- डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने मेरठ के कार्यक्रम में अपने कठिन संघर्षों को याद करते हुए भावुक होकर आंसू बहाए
- डिप्टी सीएम ने बताया कि बचपन में जाड़े के लिए जूते और चप्पल तक नहीं होती थी, जिससे उनकी जिंदगी संघर्षपूर्ण रही
- उन्होंने कहा कि गरीबों की तकलीफें वे खुद अनुभव कर चुके हैं, इसलिए उनकी सेवा को अपना प्रमुख कर्तव्य मानते हैं
राजनीति के मैदान में विरोधियों पर हमलावर रहने वाले उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का एक अलग ही रूप मेरठ में देखने को मिला. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान डिप्टी सीएम अपने अतीत और संघर्षों को याद कर इतने भावुक हो गए कि उनके आंसू छलक पड़े. मंच पर मौजूद लोग और सामने बैठे दर्शक उन्हें इस तरह फफक कर रोता देख सन्न रह गए. इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
मेरठ के कवि सम्मेलन में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक अपने संघर्ष के दिनों को याद कर फूट-फूटकर रोने लगे. डिप्टी CM ने बताया, "कभी जाड़े के लिए जूते नहीं होते थे तो कभी चप्पल नहीं मिलती थी..."#DeputyCM #BrajeshPathak #Emotional pic.twitter.com/MfxPGdP2ix
— NDTV India (@ndtvindia) January 23, 2026
जब आंखों से नहीं रुके आंसू
लखनऊ के राजनीतिक गलियारों तक पहुंचने से पहले की अपनी दास्तां सुनाते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि उनका जीवन अभावों और कड़े संघर्षों के बीच बीता है. भावुक होते हुए उन्होंने बताया, "जब भी मैं सड़क पर किसी गरीब को परेशान देखता हूं तो मेरा दिल दुखी हो जाता है, क्योंकि मैंने वह दर्द खुद महसूस किया है." अपने बचपन और युवावस्था के दिनों का जिक्र करते हुए डिप्टी सीएम ने अभावों की एक ऐसी तस्वीर पेश की जिसने सबकी आंखें नम कर दीं. उन्होंने बताया, "संघर्ष के दिनों में ऐसी स्थिति थी कि कभी जाड़े के लिए जूते होते थे तो कभी पहनने के लिए चप्पल नहीं मिलती थी."
बाबा साहेब में दिखी पिता की छवि
उन्होंने बताया कि जब उनके पिता जीवित नहीं थे, तब उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को सुना. उन्हें बाबा साहेब में अपने पिता की छवि दिखाई दी और उन्होंने उन्हें ही अपना मार्गदर्शक और पिता समान माना.
खुद को बताया 'गरीबों का सेवक'
डिप्टी सीएम ने कहा कि आज वे जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने का रास्ता कांटों भरा रहा है. उन्होंने खुद को 'गरीबों का सेवक' बताते हुए कहा कि वे गरीबी का दर्द किताबी बातों से नहीं बल्कि अपने अनुभव से समझते हैं. यही कारण है कि वे जनता के बीच जाने और उनकी समस्याओं को सुनने में कभी पीछे नहीं हटते.














