4 साल की उम्र में संभाली जोधपुर रियासत, पूर्व महाराजा गज सिंह की जीवन पर लिखी किताब का JLF में विमोचन

पुस्तक विमोचन के लिए जयपुर आए गज सिंह जी ने NDTV के साथ एक विशेष बातचीत में कहा, “वह बेहद कठिन समय था. मेरी माता ने 1952 में पूरी जिम्मेदारी संभाली. मैं केवल चार साल का था. मुझे याद है, मुझे मेहरानगढ़ किले में ले जाया गया, जहां मेरा राजतिलक हुआ.''

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जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह

JLF: पश्चिमी राजस्थान के धोरों और गलियारों में एक ऐसा व्यक्तित्व है, जो सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मारवाड़ की आत्मा से गहराई से जुड़ा हुआ है. वह कोई राजनेता नहीं हैं, लेकिन हर चुनाव में उनकी भूमिका अहम मानी जाती रही है. यह शख्स हैं जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह जी. महज चार साल की उम्र में एक विमान दुर्घटना में उनके पिता की मृत्यु हो गई. चार वर्ष की आयु में ही उन्होंने जोधपुर के राजपरिवार की विरासत संभाली. उनकी जीवनी पर आधारित पुस्तक “BAPJI,  Maharaja of Marwar- Jodhpur, The King Who Would Be Man' का विमोचन जयपुर साहित्य उत्सव में किया गया. इस पुस्तक को योगी वैद और अमन नाथ ने लिखा है.

यह किताब केवल बापजी की जीवनी नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत में राजपरिवारों की बदलती भूमिका की भी एक झलक प्रस्तुत करती है. पचास, साठ और सत्तर का दशक राजपरिवारों के लिए निर्णायक साबित हुआ. आज़ाद भारत में उनकी रियासतें समाप्त हो चुकी थीं और साथ ही उनके विशेष अधिकार और 'प्रिवी पर्स' भी खत्म हो गए थे. ऐसे में महलों और किलों का रखरखाव, और उनके लिए काम कर रहे सैकड़ों सेवादारों, कर्मचारियों और नौकर-चाकरों को वेतन देना एक बड़ी चुनौती बन गया.

चार वर्ष की आयु में जोधपुर नरेश

कम उम्र के बावजूद बापजी ने किस तरह जोधपुर की रियासत को संभाला और उसे एक नई पहचान दी, यह किताब उसी कहानी को बयान करती है. चार वर्ष की आयु में ही उन्हें जोधपुर का नरेश घोषित कर दिया गया. उनके पिता की असामयिक मृत्यु से न केवल जोधपुर का राजपरिवार, बल्कि पूरा जोधपुर शोक में डूब गया.

बापजी के पिता, महाराजा हनुवंत सिंह, ने देश के पहले आम चुनाव में भाग लिया था. उन्होंने लोकसभा और विधानसभा दोनों सीटें जीत ली थीं, लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले ही उनकी अकस्मात मृत्यु हो गई. उनके समर्थन से मारवाड़ की 35 में से 31 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुए, जो तत्कालीन कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी.

इसी दौरान महाराजा हनुवंत सिंह और उनकी छोटी रानी जुबैदा, जिन्हें राजपरिवार में विद्या के नाम से जाना जाता था, विमान दुर्घटना का शिकार हो गए. विमान स्वयं महाराजा हनुवंत सिंह उड़ा रहे थे, वे एक प्रशिक्षित पायलट भी थे. इस प्रकार एक विमान दुर्घटना में महाराजा हनुवंत सिंह की मृत्यु ने कई सवाल खड़े कर दिए.

गज सिंह जी की NDTV के साथ एक विशेष बातचीत

पुस्तक विमोचन के लिए जयपुर आए गज सिंह जी ने NDTV के साथ एक विशेष बातचीत में कहा, “वह बेहद कठिन समय था. मेरी माता ने 1952 में पूरी जिम्मेदारी संभाली. मैं केवल चार साल का था. मुझे याद है, मुझे मेहरानगढ़ किले में ले जाया गया, जहां मेरा राजतिलक हुआ. इसके बाद मैं विदेश में पढ़ाई के लिए चला गया. लेकिन जब सत्तर के दशक में हमारे प्रिवी पर्स समाप्त कर दिए गए, तो मेरी माता ने कहा कि अब परिवार को आपकी आवश्यकता है.''

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''मैं वापस लौट आया. हमारे पास बड़े-बड़े महल थे, सैकड़ों सेवादार और कर्मचारी थे, लेकिन उन्हें बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे. मैंने आकर इन सबको पुनर्गठित किया. आज भगवान की कृपा से हमारे होटल और संग्रहालय हमारी आजीविका का साधन हैं और इनके माध्यम से हम अपनी विरासत को संरक्षित कर पा रहे हैं.”

योगी वैद

विरासत को संभालने के साथ-साथ समाज सेवा में उतरना, लोगों से जुड़े रहना और मरुस्थलीय पश्चिमी राजस्थान में अपनी भूमिका को मजबूत करना, धीरे-धीरे गज सिंह जी की पहचान बन गया. भैरों सिंह शेखावत सरकार में उन्हें RTDC का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया.

''मुझे राजनीति बहुत विभाजनकारी लगती है''

हर चुनाव में मारवाड़ की सीटों पर उनका समर्थन निर्णायक माना जाता रहा, लेकिन गज सिंह जी ने कभी सक्रिय राजनीति में प्रवेश नहीं किया. वे कहते हैं, “मैं राज्यसभा का सदस्य रहा हूँ, लेकिन मैं किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ना चाहता था. मेरे पिता ने 1952 में निर्दलीयों के माध्यम से मारवाड़ की 31 सीटें जीती थीं. मेरी माता ने भी चुनाव लड़ा था और उनका नारा था, ‘समय बदल गया है, लेकिन संबंध नहीं बदले.' मुझे राजनीति बहुत विभाजनकारी लगती है, जो लोगों को अलग-अलग गुटों में बाँट देती है.”

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साथ ही, बाल विवाह और महिलाओं के प्रति भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए कई स्कूल और छात्रावास स्थापित किए. जयपुर साहित्य उत्सव में विमोचित उनकी पुस्तक में शाही परिवार के अभिलेखागार से ली गई कुछ दुर्लभ तस्वीरें भी शामिल हैं, जिन्हें पहले कभी सार्वजनिक नहीं किया गया था.

पुस्तक को अमन नाथ और योगी वैद ने लिखा है

इस पुस्तक को अमन नाथ और योगी वैद ने लिखा है. अमन नाथ को गज सिंह जी तब से जानते हैं, जब दोनों युवा थे और दिल्ली में साथ समय बिताते थे और डिस्को में जाते थे. विदेश में पढ़ाई, डिस्को का शौक और एक सामान्य युवा जैसी रुचियाँ गज सिंह जी में भी थीं.

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लेकिन कठिन समय में अपनी विरासत को संभालकर उसे एक वैश्विक पहचान देना ही “The King Who Would Be Man” की असली कहानी है. आज के राजपरिवारों के लिए उनका संदेश है, “जो भी कार्य करें, पूरी निष्ठा से करें, अपनी विरासत को संभालें और समाज में नेतृत्व की भूमिका निभाएँ.”

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