Potatoes in air: मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने खेती की दुनिया में एक बड़ी खोज की है. जिसकी बदौलत अब किसान बिना मिट्टी के ही हवा में आलू उगा सकेंगे. विश्वविद्यालय ने एरोपोनिक्स तकनीक का उपयोग कर आलू उगाने की विधि विकसित की है, जिसमें पौधों को हवा में लटकाकर उनकी जड़ों पर पोषक तत्वों की बौछार की जाती है. इस तकनीक से खास तौर पर 'लेडी रोसेटा' किस्म के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं, जो अगले दो-तीन साल में एमपी के किसानों के पास भी उपयोग के लिए उपलब्ध होंगे.
हवा में खेती और बंपर पैदावार
इस नई खोज ने खेती के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है. एरोपोनिक्स एक ऐसी विधि है जिसमें पौधों को मिट्टी के बजाय हवा में लटकाया जाता है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए खास थर्माकोल शीट का इस्तेमाल किया है, जिसमें छोटे-छोटे छेद करके आलू के पौधों को इस तरह लगाया जाता है कि उनकी पत्तियां ऊपर धूप की तरफ रहें और जड़ें नीचे एक अंधेरे बॉक्स में लटकती रहें. इन लटकती जड़ों पर हर कुछ मिनट में कंप्यूटर नियंत्रित मशीनों के जरिए पानी और जरूरी पोषक तत्वों की धुंध (Mist) छिड़की जाती है. इससे पौधे को सीधा पोषण मिलता है और मिट्टी न होने की वजह से फंगल इंफेक्शन या मिट्टी से पैदा होने वाले रोगों का खतरा शून्य हो जाता है.
Potatoes in air: इस तकनीक से पैदा होने वाले आलू की जड़ें हवा में लटकी रहती हैं. ये आप तस्वीरों में देख सकते हैं.
कम लागत में छप्परफाड़ पैदावार का गणित
यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने बताया कि यह तकनीक किसानों की जेब भरने वाली साबित होगी. अगर आंकड़ों पर गौर करें तो सामान्य पद्धति से एक एकड़ में आलू की खेती करने के लिए किसान को करीब 8 से 10 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है, जिससे लगभग 100 क्विंटल की पैदावार होती है. वहीं, एरोपोनिक्स तकनीक से तैयार किए गए बीज की गुणवत्ता इतनी शानदार होती है कि महज 1.20 क्विंटल बीज ही एक एकड़ के लिए पर्याप्त होगा. हैरानी की बात यह है कि कम बीज के बावजूद इसकी पैदावार सामान्य से दोगुनी से भी ज्यादा यानी करीब 238 क्विंटल तक पहुंच सकती है. यह किसानों के लिए 'कम इनपुट और ज्यादा आउटपुट' का बेहतरीन मॉडल है.
Rosetta Potato Gwalior: नई तकनीक से पैदा होने वाले आलू इस तरह के होते हैं. चिप्स कंपनियों की ये पहली पसंद बन रहे हैं.
'लेडी रोसेटा' का जलवा: चिप्स कंपनियों में भारी मांग
विश्वविद्यालय इस तकनीक से मुख्य रूप से 'लेडी रोसेटा' प्रजाति के बीज तैयार कर रहा है. यह आलू देखने में लाल और एकदम गोल होता है, जो मशीनों से प्रोसेसिंग के लिए सबसे सटीक माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी इसमें मौजूद 'लो-शुगर' है. अक्सर सामान्य आलू के चिप्स तलते समय लाल या काले पड़ जाते हैं, जिससे उनकी क्वालिटी खराब लगती है, लेकिन लेडी रोसेटा आलू के चिप्स एकदम सुनहरे और क्रिस्पी बनते हैं. यही वजह है कि बड़ी चिप्स बनाने वाली कंपनियां सीधे किसानों के पास पहुंचती हैं. अब तक मध्य प्रदेश के किसान इस फायदे से थोड़े दूर थे, लेकिन अब गुजरात, बिहार और पंजाब के किसानों की तरह वे भी अपनी फसल का सौदा सीधे बड़ी कंपनियों से कर सकेंगे.
टिश्यू कल्चर से बीज तक का सफर
इस चमत्कारिक आलू को तैयार करने की प्रक्रिया लैब से शुरू होती है. सबसे पहले टिश्यू कल्चर और बायो-टेक्नोलॉजी की मदद से नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं. जब इन पौधों में जड़ें और पत्तियां पूरी तरह विकसित हो जाती हैं, तब इन्हें एरोपोनिक्स यूनिट में शिफ्ट किया जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस विधि से तैयार आलू न केवल रोग-मुक्त होते हैं, बल्कि इनके कंद भी एक समान आकार के होते हैं. यह तकनीक पानी की बचत में भी नंबर वन है, क्योंकि इसमें स्प्रे किया गया पानी दोबारा री-साइकिल होकर उपयोग में लाया जा सकता है. भविष्य में यह तकनीक उन इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी जहां खेती योग्य जमीन कम है या मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो चुकी है.
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