारिश नहीं होने की संभावना जताई है. मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल ने NDTV को बताया कि फिलहाल अगले 7 दिनों तक उत्तराखंड में बारिश नहीं होने के आसार दिख रहे हैं जिससे तापमान और बढ़ेगा.
रोहित थपलियाल का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में 20 मई से 22 मई के बीच हल्की बारिश हो सकती है लेकिन उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों और अन्य जिलों में तापमान एक से तीन डिग्री ऊपर रह सकता है. यानी गर्मी और बढ़ेगी. मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल ने बताया कि अभी भी तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री ऊपर चल रहे हैं. बारिश नहीं होने की स्थिति में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती है.
आग लगने की वजह क्या है?
- वैसे तो उत्तराखंड के ज्यादातर क्षेत्रों में हर साल जंगलों में आग लगने की घटनाएं होती रही हैं. लेकिन सबसे ज्यादा उत्तराखंड में चीड़ यानी पाइन ट्री वाले जंगलों में आग लगती है क्योंकि चीड़ के पेड़ से लीसा नाम का एक द्रव निकलता है जो पेट्रोल की तरह ही बेहद ज्वलनशील होता है.
- उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की वजह एक तो चीड़ के जंगल हैं तो दूसरा मानव गतिविधियां भी एक बड़ा कारण है. जंगलों से गुजरने वाले रास्तों पर लोग बीड़ी, सिगरेट या फिर माचिस की जली हुई तिल्ली फेंक देते हैं, जिस कारण आग लग जाती है.
- इसके अलावा ग्रामीण भी नई घास के लालच में आग लगाते हैं, ताकि नीचे जमीन पर नई घास आ सके और उनके भविष्य के लिए यह काम आ सके लेकिन ज्यादातर आग बेकाबू हो जाती है जो बिना किसी कंट्रोल के आगे बढ़ती चली जाती है.
- जलवायु परिवर्तन के कारण भी जंगलों में आग लगने की घटनाएं होती हैं. समय पर बारिश नहीं होने की वजह से तापमान तेजी से बढ़ता है और जंगलों में सूखी घास और पत्तों पर नमी न होने के कारण यह आग और भड़क जाती है.
- इसके अलावा, प्राकृतिक कारण भी होते हैं. जंगली जानवर पहाड़ों पर इधर से उधर खाने और पानी की तलाश में जाते हैं लेकिन ऐसे में उनके पैरों से कई बार छोटे-छोटे पत्थर या बड़े पत्थर नीचे गिर जाते हैं जिससे चिंगारी लगती है और जंगलों में आग लग जाती है.
गढ़वाल मंडल में ज्यादा आग
उत्तराखंड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के मुख्य वन संरक्षक और आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक ने NDTV को बताया कि उत्तराखंड में आग लगने की सबसे ज्यादा घटनाएं गढ़वाल रीजन में हुई हैं.
उन्होंने बताया कि पूरी टीम जंगलों में आग पर काबू पाने में जुटी हुई है. उन्होंने बताया कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता आबादी के आसपास जंगलों में लगी आग को कंट्रोल करना है.
पटनायक ने बताया कि आग से निपटने के लिए प्रदेश में 1438 फॉरेस्ट फायर स्टेशन बनाए गए हैं. इसके अलावा 5600 फॉरेस्ट फायर वॉलेंटियर भी आग बुझाने के काम में मदद कर रहे हैं. साथ ही 40 के करीब मास्टर फायर कंट्रोल रूम भी बनाए गए हैं.













