गणतंत्र दिवस स्पेशल: 75 साल से नहीं टूटी देशभक्ति की कसम! एक महिला के संकल्प ने बना दी पीढ़ियों की परंपरा

Republic Day Special 2026: नर्मदा बाई का मानना था कि अधिकांश त्योहार किसी न किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय तक सीमित रहते हैं, जबकि राष्ट्रीय पर्व ऐसे अवसर हैं जिन्हें हर धर्म और समाज के लोग मिलकर मनाते हैं. इसी सर्वधर्म समभाव की भावना से उन्होंने सहभोज की परंपरा की नींव रखी.

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Republic Day Special 2026: देशभक्ति जब आचरण बन जाती है, तो वह परंपरा का रूप ले लेती है. मध्य प्रदेश के नीमच जिले के छोटे से गांव हरवार में ऐसी ही एक अनूठी परंपरा पिछले 75 वर्षों से जीवित है. वर्ष 1951 में गांव की स्वर्गीय नर्मदा बाई जाट द्वारा शुरू किया गया राष्ट्रीय पर्वों का सामूहिक उत्सव आज भी उसी श्रद्धा, निष्ठा और उत्साह के साथ निरंतर जारी है.

नर्मदा बाई जाट ने पति कालू सिंह जाट के असामयिक निधन के बाद भी हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने देशप्रेम को अपनी शक्ति बनाया और 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) और 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर पूरे गांव के साथ मिलकर मनाने की परंपरा शुरू की. इन दोनों राष्ट्रीय पर्वों पर वे गांव के सभी लोगों के लिए सामूहिक सहभोज आयोजित करती थीं. विशेष रूप से स्कूल के बच्चों को अपने खर्च पर भोजन कराकर वो देशभक्ति, समानता और सामाजिक समरसता का संदेश देती थीं.

अनूठी परंपरा की रखी नींव

नर्मदा बाई का मानना था कि अधिकांश त्योहार किसी न किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय तक सीमित रहते हैं, जबकि राष्ट्रीय पर्व ऐसे अवसर हैं जिन्हें हर धर्म और समाज के लोग मिलकर मनाते हैं. इसी सर्वधर्म समभाव की भावना से उन्होंने सहभोज की परंपरा की नींव रखी. वो कहा करती थीं कि अन्नदान सबसे बड़ा दान है और बच्चों को भोजन कराना सर्वोत्तम पुण्य है.

उन्होंने 17 जून 1988 तक अपने जीवनकाल में इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाया. इसके उनके बेटे मोहनलाल जाट ने 6 सितंबर 2019 तक यह जिम्मेदारी संभाली. वर्तमान में उनके पोते व पूर्व सरपंच रामप्रताप जाट और उनके भाई रामनिवास जाट इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. चौथी पीढ़ी के किशोर जाट, कुलदीप सिंह जाट और पीयूष जाट भी इस विरासत को निभाने के लिए संकल्पित हैं.

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समय के साथ एक चुनौती तब सामने आई जब शासन की मध्यान्ह भोजन योजना के तहत राष्ट्रीय पर्वों पर स्कूलों में विशेष भोजन शुरू हुआ. इससे परंपरा प्रभावित होने लगी. तब रामप्रताप जाट और ग्रामीणों ने तत्कालीन कलेक्टर अनुपम राजन से मिलकर परंपरा की जानकारी दी. प्रशासन ने समाधान निकालते हुए निर्देश दिए कि राष्ट्रीय पर्व के दिन बच्चे जाट परिवार के सहभोज में शामिल होंगे और शासन का विशेष भोजन अगले दिन दिया जाएगा. इस निर्णय से परंपरा सुरक्षित रह सकी.

आज भी इस आयोजन में ग्रामीणों के साथ आसपास के क्षेत्रों के लोग, विभिन्न विभागों के कर्मचारी और सामाजिक कार्यकर्ता उत्साहपूर्वक शामिल होते हैं.  ग्रामीणों का कहना है कि यह देशभक्ति व्यक्त करने का अनूठा और अनुकरणीय तरीका है, जो समाज में भाईचारा, एकता और राष्ट्रप्रेम की भावना को मजबूत करता है.

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