- महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में बेमौसम बारिश और भीषण गर्मी के कारण अल्फांसो आम की पैदावार में भारी नुकसान हुआ है
- इस साल अल्फांसो आम का उत्पादन पिछले वर्षों की तुलना में करीब अस्सी प्रतिशत तक कम हो गया है
- आम की भारी कमी के कारण बाजार में इसकी कीमतें बीस से पच्चीस प्रतिशत तक बढ़ गई हैं
खाने में मीठा और हल्का खट्टा, खुशबू इतनी मनमोहक कि आसपास के लोग रह ना पाएं, बिना रेशे वाला गूदा, आकर्षक रंग और रूप, लंबी शेल्फ लाइफ, हम बात कर रहे हैं हापुस आम की. इसकी खुशबू से ही इस आम की पहचान की जा सकती है. लेकिन इस आम को उगाने वाले किसान इस साल बहपत परेशान हैं. भारत का मौसम भी अजीब रंग दिखा रहा है. कभी हीटवेव तो कभी बेमौसम बारिश. लोग तो जैसे-तैसे ये सब झेल लेते हैं लेकिन किसान क्या करे? बेमौसम बारिश और भीषण हीटवेव की वजह से उनकी फसल बर्बाद हो रही है. आसमान छूती कीमतों की वजह से 'फलों का राजा' आम जनता की पहुंच से बाहर हो गया है. आम की कीमतें को जैसे आसमान छू रही हैं. हापुस को आमों का राजा भी कहा जाता है, लेकिन पैदावार कम होने से किसान परेशान हैं.
हापुस आम पर मौसम की मार, क्या करे किसान
खराब और अनिश्चित मौसम की मार आम की फसल पर पड़ रही है. खासकर बेमौसम बारिश और भीषण गर्मी और हीटवेव ने इस सीजन में देश और दुनियाभर में मशहूर 'अल्फांसो' यानी हापुस आम की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है. आम की पैदावार का मुख्य गढ़ माने जाने वाले महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के किसान इस वजह से मुसीबत में हैं.
80% तक कम हुई अल्फांसो की पैदावार
इस साल आम का उत्पादन अन्य सालों की तुलना में करीब 80% तक कम हो गया है. बाजार में आम की भारी किल्लत की वजह से कीमतें आसमान छू रही हैं. आम के इस भारी नुकसान और अपनी बदहाली पर सिंधुदुर्ग के किसान बहुत ही परेशान हैं. उन्होंने अपना दर्द एनडीटीवी को बताया.
युद्ध की वजह से एक्सपोर्ट भी नहीं हो रहा हापुस आम
महंगा होने की वजह से बेहतरीन क्वालिटी का यह आम लोगों की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो गया है. वहीं युद्ध की स्थिति में इसके निर्यात पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है. इस गहरे आर्थिक संकट को देखते हुए, कोंकण के आम उत्पादक किसानों ने तुरंत सरकारी दखल, फसल बीमा योजना में सुधार और वित्तीय सहायता मुआवजे की मांग की है. गुस्साए किसानों ने अपनी मांगों को लेकर और सरकार का ध्यान खींचने के लिए हाल ही में मुंबई-गोवा नेशनल हाईवे पर चक्काजाम आंदोलन भी किया था.
गुरुप्रसाद दलवी की रिपोर्ट.











