Soybean Farmers MP: भारत और अमेरिका के बीच हुई हालिया ट्रेड डील की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि इसकी तपिश मध्य प्रदेश के खेतों तक पहुंचने लगी है. दरअसल कागजों पर लिखे गए आयात-निर्यात के आंकड़े जब नीति की भाषा से निकलकर खेत की मिट्टी में पहुंचते हैं, तो उनका गणित बदल जाता है. देश के कुल सोयाबीन उत्पादन का करीब आधा हिस्सा पैदा करने वाले मध्य प्रदेश को देश का “सोयाबीन कटोरा” कहा जाता है पर यहां के किसानों के लिए यह सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि उनके भविष्य का सवाल बन गया है.क्या है फिक्र की वजह और क्या कह रही है सरकार पढ़िए अनुराग द्वारी की ग्राउंड रिपोर्ट में
आंकड़ों का मायाजाल और ज़मीन का डर
भारत ने मक्का और सोयाबीन के सीधे आयात पर अपनी पुरानी रोक बरकरार रखी है, क्योंकि अमेरिका में ये फसलें जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) होती हैं. लेकिन इस सौदे की बारीकियों में एक ऐसी बात छिपी है जो किसानों को डरा रही है. सरकार ने पशुओं के चारे (DDGS),लाल ज्वार और सोयाबीन तेल के आयात को हरी झंडी दे दी है. कागजों पर यह सौदा भले ही सुरक्षित और संतुलित दिखे, लेकिन मध्य प्रदेश का किसान अब अपना कैलकुलेटर लेकर बैठ गया है. उसे डर है कि सीधे अनाज न सही, लेकिन उसके 'बाय-प्रोडक्ट्स' पिछले दरवाजे से आकर बाजार को तबाह कर देंगे.
ग्रेजुएट किसान का गणित: मशीनों से कैसे लड़ेगा हाथ?
आगर मालवा के 32 वर्षीय ग्रेजुएट किसान जितेन्द्र यादव इसका जीता-जागता उदाहरण हैं. 50 एकड़ की जोत संभालने वाले जितेन्द्र कंप्यूटर पर ट्रेड डील की बारीकियां समझते हैं. उनका कहना है कि सोयाबीन में पिछले तीन-चार सालों से वैसे ही भाव नहीं मिल रहा था, इस साल उम्मीद जागी थी लेकिन अब आशंकाओं के बादल हैं.जितेन्द्र के मुताबिक,"अमेरिका में विशाल खेत हैं,भारी सरकारी सब्सिडी है और मशीनों से खेती होती है. भारत का किसान छोटा है और यहां हाथ से मेहनत होती है. अगर वहां का सस्ता माल बाजार में आया, तो हमारे देसी माल को कौन पूछेगा?"
शिवराज के गढ़ में सवाल:'साहब, सीधी भाषा में समझ लो'
मंडियों का हाल जानने जब हम सीहोर पहुँचे—जो खुद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह क्षेत्र है—तो वहां किसानों ने बहुत ही सीधी भाषा में इस डील का संकट समझाया. खजुरिया खुर्द और शिकारपुर से आए किसानों का कहना है कि DDGS असल में मक्का और चावल से एथेनॉल निकालने के बाद बचा हुआ सस्ता चारा है. किसान अपनी सोयाबीन की खली (DOC) करीब 44 रुपये में बेचते हैं, जबकि अमेरिका का यह प्रोटीन वाला चारा 24 से 30 रुपये में आ जाएगा.अगर सस्ता चारा बाहर से आएगा, तो भारतीय सोयाबीन की खली की मांग गिर जाएगी और किसान को उसकी लागत तक नहीं मिलेगी.
आत्मनिर्भरता बनाम आयात: डेयरी सेक्टर की चिंता
कंप्यूटर साइंस में डिग्री लेने के बाद खेती और डेयरी का काम संभाल रहे अजय यादव रोज 65 लीटर दूध बेचते हैं. कृषि मंत्री की यह बात कि लिक्विड दूध और पनीर जैसे उत्पादों को एंट्री नहीं मिलेगी, उन्हें पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर पा रही. अजय कहते हैं, "भारतीय किसान के पास न ज्यादा जमीन है, न वैसी सुविधाएं. अमेरिका में खेती एक उद्योग है. हम हाथ से दूध निकालते हैं और खर्च बचाने के लिए दिन-रात एक करते हैं. ऐसी ट्रेड डील हमें आत्मनिर्भर नहीं रहने देगी. यह तो वही बात हुई कि जनता को खुश करने के लिए पहले दाम बढ़ाए जाएं और फिर थोड़ी सी कटौती कर दी जाए. पिस तो अंत में छोटा आदमी ही रहा है."
सब्सिडी की वो दीवार जिसे लांघना नामुमकिन है
जानकारों के मुताबिक, इस लड़ाई में मैदान बराबर का नहीं है. अमेरिका में एक किसान को साल भर में औसत 64,000 डॉलर की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा महज 64 डॉलर के आसपास सिमट जाता है. ऐसे में अमेरिकी उत्पादों का मुकाबला करना भारतीय किसानों और स्थानीय डिस्टिलरियों के लिए बड़ी चुनौती होगी.
दूसरी तरफ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का आरोप है कि यह डील भारतीय किसानों पर तलवार रखकर की गई है और इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी. उनका कहना है कि यहां के किसान पर बहुत असर पड़ेगा ,दूध,मक्का नहीं आएगा लेकिन इससे बने प्रोडक्ट आएंगे. कृषि मंत्री को किसानों के लिए आवाज उठानी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. अगर इस डील पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो कांग्रेस एक दिन पूरे प्रदेश को जाम रखेगी.
क्या दांव पर है किसान का भविष्य?
राजनीतिक बयानबाजियों और फाइलों की शर्तों के बीच सबसे बड़ी चिंता 'बाजार' की है. किसान आशंकित हैं कि अगर आज नियमों में ढील दी गई, तो कल बीज और तकनीक पर भी विदेशी कंपनियों का कब्जा हो जाएगा. बाज़ार अभी से डराने लगा है क्योंकि डील की चर्चा मात्र से सोयाबीन की कीमतें नीचे आने लगी हैं. जैसा कि इस ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान महसूस हुआ—सरकार भले ही कहे कि किसान सुरक्षित है, लेकिन किसान कहता है कि खतरा अब उसके दरवाजे पर खड़ा है. यह डील कितनी संतुलित है, इसका फैसला किताबों में नहीं बल्कि आने वाले समय में मध्य प्रदेश के सोयाबीन खेतों में होगा.
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