भोजशाला: 1000 साल का सफर, जहां पत्थरों में कैद है विद्या और विवाद की दास्तान

Dhar Bhojshala Controversy: धार की ऐतिहासिक भोजशाला का 1000 साल पुराना सफर, जो कभी विद्या का मंदिर था और आज विवादों के केंद्र में है. जानिए कैसे यह परिसर सरस्वती मंदिर और कमाल मौला मस्जिद के बीच कानूनी लड़ाई का हिस्सा बना. पत्थरों पर उकेरी गई इस विरासत की पूरी दास्तान और मौजूदा स्थिति की विस्तृत जानकारी.

विज्ञापन
Read Time: 5 mins

History of Bhojshala: मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला पत्थरों का कोई साधारण ढांचा नहीं है,बल्कि यह समय के उस कालखंड की गवाह है जहां कभी वेदों की ऋचाएं गूंजती थीं और आज इसी पर कानून की दलीलें सुनी जाती हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दस्तावेजों में भले ही इसे "भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर" कहा जाता हो, लेकिन इस 11वीं सदी के स्मारक की कहानी आस्था, राजनीति और इतिहास के बीच उलझी एक ऐसी जीवित गाथा है, जो हर वसंत पंचमी पर फिर से सुर्खियां बटोरने लगती है.

राजा भोज की 'ज्ञानशाला' से 'विश्वविद्यालय' तक का सफर

इस कहानी की नींव 1034 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने रखी थी. राजा भोज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि 72 कलाओं और 36 प्रकार के आयुध विज्ञान के महान ज्ञाता थे. उन्होंने धार में एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसे आज हम भोजशाला के नाम से जानते हैं. यह संस्थान नालंदा और तक्षशिला की समृद्ध परंपरा का हिस्सा था, जहां सैकड़ों लाल स्तंभों के नीचे बैठकर दुनिया भर से आए छात्र अपनी बौद्धिक प्यास बुझाते थे. 1035 ईस्वी में वसंत पंचमी के दिन यहां मां सरस्वती की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और लगभग 271 वर्षों तक यह स्थान विश्व में शिक्षा का प्रमुख केंद्र बना रहा.

दीवारों पर अंकित है व्याकरण और कला का इतिहास

सरकारी विवरण और पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि भोजशाला की वास्तुकला आज भी अपने गौरवशाली अतीत को बयां करती है. मस्जिद के प्रांगण, स्तंभों और छतों पर की गई नक्काशी मूल रूप से प्राचीन महाविद्यालय का हिस्सा है. यहां दीवारों पर लगी शिलाओं पर संस्कृत व्याकरण, संज्ञाएं, क्रियाएं और 10 प्रकार के काल (Tenses) उत्कीर्ण हैं. इतना ही नहीं, यहां विष्णु के 'कर्मावतार' पर प्राकृत भाषा में लिखे स्तोत्र और राजा अर्जुनवर्मा देव के शासनकाल के दौरान रचित 'करपुरमंजरी' जैसे नाटक भी पत्थरों पर उकेरे गए हैं. यह स्थान कालिदास, बाणभट्ट और भवभूति जैसे विद्वानों की महान परंपरा का केंद्र रहा है.

भोजशाला विवाद सदियों पुराना है. आज भी देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक लिखे हुए हैं, जबकि अंग्रेज अधिकारी वहां लगी वाग्देवी की मूर्ति को अपने साथ लंदन ले गए थे.'

Advertisement

14वीं सदी के आक्रमण और स्वरूप बदलने की कोशिश

इतिहास ने 1305 ईस्वी में करवट ली, जब अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के साथ मालवा में परमार शासन का अंत हुआ. इसके बाद भोजशाला के स्वरूप को बदलने की कोशिशें शुरू हुईं. 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने इसे मस्जिद में तब्दील करने का प्रयास किया. इसी दौरान परिसर के बाहर एक मकबरा बनाया गया जिसे कमाल मौलाना से जोड़ा गया, जबकि ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कमाल मौलाना की मृत्यु इस निर्माण से दो सदी पहले ही हो चुकी थी. धीरे-धीरे ज्ञान का यह केंद्र विवादों के घेरे में आता गया.

धार भोजशाला परिसर के अंदर मौजूद कई प्राचीन निर्माण अपनी बात खुद ही बयां करते हैं

वाग्देवी की प्रतिमा और लंदन का 'ब्रिटिश म्यूजियम'

भोजशाला की कहानी का एक दर्दनाक पहलू वह है जब 1875 में अंग्रेज अधिकारी मेजर किंकैड ने यहां खुदाई करवाई. इस दौरान मां वाग्देवी (सरस्वती) की खंडित प्रतिमा मिली, जिसे अंग्रेज अपने साथ लंदन ले गए. पिछले 151 वर्षों से यह प्रतिमा अपनी मूल धरती से हजारों मील दूर ग्रेट रसेल स्ट्रीट स्थित ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है. 1961 में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने इस प्रतिमा को वापस लाने के लिए लंदन जाकर कई प्रमाण भी दिए, लेकिन वह आज भी भारत वापसी की प्रतीक्षा में है.

Advertisement

आजादी के बाद का प्रशासनिक और कानूनी संघर्ष

भोजशाला को लेकर कानूनी और प्रशासनिक खींचतान का लंबा इतिहास रहा है. 1936 से लेकर 1942 के बीच नमाज और पूजा को लेकर कई विवाद हुए. 1995 के बाद से संघर्ष और गहरा गया, जब कभी पूजा के दिन तय किए गए तो कभी नमाज के समय. 1997 में सुरक्षा कारणों से आम लोगों का प्रवेश भी रोका गया. 2013 और 2016 के दौरान जब वसंत पंचमी और शुक्रवार का दिन एक साथ पड़ा, तब धार की गलियों ने लाठीचार्ज और कर्फ्यू का तनाव भी झेला.आज भोजशाला केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास की परतों में लिपटा एक ज्वलंत प्रश्न है. सवाल आज भी वही खड़ा है कि जिस स्थान को राजा भोज ने विद्या और शांति के लिए समर्पित किया था, क्या वह कभी अपनी उस प्राचीन बौद्धिक गरिमा को पुनः प्राप्त कर पाएगा या उसकी पहचान हमेशा विवादों की स्याही से ही लिखी जाती रहेगी.
ये भी पढ़ें: भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, बसंत पंचमी की पूजा और जुमे की नमाज दोनों होगी

Featured Video Of The Day
Delhi Dehradun Expressway Inauguration: दिल्ली से देहरादून सिर्फ 2.5 घंटे! PM Modi आज करेंगे उद्घाटन