- इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में इंडिया ओपन बैडमिंटन के दौरान कबूतरों की वजह से खिलाड़ियों ने शिकायत दर्ज कराई
- मिया ब्लिचफेल्ड ने स्टेडियम की ठंड, प्रदूषण और कबूतरों की समस्या पर चिंता जताई थी
- कबूतरों की संख्या और उनके बीट से निकलने वाले कणों के कारण नेशनल ग्रीन ट्राइब्युनल ने सरकार को नोटिस भेजा था
दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में चल रहे इंडिया ओपन बैडमिंटन के दौरान कबूतरों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों की शिकायत और फिर पक्षी की बीट की वजह से मैच बंद होने से बवाल मच गया है. एक बार फिर कबूतरों को लेकर दिल्ली-नोएडा की परेशानी सामने आने लगी है.
अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों की शिकायत
टूर्नामेंट शुरू होते ही डेनमार्क की वर्ल्ड नंबर 20 मिया ब्लिचफ़ेल्डट ने प्रेस में अपनी शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने स्टेडियम और वॉर्म अप एरिया में ठंड, प्रदूषण और कबूतरों को लेकर शिकायत दर्ज की थी. वर्ल्ड नंबर 20 डेनमार्क की मिया ने कहा था, “यहां हालात वाकई ख़राब हैं. पिछले साल भी ये गंदा था. इस साल भी अलग नहीं है. उम्मीद करती हूं कि BWF इसपर गंभीरता से ग़ौर करेगा.”
पक्षी की बीट ने रोका मैच
अब जब टूर्नामेंट के दौरान एक बेहद अहम मैच को पक्षी की बीट की वजह से रोकना पड़ा तो ये मुश्किल फिर से सामने आ गई है. पहले कुछ विदेशी खिलाड़ियों ने ठंड और प्रदूषण से लेकर वॉर्म अप एरिया में कबूतरों की शिकायत की. फिर स्टेडियम में बंदर आ गए और हद तो तब हो गई जब चिड़िया या पक्षी की बीट की वजह से दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय मैच को थोड़ी देर के लिए रोक देना पड़ा.
दरअसल दिल्ली में खेला जा रहा इंडिया ओपन सुपर 750 बैडमिंटन टूर्नामेंट एक के बाद कई कारणों से भारतीय खेलों की दुनिया के लिए शर्मिंदगी की वजह बनता जा रहा है.
पिछले साल NGT तक पहुंचा कबूतरों का मामला
दिल्ली-एनसीआर में कबूतरों की बढ़ते नंबर्स और सफ़ाई के दौरान सड़कों पर उड़ने वाली धूल से तंग आकर एक छात्र ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्युनल-NGT में याचिका दायर कर दी. याचिका में बताया गया कि कबूतरों की बीट से निकलने वाले नुकसानदेहक कण के हवा में मिलने से बीमारियां हो रही हैं.
फिर NGT ने ने सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजकर इसपर जवाब भी मांगा. दिल्ली और मुंबई में इससे बचने के तमाम एहतियात और एक्शन की ख़बरें भी आईं. महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने की जगहों (मुंबई के 51 कबूतरखानों) को बंद करने का आदेश दिया. महाराष्ट्र विधान परिषद में भी ये मामला उठा.
कबूतर कैसे बन गए ख़तरनाक- डॉक्टरों की राय
MAX और Felix अस्पताल के सीनियर पलमोनोलोजिस्ट डॉ. प्रियदर्शी जितेन्द्र कुमार (Dr. Priyadarshi Jitendra Kumar), “मरीज़ों की संख्या को लेकर मेरे पास कोई डेटा नहीं है. लेकिन कबूतरों से तीन तरीके से प्रॉब्लम हो रही है- फ़ीडर, ड्रॉपिंग- जिसमें फंगस होता है और नेस्ट डस्ट*.”
डॉक्टर के मुताबिक फंगस का असर HSP यानी हाई सेंसिटिवीटी निमोनाइटिस के तौर पर होता है. ये फ़ीडर प्वाइंट्स जहां हैं वहां ज़्यादा देखने को मिल सकता है. नेस्ट तो अब वैसे होते नहीं इसलिए सोइसिटी में धूल के तौर पर उड़कर लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं.
‘बेक्हम को थी अस्थमा की शिकायत'
डॉ. प्रियदर्शी ये भी कहते हैं, “ये एक वर्ल्ड वाइड प्रॉब्लम है. मुंबई में ये और भी ज़्यादा है जहां HSP या हाइपर सेंसिटिविटी निमोनाइटिस के केस ज़्यादा आते हैं. इस बीमारी को ‘पीजन ब्रीडर्स लंग' भी कहते हैं. ये निमोनिया की तरह ही दिखता है. मरीज के X-Ray में पैच-पैच या धब्बा दिखता है जिसकी वजह फंगस और एलर्जी होती है.”
लेकिन डॉ. प्रियदर्शी ये भी कहते हैं, “ज़रूरी नहीं कि इससे सबको प्रॉब्लम हो. मशहूर फ़ुटबॉलर डेविड बेक्हम को बचपन से ही क्रोनिक अस्थमा की शिकायत थी. लेकिन वो दवाओं के साथ टॉप लेवल पर फ़ुटबॉल खेलते रहे. कबूतरों से होनेवाली बीमारी भी अब कॉमन हो गई है.”
‘बीमारी है पहले से तो जानलेवा हो सकती है'
डॉ. पिरयदर्शी बताते हैं, “कबूतरों से सबको बीमारी नहीं हो जाती. लेकिन जो लोग हाइपर सेंसिटिव हैं. उनके लिए कबूतर से होने वाले नुकसान आग में घी का काम करते हैं. जिन्हों क्रोनिक बीमारी होती है उनके फेफड़ों में गांठ पड़ जाती है. वो पूरी ज़िन्दगी इससे जूझते हैं. जिन्हें अस्थमा, एलर्जिक राइनाइटिस या सांस की किसी तरह दिक्कतें हों कबूतरों की गंदगी उनकी बीमारी को ट्रगर कर देते हैं और ये आग में घी का काम करता हैं.”
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