गड्ढा खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर लोग, इंसान और जानवर एक ही जगह से बुझाते हैं प्यास

मध्य प्रदेश के गुना जिले के टांडा गांव से हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां लोग गड्ढा खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. इंसान और जानवर एक ही जगह से पानी पी रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि दूषित पानी से बीमारियां बढ़ रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं मिला.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins

आजादी के 78 साल बाद भी देश में कई ऐसी जगह है, जहां लोग सबसे जरूरी चीज पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. एमपी के गुना जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के तमाम दावों पर सवाल खड़े कर देती है. यहां एक आदिवासी गांव के लोग आज भी गड्ढा खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. हालात इतने खराब हैं कि इंसान और जानवर एक ही जगह से पानी पी रहे हैं. बूंद-बूंद के लिए जूझते इन लोगों की जिंदगी किसी संघर्ष से कम नहीं है, और उनका दर्द सीधे व्यवस्था की पोल खोलता नजर आता है.

जंगल में बसा गांव, सुविधाओं से दूर

गुना मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर राई पंचायत का टांडा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. जंगल के बीच बसे इस छोटे से गांव में करीब 20 से 25 घर हैं, लेकिन यहां तक न सड़क पहुंची और न ही साफ पानी की कोई व्यवस्था है. आजादी के इतने साल बाद भी गांव की हालत जस की तस बनी हुई है.

पानी के लिए गड्ढा ही सहारा

गांव की सबसे बड़ी समस्या पानी है. यहां न बोरवेल है, न हैंडपंप और न ही कोई पेयजल योजना. मजबूरी में ग्रामीणों ने एक नाले के किनारे गड्ढा खोदकर ‘झिरिया' बना ली है. उसी में भरने वाले गंदे पानी को छानकर या जैसे-तैसे लोग पीते हैं. यही पानी खाना बनाने और नहाने के काम भी आता है. हालात इतने खराब हैं कि उसी गंदे पानी को जानवर भी पीते हैं. यानी इंसान और मवेशियों के बीच पानी को लेकर कोई फर्क ही नहीं रह गया है. गांव में साफ पानी का एक भी भरोसेमंद स्रोत नहीं है.

बीमारियां बढ़ीं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं

ग्रामीणों का कहना है कि इस दूषित पानी की वजह से बच्चे और बुजुर्ग लगातार बीमार पड़ते रहते हैं. कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकला. लोग कहते हैं कि चुनाव के समय नेता आते हैं, वादे करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं.

Advertisement

जनप्रतिनिधियों पर उठे सवाल

गांव वालों की नाराजगी साफ झलकती है. उनका कहना है कि सरपंच भी चुनाव के बाद दोबारा गांव नहीं आया. ऐसे में लोगों को लगता है कि उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यह भी सवाल उठ रहा है कि बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार तक इनकी आवाज क्यों नहीं पहुंच पा रही.

सबसे अहम सवाल यह है कि जब “हर घर जल” जैसी योजनाओं का प्रचार किया जा रहा है, तब टांडा जैसे गांवों में लोग गड्ढों का पानी पीने को क्यों मजबूर हैं. यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि व्यवस्था की सच्चाई दिखाती है.

Advertisement

लगातार काम किया जा रहा- कलेक्टर

इस मामले में गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल का कहना है कि जिले में जहां-जहां पानी की समस्या है, वहां लगातार काम किया जा रहा है. जल निगम और पीएचई के तहत काम चल रहा है और कई जगह पूरे भी हो चुके हैं. उन्होंने बताया कि गर्मियों में जल स्तर नीचे जाने के कारण परेशानी बढ़ जाती है, लेकिन सरकार ने नए बोरवेल की मंजूरी दी है और जल्द समाधान की कोशिश की जा रही है.

विपक्ष ने उठाए सवाल

वहीं, कांग्रेस के बमोरी विधायक ऋषि अग्रवाल ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है. उनका कहना है कि इलाके में पानी की समस्या गंभीर है और कई गांव आज भी साफ पीने के पानी से वंचित हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि बजट की कमी के कारण नए बोरवेल नहीं हो पा रहे और नल-जल योजना भी पूरी तरह फेल साबित हो रही है. 

Featured Video Of The Day
NEET Paper Leak 2026 : नीट री-एग्जाम में क्यों पड़ रही वायुसेना की जरूरत और क्या होगा फायदा? | NDTV