Indore BRTS High Court: इंदौर में बीआरटीएस कॉरिडोर हटाने को लेकर चल रहा मामला एक बार फिर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के केंद्र में आ गया है. सोमवार को इंदौर हाई कोर्ट में इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर असंतोष जाहिर किया. कोर्ट का साफ कहना था कि लंबे समय से मामला लंबित है, लेकिन अब तक जमीन पर ठोस और समयबद्ध काम क्यों नहीं हो पाया?
हाई कोर्ट में हुई अहम सुनवाई
यह सुनवाई जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष हुई. मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर शिवम वर्मा, नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंगल, पीडब्ल्यूडी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, संबंधित ठेकेदार और डीएसपी ट्रैफिक कोर्ट में मौजूद रहे. जनहित याचिका में बीआरटीएस कॉरिडोर हटाने और उससे जुड़ी यातायात समस्याओं का मुद्दा उठाया गया है.
अधिकारियों के तर्कों पर नाराजगी
सुनवाई के दौरान अधिकारियों की ओर से रेलिंग, एलिवेटेड ब्रिज और तकनीकी अड़चनों जैसे कई तर्क रखे गए. इन दलीलों पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि बार‑बार अलग‑अलग कारण गिनाने से समस्या हल नहीं होती. कोर्ट ने सवाल किया कि इतने समय बाद भी ठोस योजना बनाकर काम पूरा क्यों नहीं किया गया.
खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक विभाग दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डाल रहा है, जिसका सीधा नुकसान आम जनता को हो रहा है. कोर्ट ने अधिकारियों के जवाबों को बहानेबाजी बताते हुए साफ किया कि प्रशासनिक तालमेल की कमी को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
अगली सुनवाई और पेनल्टी की चेतावनी
कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 28 जनवरी तय की है. साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि निर्धारित समय सीमा में ठेकेदार काम पूरा नहीं करता है, तो नगर निगम पर भी पेनल्टी लगाई जा सकती है.
जनता की परेशानी कोर्ट की चिंता
हाई कोर्ट की नाराजगी का मुख्य कारण आम लोगों को हो रही परेशानी है. बीआरटीएस कॉरिडोर से जुड़े अधूरे काम और अव्यवस्थाएं रोज़ाना यातायात को प्रभावित कर रही हैं. अदालत ने यह साफ कर दिया है कि प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ कागज़ी तर्क देने की नहीं, बल्कि समय पर काम पूरा करने की है.














