Madhya Pradesh Migrant Workers to Rajasthan: मध्यप्रदेश के आगर-मालवा जिला मुख्यालय पर्वतीय बस स्टैंड और इसके आसपास के इलाकों में आजकल अलग ही तरह का नजारा देखने को मिल रहा है. सैकड़ों मजदूर रोजाना राजस्थान की तरफ जाने वाली बसों और अन्य वाहनों में सवार होकर काम की तलाश में जा रहे हैं.
मजदूरों की मजबूरी
सैकड़ों मजदूरों को पलायन करते देख एनडीटीवी ने उनसे उनकी मजबूरी पूछी. सबका जवाब लगभग एक जैसा था कि रोज़ी-रोटी की जुगत में ये लोग अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हैं. राजस्थान में जीरा की कटाई शुरू हो चुकी है. और ये वक्त इन मजदूरों के लिए त्यौहार जैसा है, क्योंकि इन दो महीनों में उनकी इतनी मजदूरी मिल जाती है कि साल के बाकी दिनों में भी काम आ जाती है.
Madhya Pradesh Migrant Workers to Rajasthan
सीमावर्ती इलाकों पर असर
पड़ोसी राज्य राजस्थान में जीरा और रायड़ा की कटाई शुरू होते ही इसका सीधा असर मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में देखा जा रहा है. राजस्थान की सीमा से लगे आगर-मालवा से सैकड़ों मजदूर काम की तलाश में राजस्थान का रुख कर रहे हैं. परिवार के साथ गृहस्थी का पूरा सामान लोडिंग वाहनों में रख कर ये मजदूर गांव छोड़ कर रोजगार के लिए निकल पड़े हैं.
मजदूरी और योजनाओं का अंतर
मजदूरी करने वाले परिवारों का आरोप है कि शासन की रोजगार देने वाली योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है और जो नाममात्र की मजदूरी मिलती है उसमें उनका गुजर बसर नहीं हो पाता. जबकि राजस्थान में मजदूरी की दर ज्यादा है. ऐसे में ये लोग पूरे दो महीने के लिए राजस्थान की तरफ जा रहे हैं.
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मजदूर राकेश ने एनडीटीवी से चर्चा में बताया कि महंगाई के कारण यहां रोजगार नहीं मिल पाता है. यदि रोजगार मिलता तो वह बाहर काम के लिए नहीं जाते, मजबूरी में जा रहे हैं. सरकार की नई योजना वी बी जी रामजी योजना के बारे में जब राकेश से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये सब झूठ है.
ग्राम भ्याना के सुनील ने बताया कि खेती में कोई लाभ नहीं है. परिवार का गुजर बसर नहीं हो पाता. छह महीने खेती में लगते हैं, किन्तु हाथ में कुछ नहीं बचता.
एक अन्य मजदूर ने बताया कि जैसलमेर में जीरा कटाई या अन्य मजदूरी कार्य के लिए प्रति व्यक्ति कम से कम 750 रुपये प्रति दिन मिलते हैं और यह मजदूरी नगद मिलती है. जबकि मध्यप्रदेश में 300 रुपए भी मुश्किल से मिल पाते हैं.
Madhya Pradesh Migrant Workers to Rajasthan
बच्चे भी पलायन में शामिल
पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली राधा भी इन मजदूरों के साथ पलायन के लिए निकली है. छोटी सी उम्र में काम की मजबूरी राधा को राजस्थान की तरफ ले जा रही है. पढ़ाई खराब होने की चिंता तो है ही, साथ ही अगर काम के लिए नहीं गए तो चूल्हा कैसे चलेगा, यह भी चिंता है.
ग्यारहवीं में पढ़ने वाले विनय का ख्वाब है कि वह लोको पायलट बनकर ट्रेन चलाए, मगर घर चलाने की मजबूरी में गांव छोड़ कर जा रहे हैं. जीरा की कटाई में से कुछ हजार रुपए हाथ आ जाएंगे तो घर का खर्च निकल जाएगा. नसीब में हुआ तो पढ़ाई बाद में होगी.
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