गोविंद वल्लभ पंत: पंडित नेहरू के बदले खाई लाठी, प्रदेश के पहले CM बने तो अपना हर खर्च खुद उठाया
देश की आजादी के बाद गोविंद वल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली. बाद में सरदार वल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद वो केंद्र सरकार में गृह मंत्री भी बने. गोविंद वल्लभ पंत जवाहर लाल नेहरू के करीबियों में से एक माने जाते हैं. ऐसे में उनके जीवनकाल में कई ऐसी घटनाएं हैं जो बेहद दिलचस्प है.
दिल्ली, देश की सत्ता का केंद्र. और इस केंद्र तक पहुंचने का रास्ता होकर गुजरता है जिस राज्य से उसका नाम है- उत्तर प्रदेश. जो न केवल आबादी बल्कि सबसे ज्यादा विधायक और सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य है. यूपी में विधानसभा की 403 सीटें है. साथ ही देश में सबसे ज्यादा सांसद यूपी से ही चुनकर लोकसभा पहुंचते हैं. सियासत के नजरिए से यूपी देश का सबसे अहम राज्य है और इस प्रदेश में कुछ महीनों बाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार आने वाला है. बात उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की, जिसकी तैयारियां तेज हो चली है. यूं तो यूपी की सियासत पर लिखने-पढ़ने, कहने-बताने की अनगिनत कहानियां हैं. इन असंख्य कहानियों के बीच NDTV पर पढ़ें- यूपी की सियासत के सबसे बड़े सितारों की कहानी.
अल्मोड़ा में जन्म, गोल-मटोल और भारी शरीर के लिए बचपन में कहे जाते थे- 'थपुआ'
उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में एक मराठी करहाड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो वर्तमान उत्तरी कर्नाटक से कुमाऊं क्षेत्र में आकर बस गया था. गोविंद वल्लभ पंत के पिता मनोरथ पंत एक सरकारी अधिकारी थे. जबकि मां गोविंदी बाई घरेलू महिला थी. उनके नाना बद्री दत्त जोशी भी एक सरकारी अधिकारी थे. गोविंद वल्लभ पंत का बचपन नाना के साथ ज्यादा बीता.
बचपन में वे काफी गोल-मटोल और भारी शरीर के थे. इस कारण दूसरे बच्चों की तुलना में ज्यादा दौड़-भाग के बजाय एक ही जगह बैठे रहना पसंद करते थे. इसी वजह से उनके घरवाले और स्थानीय लोग उन्हें प्यार से 'थपुआ' कहकर बुलाते थे.
वकालत करते-करते आजादी के आंदोलन में कूदे, कई बार जेल भी गए
पंत ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई की. बाद में काशीपुर में वकील के रूप में काम किया. यहीं पर उन्होंने 1914 में ब्रिटिश राज के खिलाफ सक्रिय कार्य शुरू किया, जब उन्होंने एक स्थानीय परिषद की मदद की, जिसने कुली बेगार कानून को सफलतापूर्वक चुनौती दी थी. यह कानून स्थानीय लोगों को यात्रा करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों के सामान के मुफ्त परिवहन की व्यवस्था करने के लिए बाध्य करता था.

जल्द ही उनका जुड़ाव देश के स्वतंत्रता आंदोलन से हो गया. कांग्रेस नेताओं के साथ उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बार जेल भी गए. साल 1925 के ऐतिहासिक काकोरी कांड के बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और अन्य क्रांतिकारी पकड़े गए, तो उनके बचाव के लिए पंत जी ने ही अदालत में मुकदमा लड़ा था.
गोविंद वल्लभ पंत महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को अपनी आत्मिक ऊर्जा का स्रोत मानते थे. गोविन्द वल्लभ पंत का मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था, जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे, पंत उनका मुकदमा नहीं लेते थे. अंग्रेज मजिस्ट्रेट की आपत्ति होने के बावजूद एक बार वे काशीपुर कोर्ट में धोती, कुर्ता तथा गांधी टोपी पहन कर चले गये थे.

आजादी से पहले हुए चुनाव में जीत के बने संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री
देश की आजादी से पहले हुए चुनाव के बाद गोविंद वल्लभ पंत ने 17 जुलाई 1937 को संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. उन्होंने गृह, वित्त, सामान्य प्रशासन और वन मंत्रालय का प्रभार भी संभाला. 1939 में कांग्रेस मंत्रालयों के साथ पंत ने भी इस्तीफा दे दिया. फिर 1945 में, ब्रिटिश लेबर सरकार ने प्रांतीय विधानमंडलों के लिए नए चुनाव का आदेश दिया. कांग्रेस ने संयुक्त प्रांतों में 1946 के चुनावों में बहुमत जीता और पंत फिर से प्रधानमंत्री बने.
साइमन कमीशन का विरोध और नेहरू के लिए खाई लाठियां
1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लखनऊ में बड़ा आंदोलन हुआ था. तब जवाहरलाल नेहरू के साथ गोविंद वल्लभ पंत भी उसमें शामिल थे. इस आंदोलन में नेहरू को बचाने के लिए गोविंद वल्लभ पंत ने अपने शरीर पर लाठियां खाई थी. इसका जिक्र जवाहरलाल नेहरू के 30 नवंबर 1928 के प्रेस बयान में मिलता है.
लाठीचार्ज के दौरान जवाहरलाल नेहरू को भी लाठियां लगीं. नेहरू ने अपने बयान में लिखा कि दो-तीन लाठी लगने के बाद कुछ छात्रों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया. इन छात्रों ने कहा कि वे नेहरू को बचाने के लिए खुद चोट सहने को तैयार हैं. कई छात्र इस कोशिश में गंभीर रूप से घायल भी हुए. इन युवाओं ने नेहरू के साथ मौजूद गोविंद वल्लभ पंत और मिसेज मित्रा को भी बचाने की कोशिश की.
देश की आजादी के बाद गोविंद वल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली. बाद में सरदार वल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद वो केंद्र सरकार में गृह मंत्री भी बने. गोविंद वल्लभ पंत जवाहर लाल नेहरू के करीबियों में से एक माने जाते हैं. ऐसे में उनके जीवनकाल में कई ऐसी घटनाएं हैं जो बेहद दिलचस्प है.

बैठक के नाश्ते का खर्च खुद से भरा... पंत की ईमानदारी की मिसाल
जब पंडित गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब वह न ही खास सरकारी सुविधाएं लेते थे और न ही अपने निजी काम के लिए सरकारी पैसे का इस्तेमाल करते थे. इसी दौरान की एक कहानी बड़ी चर्चित है. बताया जाता है कि गोविंद वल्लभ पंत एक सरकारी बैठक में थे. यहां चाय-नाश्ते की व्यवस्था की गई. जब उसका बिल पास होने के लिए आया हिसाब में छह आन और बारह आने लिखे हुए थे.
इस बिलकर को गोविंद वल्लभ पंत ने पास करने से इनकार कर दिया. उनसे जब बिल न पास करने का कारण पूछा गया तो गोविंद वल्लभ पंत ने कहा कि सरकारी बैठकों में सरकारी खर्चे से केवल चाय मंगवाने का नियम है. ऐसे में नाश्ते का बिल बनवाने वाले शख्स को स्वयं ही चुकाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि हां, चाय का बिल अवश्य पास हो सकता है.
इस दौरान जब अधिकारियों ने कहा कि चाय के साथ कभी-कभी नाश्ता मंगवाने में कोई समस्या नहीं है और इस बिल को पास करने में कोई दिक्कत नहीं होगी. उस दिन की बैठक में चाय के साथ गोविंद वल्लभ पंत ने ही नाश्ता मंगवाया था. इसके बाद जब बिल चुकान की नौबत आई तो कुछ सोचकर पंत ने अपनी जेब से रुपये निकाले और अधिकारियों से कहा, "चाय का का बिल पास हो सकता है, लेकिन नाश्ते का नहीं."
दिल का दौरा पड़ा, गृह मंत्री के पद पर थे तभी 1961 में हुआ निधन
गृह मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान गोविंद वल्लभ पंत को 26 जनवरी 1957 को भारत रत्न दिया गया था. 1960 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा. उनकी सेहत बिगड़ने लगी और 7 मार्च 1961 को 73 वर्ष की आयु में मस्तिष्क आघात से उनका निधन हो गया. उस समय वे भारत के गृह मंत्री के पद पर कार्यरत थे.
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