Labour Day Special: मजदूर दिवस पर चरचा माइंस की यह कहानी सिर्फ मेहनत की नहीं, बल्कि बदलती तकनीक, मजबूत सुरक्षा और उन अनदेखे नायकों की है, जो रोज अंधेरे में उतरकर देश को रोशनी देते हैं. जब एनडीटीवी की टीम एसईसीएल के बैकुंठपुर क्षेत्र की चरचा अंडरग्राउंड माइंस में उतरी, तो जमीन के सैकड़ों फीट नीचे मेहनत, अनुशासन और तकनीक से जुड़ी एक अलग ही दुनिया सामने आई. यह वही दुनिया है जो हर दिन अंधेरे में काम कर देश की ऊर्जा जरूरतों को रोशन करती है. यहां मजदूरों की दिनचर्या समयबद्ध प्रक्रियाओं, आधुनिक मशीनों और मजबूत सुरक्षा इंतजामों से बंधी है. कभी बेहद जोखिम भरा माना जाने वाला यह काम अब तकनीक और प्रशिक्षण के सहारे कहीं ज्यादा सुरक्षित हो चुका है, जहां इंसानी जान की कीमत सबसे ऊपर है. ऐसा रहा अनुभव.
ऐसे शुरू होती है प्रक्रिया
चरचा माइंस में काम करने वाले मजदूर सुबह करीब 6 बजे घर से निकलते हैं. माइंस पहुंचते ही सबसे पहले वे अपने सुरक्षा बॉक्स से हेलमेट, फ्लोरेसेंट जैकेट और गमबूट पहनते हैं. इसके बाद बायोमेट्रिक अटेंडेंस, हाजिरी बाबू के यहां उपस्थिति और लैंप रूम से केप लैंप लेना अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है.
अंडरग्राउंड सफर की शुरुआत
लैंप क्लर्क से एंट्री के बाद मजदूर पीट ऑफिस पहुंचते हैं, जहां ड्यूटी का बंटवारा होता है. इसके बाद जीएमटी ट्रॉली के जरिए उन्हें जीरो नंबर माइंस के भीतर फेस तक ले जाया जाता है. यहीं से असली काम शुरू होता है.
Labour Day Special: चरचा माइंस की ग्राउंड रिपोर्ट
काम से पहले सुरक्षा की पड़ताल
फेस पर पहुंचने के बाद माइनिंग सरदार सबसे पहले सुरक्षा जांच करते हैं. इसके बाद मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल टीमें अपनी मशीनों का निरीक्षण करती हैं. जब तीनों विभाग ‘ऑल क्लियर' देते हैं, तभी उत्पादन कार्य शुरू होता है.
तकनीक ने घटाया जोखिम
पहले जहां मजदूर सीधे खतरे के बीच काम करते थे, अब रिमोट कंट्रोल मशीनें 50 से 60 मीटर दूर से संचालित की जाती हैं. पैनल इंचार्ज आकाश ठाकरे के अनुसार, आधुनिक तकनीक के चलते इंसान अब सीधे जोखिम वाले क्षेत्र से बाहर रहता है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका काफी कम हो गई है.
मजदूरों की जुबानी बदलाव की कहानी
मजदूर मनीष सिंह बताते हैं कि पहले ब्लास्टिंग और मैन्युअल काम के दौरान हादसों का डर बना रहता था, लेकिन अब पूरी प्रणाली ज्यादा सुरक्षित और व्यवस्थित हो चुकी है. टीएमसी कंपनी के मनोज सिवा के मुताबिक, रूफ बोल्टिंग जैसी तकनीक खदान की छत को गिरने से रोकने में अहम भूमिका निभा रही है.
सुरक्षा और इलाज की पुख्ता व्यवस्था
चरचा माइंस में हर डिस्टिक में फर्स्ट एड स्टेशन मौजूद है. माइनिंग स्टाफ को प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया गया है. किसी भी हादसे की स्थिति में खदान के भीतर ही शुरुआती इलाज होता है, फिर स्ट्रेचर से बाहर लाकर एंबुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचाया जाता है.
वेंटिलेशन है खदान की जीवनरेखा
सब एरिया मैनेजर संजय सिंह के अनुसार, खदानों में बड़े कैपेसिटी के एग्जॉस्ट फैन गर्म और अशुद्ध हवा को बाहर निकालते हैं, जबकि इंकलाइन के जरिए ताजी हवा अंदर भेजी जाती है. इससे खदान का वातावरण संतुलित और सुरक्षित बना रहता है.
मजदूरों को राहत देती एसी कैंटीन
चरचा कॉलरी में अब वातानुकूलित कैंटीन संचालित हो रही है, जहां 2 से 5 रुपये में जलेबी, समोसा, भजिया और गुलाब जामुन जैसे खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं. गर्मी में यह सुविधा मजदूरों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों के लिए राहत बन रही है.
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