Ratlam Water Crisis: गर्मी अपने चरम पर है और रतलाम जिला मुख्यालय से महज 7 किलोमीटर दूर बसे ग्राम जूनवालिया में हालात ऐसे हैं कि लोग एक-एक बूंद पानी के लिए जंग लड़ने को मजबूर हैं. करीब 2000 से अधिक आबादी वाला यह गांव आज भी पीने के पानी के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहने को मजबूर है. गांव में घर हैं, बिजली है, सड़कें हैं… लेकिन अगर कुछ नहीं है तो वह है पीने का पानी. भीषण गर्मी के चलते गांव के लगभग चारों हैंडपंप पूरी तरह सूख चुके हैं. अब पूरे गांव की प्यास बुझाने का जिम्मा सिर्फ एक बोरिंग पर आ टिका है. सुबह होते ही महिलाएं और बच्चे डिब्बे-बाल्टी लेकर वहां पहुंच जाते हैं, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी मुश्किल से दो से चार डिब्बे पानी ही मिल पाता है.
एक नलकूप के भरोसे ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि पानी भरने के दौरान आए दिन विवाद की स्थिति बन जाती है. कोई आगे लगने को लेकर झगड़ता है तो कोई अपने हिस्से का पानी बचाने के लिए बहस करता नजर आता है. गांव में अन्य जरूरतों के लिए टैंकर मंगवाए जाते हैं, जिसका एक टैंकर करीब 500 रुपये में पड़ता है, लेकिन पीने के पानी के लिए ग्रामीणों को इसी एक नलकूप के भरोसे रहना पड़ रहा है.
टंकी में अब तक नहीं पहुंचा पानी
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गांव में नल-जल योजना के तहत नल तो लगाए गए हैं, पानी की टंकी भी बनी है और उसकी सफाई तक हो चुकी है, लेकिन टंकी में अब तक पानी नहीं पहुंचा. नतीजा यह है कि करोड़ों की योजनाएं कागजों में चल रही हैं और ग्रामीण आज भी डिब्बे लेकर लाइन में खड़े हैं.
घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता
गांव की छात्रा रानू ने बताया कि उसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी है, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा समय अब पानी भरने में निकल जाता है. रानू के मुताबिक कई बार 4 घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता. उन्होंने बताया कि बरसात के समय कुछ दिनों तक नलों में पानी जरूर आता है, लेकिन बारिश खत्म होते ही हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं.
तपती धूप में पानी के लिए संघर्ष
गांव के सबसे बुजुर्ग बाबू बा की स्थिति भी गांव की बदहाली बयां करती है. एक पैर नहीं होने के बावजूद पानी की जरूरत उन्हें लाठी के सहारे नलकूप तक खींच लाती है. तपती धूप में उनका पानी के लिए संघर्ष गांव की हकीकत को साफ दिखाता है. जूनवानिया की तस्वीर यह सवाल खड़ा कर रही है कि जब जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर यह स्थिति है, तो दूरदराज के गांवों में हालात कितने भयावह होंगे…? आखिर जिम्मेदारों की योजनाएं जमीन पर कब उतरेंगी और कब गांव की महिलाएं पानी के लिए लड़ना बंद कर सकेंगी…?














