किराये पर लिया है मकान तो मेंटेनेंस चार्ज कौन देगा, मकानमालिक या आप?

सोसाइटी मेंटेनेंस चार्ज को लेकर अक्सर मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद होता रहता है. जानिए कानून और रेंटल एग्रीमेंट के अनुसार ये खर्च किसे उठाना चाहिए.

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मकान मालिक और किराएदार के बीच में मेंटेनेंस चार्ज को लेकर अमूमन विवाद देखा जाता है.
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साल 2010 की बात है, जब मेरा दोस्त राहुल अपने होम टाउन से नोएडा में शिफ्ट हुआ. पीजी की समस्याओं को देखते हुए उसने एक फ्लैट किराए पर लेने का फैसला लिया. सोचा कि ऑफिस टाइमिंग के हिसाब से जब मर्जी हो तब आओ, किसी बात की कोई रोक-टोक नहीं रहेगी. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. फ्लैट में शिफ्ट करने के बाद जब महीने का आखिरी समय आता है, तो उसका मकान मालिक 1 हजार रुपये अलग से मेंटेनेंस के रूप में मांगता है. पहले से बिना किसी सूचना के इस तरह की डिमांड को राहुल तुरंत माना कर देता है. इसके बाद इस मेंटेनेंस पर विवाद इतना बढ़ जाता है कि राहुल को दूसरे फ्लैट में शिफ्ट होना पड़ता है.

आज के समय में सोसाइटी मेंटेनेंस चार्ज की समस्या अब कॉमन हो गई है. तो चलिए आज इस खबर में समझने की कोशिश करते हैं कि सोसाइटी के मेंटेनेंस की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए, मकान मालिक की या फिर किरायेदार की?

क्या कहता है रेंटल कानून?

लॉ की बात करें तो मॉडल टेनेंसी एक्ट और स्टेट के रेंट कंट्रोल एक्ट में इस बात को साफ कहा है कि मकान के मेंटेनेंस की जिम्मेदारी मकान मालिक और किरायेदार की सहमति पर है. आमतौर पर मेंटेनेंस चार्ज को दो पार्ट में बांटा जाता है. पहला कैपिटल मेंटेनेंस. यानी अगर बिल्डिंग में कोई बड़ा काम होना है, जैसे पेंटिंग, लिफ्ट बदलना, वॉटरप्रूफिंग या स्ट्रक्चरल रिपेयर, तो ये खर्च मकान मालिक को ही उठाना होता है. क्योंकि इससे प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ती है.

दूसरा ऑपरेशनल मेंटेनेंस, जिसमें सोसाइटी की रोजमर्रा की सर्विस शामिल होती हैं. जैसे सफाई, सिक्योरिटी गार्ड की सैलरी, कॉमन एरिया की बिजली और पानी का खर्च. अब क्योंकि इन सर्विस का इस्तेमाल किरायेदार करता है, इसलिए ये खर्च किरायेदार के हिस्से आता है.

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रेंटल एग्रीमेंट से बचाव

इस पूरे मामले से बचने के लिए रेंटल एग्रीमेंट अहम हथियार है. जब भी आप नया मकान किराये पर लें या दें, तो एग्रीमेंट में मेंटेनेंस चार्ज का क्लॉज जरूर लिखें. अभी के समय में दो तरह के ट्रेंड चल रहे हैं. इन्क्लूसिव रेंट और एक्सक्लूसिव रेंट.

  • इन्कलूसिव रेंट यानी मकान मालिक मेंटेनेंस चार्ज को किराये में ही जोड़ देता है. मान लीजिए अगर किराया 15,000 रुपये है और मेंटेनेंस 2,000 रुपये तो मकान मालिक सीधे 17,000 रुपये किराया फिक्स करता है और मेंटेनेंस खुद देता है. 
  • एक्सक्लूसिव रेंट में किरायेदार मकान मालिक को सिर्फ फिक्स किया हुआ किराया देता है और सोसाइटी का हर महीने का मेंटेनेंस चार्ज खुद जमा करता है. यहां एक बात ये ध्यान रखने की है कि किसी भी लड़ाई-झगड़े से बचने के लिए रेंट एग्रीमेंट साइन करने से पहले ही तय कर लें कि सोसाइटी का मेंटेनेंस बिल किसकी जेब से जाएगा. इससे बाद में किसी विवाद की स्थिति ही नहीं बनेगी.

एग्रीमेंट में लिखना भूल गए, अब?

अगर एग्रीमेंट में मेंटेनेंस देने का जिक्र नहीं है और मकान मालिक अचानक से इसकी मांग करता है, तो बातचीत से बीच का रास्ता निकाल सकते हैं. वहीं एक्सपर्ट के अनुसार रुटीन खर्च किरायेदार को देना चाहिए, लेकिन अगर सोसाइटी कोई स्पेशल फंड ले रही है, या फिर फ्लैट में बड़ा सुधार का काम होना है तो वो पूरी तरह से मकान मालिक की जिम्मेदारी होगी.

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