किस्सा यूपी का: चौधरी चरण सिंह कैसे बने किसानों का मसीहा? यूपी CM से PM तक का पूरा सफर
'किस्सा यूपी में' आज बात यूपी के पांचवें मुख्यमंत्री चौधरी चरण की. जो भारतीय राजनीति में किसानों की सशक्त आवाज के रूप में पहचाने जाते हैं. उनका संपूर्ण राजनीतिक जीवन ग्रामीण भारत, कृषि सुधार और किसान कल्याण को समर्पित रहा.
एक सामान्य किसान परिवार में जन्म, लेकिन प्रतिभा ऐसी कि देश के शीर्ष पद प्रधानमंत्री तक का सफर... यह कहानी है चौधरी चरण सिंह की. जिन्हें किसानों का मसीहा बनकर भारत के बहुसंख्य लोगों का दिल जीता. साल 1902 में उत्तर प्रदेश के हापुड़ जनपद में जन्मे चौधरी चरण सिंह दो बार यूपी के मुख्यमंत्री बने. एक बार देश के प्रधानमंत्री भी बने. उनके द्वारा शुरू की गई राजनैतिक विरासत आज भी भारतीय राजनीति में जिंदा है. चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी आज मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का पश्चिमी यूपी में अभी भी अच्छा-खासा प्रभाव है.
'किस्सा यूपी में' आज बात यूपी के पांचवें मुख्यमंत्री चौधरी चरण की. जो भारतीय राजनीति में किसानों की सशक्त आवाज के रूप में पहचाने जाते हैं. उनका संपूर्ण राजनीतिक जीवन ग्रामीण भारत, कृषि सुधार और किसान कल्याण को समर्पित रहा.
एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्म
तारीख 23 दिसंबर, 1902, तब के मरेठ जिले के नूरपुर गांव में एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार के घर में चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था. उनके पिता का नाम मीर सिंह जबकि मां का नाम नेतर कौर था. जब देश गुलामी की जंजीरों में बंधा था. मीर सिंह खेती-किसानी कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे थे.

मेरठ विवि से की पढ़ाई, गाजियाबाद से शुरू की राजनीति
चौधरी चरण सिंह की शिक्षा सरकारी उच्च विद्यालय और विश्वविद्यालय मेरठ से पूरी हुई. उन्होंने विज्ञान स्नातक, कला स्नातकोत्तर और विधि स्नातक की पढ़ाई की थी. जब 1929 में लाहौर में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का एलान किया तो नेहरू कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे, तब चौधरी चरण सिंह ने गाजियाबाद में कांग्रेस कमिटी का गठन किया.
हिंडन किनारे नमक बनाया, 6 महीने जेल में रहे
1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चौधरी चरण सिंह एक दिन हिंडन नदी के किनारे नमक बनाने पहुंचे. इस कारण उन्हें छह महीने की जेल हो गई. जेल से आने के बाद चौधरी चरण सिंह पूरे जोर-शोर से स्वतंत्रता आंदोलन में आ गए. चौधरी चरण सिंह का मानना था कि जब तक किसान मजबूत नहीं होगा, तब तक देश की अर्थव्यवस्था भी सशक्त नहीं बन सकती. उन्होंने जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और किसानों को उनका अधिकार दिलाने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए.
1937 में पहली बार बने विधायक, किसानों के शोषण के खिलाफ बुलंद की आवाज
1937 में तब के संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की विधान सभा के सदस्य के रूप में चौधरी चरण सिंह चुने गए. विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक कानूनों में गहरी रुचि ली और जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण के खिलाफ धीरे-धीरे अपना वैचारिक और व्यावहारिक रुख विकसित किया.
1952 से 1968 तक चरण सिंह यूपी में कांग्रेस की राजनीति के तीन प्रमुख नेताओं में से एक थे. यूपी के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के मार्गदर्शन में उन्होंने क्रांतिकारी भूमि सुधार कानूनों का मसौदा तैयार किया और उन्हें पारित करवाया.

नेहरू का खुलकर विरोध कर राष्ट्रीय मंच पर उभरे
1959 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने निर्विवाद नेता और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी और सामूहिक भूमि नीतियों का सार्वजनिक रूप से विरोध किया, जिसके बाद वे राष्ट्रीय मंच पर उभर कर सामने आए. इस बीच गुटबाजी से ग्रस्त उत्तर प्रदेश कांग्रेस में उनकी स्थिति भले ही कमजोर हो गई हो, लेकिन यही वह समय था जब उत्तर भारत के विभिन्न जातियों के मध्यम किसान समुदाय उन्हें अपना प्रवक्ता और बाद में अपना निर्विवाद नेता मानने लगे.
1967 में यूपी के पहले गैर कांग्रेसी सीएम बने
चरण सिंह 1 अप्रैल 1967 को कांग्रेस से अलग होकर विपक्षी दल में शामिल हो गए और उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. 3 अप्रैल 1967 को चरण सिंह ने पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वो 25 फरवरी 1968 तक सीएम पद पर रहे.
फिर 18 फरवरी 1970 को चरण सिंह दूसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बने और एक अक्टूबर 1970 तक सीएम पद पर रहे. इस दौरान उन्होंने यूपी में किसानों के उत्थान के लिए कई बड़े काम किए. चौधरी साहब कहा करते थे कि किसानों को जमीन का मालिकाना हक देने से ही बात बनेगी.
चौधरी चरण सिंह ने अपने मुख्यमंत्री काल में एक बड़ा फैसला लेते हुए खाद पर से सेल्स टैक्स हटा लिया. सीलिंग से मिली जमीन किसनों में बांटने की कोशिश की पर उत्तर प्रदेश में ये सफल नहीं हो पाया.
आपातकाल में जेल गए, फिर मोरार जी देसाई सरकार में बने गृह मंत्री
इसके बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तब देश में माहौल गड़बड़ हो गया था, 1975 में इंदिरा ने विवादास्पद डिसीजन लिया और इमरजेंसी लगा दी. चौधरी चरण सिंह भी जेल में डाल दिए गए. जेल में विरोधी पक्ष लामबंद हो गया और 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए. इंदिरा बुरी तरह हारीं और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने, चौधरी चरण सिंह इस सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहे. वित्तमंत्री भी बने.
नाबार्ड की स्थापना की, खाद-डीजल के दाम घटाए
1979 में वित्त मंत्री और उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कराई और वित्त मंत्री रहते हुए ही खाद और डीजल के दामों को कंट्रोल किया. खेती की मशीनों पर टैक्स कम किया. इनके अलावा कृषि जिंसों की अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर लगी रोक हटा दी.
हमें 1947 में आजादी मिली और आज से 47 साल पहले, उसी आजादी के ऐसे ही मौके पर लाल किले की प्राचीर से हमारे किसान मसीहा, भारत रत्न एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी ने जो संदेश दिया, वो आज भी प्रासंगिक है।
— Rashtriya Lok Dal (@RLDparty) August 14, 2026
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हार्दिक शुभकामनाएं।… pic.twitter.com/t0QM9bpdv6
मोरारजी सरकार गिरने के बाद बने देश के प्रधानमंत्री
लेकिन इसी वजह से जनता पार्टी में कलह हुई और मोरार जी की सरकार गिर गई. बाद में कांग्रेस के ही सपोर्ट से 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था. लेकिन इंदिरा ने 19 अगस्त को समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. ऐसे में संसद में बगैर एक दिन भी गए, चरण सिंह को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा.
जमींदारी उन्मूलन कानून बनवाया, चकबंदी कानून भी उन्हीं के समय का
चरण सिंह ने देश में जमींदारी उन्मूलन कानून पारित कराया. 1952 में भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन कानून पारित होने के बाद चकबंदी कानून और 1954 में भूमि संरक्षण कानून बनवाया, जिससे वैज्ञानिक खेती और भूमि संरक्षण को मदद मिली थी. आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून बनाकर जमींदारी प्रथा समाप्त कर दिया और किसान भूमिधर बन गए.

हजारों पटवारियों का लिया इस्तीफा, भर्ती किए लेखपाल
जमींदारी खत्म होने से दम तोड़ती हुई सामंतशाही ने पटवारियों के माध्यम से फिर से किसानों की जमीन को धोखे से हासिल करना शुरू कर दिया. इसके बाद चौधरी चरण सिंह ने पटवारियों को कड़ी चेतावनी दी. तब हजारों पटवारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया. चौधरी साहब ने सभी के त्याग पत्र स्वीकार कर उनके स्थान पर लेखपालों की भर्ती कर दी.
पीएम रहते किसान बन थाने पहुंचे, घूस मांगने पर पूरे थाने को किया सस्पेंड
वर्ष 1979 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह किसान का भेष बदलकर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के ऊसराहार थाने पहुंचे थे. पुलिसकर्मियों द्वारा रिश्वत मांगने और रिपोर्ट दर्ज करने में लापरवाही दिखाने पर उन्होंने मौके पर ही पूरे थाने को सस्पेंड कर दिया था.
पढ़ने के बेहद शौकीन, क्रिकेट और फिल्मों से नफरत
चौधरी चरण सिंह किताबें पढ़ने के बेहद शौकीन थे. लेकिन क्रिकेट और फिल्मों से उन्हें बेहद नाराजगी थी. रेडियो पर आने वाली क्रिकेट की कमेंट्री को लेकर वो कहा करते थे, यह पांच-पांच दिनों तक लोगों को निठल्ला बना देता है. इसे बंद किया जाना चाहिए. उन्होंने जमींदारी उन्मूलन, भारत की गरीबी और उसका समाधान, किसानों की भूसंपत्ति या किसानों के लिए भूमि, प्रिवेंशन ऑफ डिवीजन ऑफ होल्डिंग्स बिलो ए सर्टेन मिनिमम जैसी कई किताबें भी लिखी.
29 मई 1987 को 84 साल के उम्र में चौधरी चरण सिंह का नई दिल्ली में निधन हो गया. चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनके बेटे अजीत सिंह ने सालों तक उनकी राजैनितक विरासत को आगे बढ़ाया. फिर अजीत सिंह के बाद अब चौधरी साहब की राजनीति को उनके पोते जंयत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं.
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