Vikramotsav Varanasi: उत्तर प्रदेश की धर्मनगरी वाराणसी में 3 अप्रैल की शाम कुछ अलग थी, हवा में इतिहास की गूंज थी और मंच पर संस्कृति की सांसें. बीएलडब्ल्यू मैदान में जब विशाल मंच पर सम्राट विक्रमादित्य के जीवन का महानाट्य शुरू हुआ, तो हजारों दर्शक मानो दो हजार वर्ष पुराने युग में लौट गए. घोड़ों‑हाथियों की गर्जना, युद्ध और सुशासन के दृश्य, संगीत‑प्रकाश की भव्यता और संवादों की गंभीरता ने दर्शकों को बांधे रखा. तीन दिन तक चलने वाले इस मंचन ने न सिर्फ रोमांच जगाया, बल्कि इतिहास, परंपरा और समकालीन सवालों के बीच एक सशक्त मंच भी रचा.
एक शाम, जब काशी इतिहास में उतर आई
बीएलडब्ल्यू मैदान में सजी विशाल मंच-संरचना पर जैसे ही महानाट्य का सूत्रपात हुआ, मैदान तालियों और उत्सुकता से भर उठा. मंच पर उभरते दृश्यों ने दर्शकों के सामने उस काल को जीवित कर दिया, जब शासन केवल सत्ता नहीं, बल्कि अनुशासन, न्याय और लोककल्याण का पर्याय माना जाता था. सम्राट विक्रमादित्य के जीवन प्रसंग पराक्रम, दानशीलता, न्यायप्रियता और साहस को नाट्यभाषा में प्रस्तुत किया गया, जिसने हर आयु वर्ग के दर्शकों को जोड़े रखा.
वैदिक घड़ी : परंपरा और विज्ञान का संगम
आयोजन के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वैदिक घड़ी भेंट की. इस घड़ी को वैदिक काल गणना को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास बताया गया. आयोजकों के अनुसार, यह पहल परंपरा और विज्ञान के संगम की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम है, जो सांस्कृतिक चेतना को वर्तमान से जोड़ता है.
सुशासन की परंपरा से परिचय : डॉ मोहन यादव
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंचन के अवसर पर कहा कि सम्राट विक्रमादित्य केवल वीर योद्धा नहीं, बल्कि उत्कृष्ट सुशासन के प्रतीक थे. उन्होंने बताया कि विक्रमादित्य का काल दानशीलता, पराक्रम और न्याय की मिसालों से भरा रहा है. उनके अनुसार, इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ते हैं और वर्तमान के लिए प्रेरणा देते हैं. उन्होंने दोनों राज्यों के बीच सहयोग की चर्चा करते हुए केन‑बेतवा नदी जोड़ो परियोजना जैसे साझा प्रयासों का भी उल्लेख किया.
केवल नाटक नहीं, एक अभियान : योगी आदित्यनाथ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महानाट्य को महज नाट्य प्रस्तुति से आगे बताते हुए कहा कि यह नई पीढ़ी को मूल्यों और आदर्शों से जोड़ने का एक व्यापक अभियान है. उन्होंने संस्कृति की निरंतरता पर जोर देते हुए काशी और उज्जैन के ऐतिहासिक‑आध्यात्मिक संबंधों का उल्लेख किया. योगी आदित्यनाथ ने कहा कि काल गणना की धरती उज्जैन और पंचांग की धरती बनारस—इन दोनों का संगम भारतीय काल‑बोध को वैश्विक मंच पर मजबूती दे सकता है.
घोड़े‑हाथी और युद्ध दृश्य बने आकर्षण
मंच पर जीवंत युद्ध दृश्य, घोड़ों‑हाथियों की उपस्थिति और सधे हुए संवादों ने प्रस्तुति को सिनेमाई प्रभाव दिया. प्रकाश, ध्वनि और मंच सज्जा के संतुलन ने कथ्य को और प्रभावी बनाया. दर्शकों ने दृश्यों को केवल देखा ही नहीं, बल्कि महसूस किया कई पल ऐसे रहे जब पूरा मैदान सन्नाटे में डूब गया और अगले ही क्षण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.
तीन दिवसीय आयोजन, संयुक्त पहल
यह महानाट्य मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया है. तीन दिन तक चलने वाले इस आयोजन में इतिहास, संस्कृति और समकालीन संदर्भों का समावेश किया गया है. दूर‑दराज़ से आए दर्शकों की मौजूदगी ने आयोजन को जन‑उत्सव का रूप दे दिया. आयोजकों का दावा है कि इस मंचन का उद्देश्य इतिहास को महज स्मृति नहीं, अनुभव बनाना है.
भाईयों की जोड़ी और ऐतिहासिक संदर्भ
महानाट्य में भर्तृहरि और सम्राट विक्रमादित्य की जोड़ी को भी प्रमुखता से उकेरा गया. मंचन के दौरान राम‑लक्ष्मण और कृष्ण‑बलराम जैसी ऐतिहासिक‑पौराणिक जोड़ियों का उल्लेख आते ही दर्शकों से जुड़ाव और गहरा हो गया. कथानक में दर्शन, नीति और शासन की बारीकियों को संवादों के माध्यम से सहज रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे इतिहास बोझिल नहीं लगा.
दर्शकों की प्रतिक्रिया: ‘देखा नहीं, जिया'
कार्यक्रम से निकलते दर्शकों की एक ही प्रतिक्रिया थी “इतिहास को जिया.” युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, सभी ने मंचन की भव्यता और कथ्य की सराहना की. कई दर्शकों ने कहा कि ऐसे आयोजन इतिहास को पाठ्यपुस्तक से बाहर निकालकर जन‑अनुभव बनाते हैं. कुल मिलाकर, वाराणसी की इस शाम ने यह साबित किया कि जब मंच, कलाकार और कथ्य एक सुर में हों, तो इतिहास भी वर्तमान बन जाता है.
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