मध्य प्रदेश में धार जिले के विवादित धार्मिक स्थल भोजशाला (कमाल मौला मस्जिद) में बसंत पंचमी पर विशेष पूजा करने की मांग वाली हिंदू पक्ष की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट आज (गुरुवार) को सुनवाई करेगा. हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस (HFJ) की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने 2 जनवरी को याचिका दायर की थी और मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट के सामने अर्जेंट सुनवाई के लिए अनुरोध किया था. इसपर कोर्ट गुरुवार (22 जनवरी) को सुनवाई के लिए तैयार हो गया था.
हिंदू पक्ष ने बसंत पंचमी के दिन भोजशाला में हिंदुओं को पूजा करने का विशेष अधिकार देने की मांग की है. सुनवाई के दूसरे दिन ही बसंत पंचमी (Basant Panchami 2026) का पर्व है. बसंत पंचमी वाले दिन ही शुक्रवार भी पड़ रहा है, जिस दिन मुस्लिम समाज जुमा की नमाज अदा करता है.
शुक्रवार को टकराव की आशंका
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन ही पड़ रही है, ऐसे में टकराव की आशंका है. याचिका में 23 जनवरी को भोजशाला परिसर में नमाज पर रोक लगाने और केवल हिंदुओं को मां सरस्वती की पूजा की अनुमति देने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि बसंत पंचमी के दिन भोजशाला परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई, ASI) और राज्य सरकार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए जाएं, ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े.
11वीं सदी का मां सरस्वती का मंदिर
याचिका में भोजशाला के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का हवाला देते हुए कहा गया है कि इस परिसर में मां वाग्देवी यानी सरस्वती का प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसका निर्माण 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज ने करवाया था. याचिका के अनुसार, लंबे समय तक यहां हिंदू नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते रहे हैं.
एएसआई ने दी पूजा और नमाज की इजाजत
हिंदू पक्ष ने 7 अप्रैल 2003 को एएसआई द्वारा जारी आदेश का भी जिक्र किया है. इस आदेश के तहत हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी. हालांकि, याचिका में कहा गया है कि एएसआई का यह आदेश उस स्थिति पर पूरी तरह मौन है, जब बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ती है.
क्या है दोनों पक्षों का दावा
याचिका में तर्क दिया गया है कि एएसआई के आदेश में इस तरह की परिस्थिति को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, जिससे टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. यह जगह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तहत एक संरक्षित स्मारक है. इसे लेकर हिंदुओं का दावा है कि यह 11वीं सदी में परमार राजा भोज द्वारा बनवाया गया देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है. वहीं, मुस्लमान इसे कमल मौला मस्जिद मानते हैं.
यह व्यापक विवाद ऐतिहासिक दावों से जुड़ा है. हिंदुओं का दावा है कि यह ढांचा मध्ययुगीन आक्रमणों के दौरान कथित विनाश और धर्मांतरण से पहले वैदिक शिक्षा का केंद्र और सरस्वती मंदिर था, जबकि मुसलमान मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के नाम पर बनी मस्जिद में पूजा की निरंतरता बनाए रखने की बात कहते हैं.
धार भोजशाला का इतिहास
- 1034 में राजा भोज ने कराया भोजशाला निर्माण
- 1456 में महमूद खिलजी ने भोजशाला को ढहाकर मकबरा बनाया
- 1933 में राजा आनंद राव की तबीयत बिगड़ी तो मुस्लिम समाज को नजाम की अनुमति मिली
- 1902 में हुए सर्वे में भोजशाला में हिंदू चिन्ह, संस्कृत के शब्द आदि पाए गए, लॉर्ड कर्जन ने रखरखाव के लिए 50 हजार रुपये मंजूर किए
- 1951 में भोजशाला को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया
- 1997 में भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया
- 2003 में हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा और मुस्लिम समाज को शुक्रवार को दोपहर 1-3 बजे नमाज की इजाजत दी गई














