MP में मजदूरों की 'खामोश' मौत: हर साल 60 हजार श्रमिक तोड़ रहे दम, अब कलेक्टरों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

Sanitation Workers Safety in India: देश के सबसे साफ शहर इंदौर में दो सफाईकर्मियों की सीवर में दम घुटने से मौत हो गई. यह हादसा मध्य प्रदेश के उस भयावह आंकड़े को भी उजागर करता है जहाँ हर साल 60 हजार से अधिक मजदूर अपनी कामकाजी उम्र में ही दम तोड़ रहे हैं. पढ़ें सिस्टम की लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर यह विशेष रिपोर्ट

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Madhya Pradesh Labour Mortality Rate: इंदौर में मार्च के पहले सप्ताह में दो सफाईकर्मियों की सीवर में दम घुटने से मौत हो गई थी. यह वही शहर है जिसे बार-बार भारत का सबसे साफ शहर कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ दो लोगों के जहरीली गैस वाले चैंबर में फंसकर मरने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है जहां शहरों को साफ रखने वाले मजदूर खुद चुपचाप मौत के मुंह में धकेले जाते रहते हैं. मध्यप्रदेश में ही हर साल 60 हजार से ज्यादा मजदूर 60 साल की उम्र से पहले ही मर रहे हैं, यह आंकड़ा खुद श्रम विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है. इन मौतों में निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों, खेतों और सफाई जैसे खतरनाक कामों में लगे मजदूर शामिल हैं. यह रिपोर्ट उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है जहां शहर को 'नंबर वन' बनाए रखने वाले हाथ खुद सुरक्षा उपकरणों के अभाव में मौत के गड्ढों में धकेले जा रहे हैं.

 चोइथराम मंडी हादसा: चंद मिनटों में काल बन गया सीवर चैंबर

घटना मार्च की एक सामान्य शाम करीब 6:30 बजे की है, जब इंदौर नगर निगम के सफाईकर्मी चोइथराम मंडी गेट के पास सक्शन टैंकर के साथ सीवर लाइन की सफाई करने पहुंचे थे. काम के दौरान अचानक सक्शन मशीन का एक पाइप टूटकर गहरे सीवर टैंक के भीतर गिर गया. उसे निकालने के लिए सफाईकर्मी करण बिना किसी सुरक्षा उपकरण के चैंबर के भीतर उतरा, लेकिन वहां जमा जानलेवा जहरीली गैस ने उसे संभलने का मौका तक नहीं दिया. करण को बेहोश होता देख उसका साथी अजय उसे बचाने के लिए नीचे कूदा, मगर उस अदृश्य कातिल गैस ने अजय को भी अपनी चपेट में ले लिया. कुछ ही मिनटों में दोनों की सांसे थम गईं. हालांकि स्थानीय लोगों ने साहस दिखाते हुए अन्य दो लोगों को बाहर निकाल लिया, लेकिन करण और अजय की जान नहीं बचाई जा सकी.

दो घंटे की देरी और सुरक्षा मानकों की क्रूर अनदेखी

इस हादसे ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और आपातकालीन रिस्पांस तंत्र पर कई तीखे सवाल दाग दिए हैं. प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय नागरिक अमित रजक का आरोप है कि घटना के बाद करीब दो घंटे तक न तो पुलिस पहुंची, न एम्बुलेंस और न ही नगर निगम की कोई रेस्क्यू टीम. सबसे बड़ा सवाल यह है कि रोबोटिक सफाई और आधुनिक मशीनों का दावा करने वाले देश के सबसे स्वच्छ शहर में मजदूर बिना गैस डिटेक्शन उपकरण, ऑक्सीजन मास्क या सेफ्टी हार्नेस के सीवर में क्यों उतरे? एडिशनल डीसीपी सुमित केरकट्टा ने गैस से बेहोश होने की पुष्टि तो की, लेकिन सुरक्षा मानकों की इस घोर अनदेखी का जवाब अब भी फाइलों में दफन है.

संबल योजना के आंकड़े: एमपी में असमय जा रहे हैं मजदूर

वैसे आपको बता दें कि इंदौर की यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में मजदूरों की व्यापक दुर्दशा का एक छोटा सा हिस्सा है. श्रम विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड (संबल योजना) के आंकड़े रूह कंपा देने वाले हैं. प्रदेश में हर साल 18 से 60 वर्ष की कामकाजी उम्र के लगभग 60 हजार मजदूर मौत के मुंह में समा रहे हैं. अकेले वर्ष 2024-25 में लगभग 57 हजार सामान्य मौतें और 5,800 दुर्घटनाजन्य मौतें दर्ज की गईं. जहां प्रदेश में औसत आयु 67 वर्ष है, वहीं हजारों मजदूर 60 की उम्र तक पहुंचने से पहले ही निर्माण स्थलों, कारखानों और खेतों में काम करते हुए दम तोड़ रहे हैं. यह राज्य की अर्थव्यवस्था और श्रम शक्ति के लिए एक अपूरणीय क्षति है.

स्वच्छता का पुरस्कार और मजदूर की जान पर सवाल

इंदौर हर साल स्वच्छता का पुरस्कार जीतकर जश्न मनाता है, लेकिन करण और अजय जैसे मजदूरों की मौत हमें उस कड़वी हकीकत का अहसास कराती है कि इस चमक को बनाए रखने के लिए सबसे गरीब तबका अपनी जान की बाजी लगा रहा है. कानून होने के बावजूद बिना सुरक्षा कवच के जहरीले चैंबरों में उतरना आज भी बदस्तूर जारी है. यह घटना न केवल इंदौर के लिए एक धब्बा है, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि विकास की ऊंचाइयों को छूने की दौड़ में कहीं हम अपने उन आधार स्तंभों (मजदूरों) को तो नहीं खो रहे, जिनके दम पर यह ढांचा खड़ा है.
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