- शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने गाय को राज्य माता घोषित करने और बीफ निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग दोहराई
- उन्होंने कहा कि सरकार ने 40 दिनों के अल्टीमेटम के आधे समय में भी उनकी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की
- शंकराचार्य ने गोरक्षा के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना करते हुए लखनऊ चलो आंदोलन का आह्वान किया
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वाराणसी में गोरक्षा, मांस निर्यात और धार्मिक मर्यादाओं से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि 40 दिनों के अल्टीमेटम के 20 दिन बीतने के बावजूद सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों, जैसे कि गाय को ‘राज्य माता' घोषित करना और बीफ निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया. शंकराचार्य ने आंदोलन को “नए और निर्णायक मोड़” में प्रवेश करने की बात कहते हुए 11 मार्च को ‘लखनऊ चलो' का आह्वान किया.
गोरक्षा पर सवाल
शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि गोरक्षा पर सरकार की चुप्पी बनी हुई है, जबकि अन्य विषयों पर मुखरता दिखाई जा रही है. सरकार से ‘गाय को राज्य माता' घोषित करने और बीफ निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग फिर दोहराई गई. इसके साथ ही अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और महंतों से शास्त्रसम्मत विमर्श के साथ स्थिति स्पष्ट करने का आह्वान भी किया है.
प्रेस रिलीज में लिखा कि स्वयं को 'असली हिन्दू' सिद्ध करने हेतु यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को दिए गए दिनों के अल्टीमेटम कल ही पूर्ण हो चुका है. पर इस समय में अभी तक अपने हिन्दू होने के कोई संकेत नहीं दिए हैं. अपितु कालनेमि होने के ही संकेत मिले है. ऐसे में जगद्गुरु शंकराचार्य ने रहस्यमयी चुप्पी और दूसरे विषयों पर मुखरता को रेखांकित करते हुये गोवंश की दुर्दशा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं.
आंकड़ों और नीतियों पर टिप्पणी
शंकराचार्य ने 20वीं पशुगणना का हवाला देते हुए दावा किया कि पश्चिम बंगाल में गोवंश संख्या में वृद्धि और उत्तर प्रदेश में कमी दर्ज हुई है. साथ ही, उत्तर प्रदेश के कुछ देशी नस्लों गंगातीरी, केनकथा, खैरगढ़, मेवाती की स्थिति पर चिंता जताई. उन्होंने यह भी कहा कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस' की आड़ में मांस निर्यात को बढ़ावा मिला है और प्रदेश का इसमें उल्लेखनीय हिस्सा बताया.
फ़िल्म टैक्स‑फ्री बनाम नीतिगत कदम
शंकराचार्य के अनुसार, सरकार द्वारा ‘गोदान' फ़िल्म को टैक्स‑फ्री करना प्रतीकात्मक कदम है, जबकि “गोवंश संरक्षण” के लिए संवैधानिक/नीतिगत निर्णय अपेक्षित हैं. उनके मुताबिक, “मनोरंजन को कर‑मुक्त करने से कत्लखानों में कटती गायों की रक्षा नहीं होगी.”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और शिष्टाचार का संदर्भ
उन्होंने कहा कि पिछले दिनों उपमुख्यमंत्रियों व कुछ भाजपा नेताओं ने वक्तव्यों के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की, परंतु “मुख्य मुद्दों पर ठोस जवाब” नहीं आया. साथ ही, उन्होंने धार्मिक पीठ की “प्रामाणिकता” पर टिप्पणी के संदर्भ में “सदन की गरिमा” और सार्वजनिक संवाद के शिष्टाचार पर भी सवाल उठाए.














