खतरे में दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी, MP-MLA ने सुनाई 3 साल की सजा, जानें पूरा मामला

Cooperative Bank Scam Datia: 2003 में बैंक प्रबंधन को इस गड़बड़ी की जानकारी मिली. जांच के दौरान राजेन्द्र भारती और उनकी मां को दोषी पाया गया. इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा और धीरे-धीरे यह एक बड़ा कानूनी विवाद बन गया.

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कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को 3 साल की सजा (फाइल फोटो)

Datia Cooperative Bank Scam: एक पुराने सहकारी बैंक घोटाले में कांग्रेस के विधायक राजेंद्र भारती को बड़ा झटका लगा है. दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने मध्य प्रदेश के दतिया से विधायक राजेंद्र भारती और उनके सह-आरोपी रघुवीर शरण प्रजापति को तीन वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई है. मामला करीब 25 साल पुराना है और इसमें फर्जीवाड़े व वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप सिद्ध हुए हैं. हालांकि अदालत ने दोनों दोषियों को अपील दायर करने के लिए 30 दिन की राहत देते हुए अंतरिम जमानत भी मंजूर की है. यह फैसला मध्य प्रदेश के राजनीतिक क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है.

Datia Cooperative Bank Scam: कांग्रेस विधायक को सुनाई गई सजा

25 साल पुराने घोटाले में दोष सिद्ध

राउज़ एवेन्यू स्थित एमपी-एमएलए विशेष कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद राजेंद्र भारती को दोषी करार दिया. अदालत ने पाया कि वर्ष 1998 से जुड़े इस सहकारी बैंक घोटाले में भारती की भूमिका प्रत्यक्ष और प्रभावशाली रही. अदालत ने सज़ा सुनाते हुए उन्हें तत्काल तिहाड़ जेल भेजने के आदेश दिए थे, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई.

मां के फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़ा मामला

इस केस की शुरुआत 24 अगस्त 1998 को हुई, जब राजेंद्र भारती की मां सावित्री श्याम ने दतिया के जिला सहकारी ग्रामीण विकास बैंक में 10 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी. यह एफडी 13.5 प्रतिशत की ऊंची ब्याज दर पर तीन साल के लिए कराई गई थी. उस समय राजेंद्र भारती बैंक के बोर्ड के चेयरमैन पद पर कार्यरत थे.

पद का दुरुपयोग कर बढ़ाई गई एफडी अवधि

अभियोजन पक्ष का कहना है कि भारती ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एफडी की अवधि पहले तीन साल से बढ़ाकर दस साल और फिर पंद्रह साल कर दी. इस दौरान एफडी पर वही ऊंची ब्याज दर लागू रही. आरोप है कि इससे बैंक को नुकसान हुआ और लाभ सीधे तौर पर भारती के परिवार को मिला.

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रिकॉर्ड्स से छेड़छाड़ और दस्तावेजों की जालसाज़ी

जांच में सामने आया कि एफडी की अवधि बढ़ाने के लिए बैंक के अहम दस्तावेजों जैसे लेजर बुक, एफडी काउंटर स्लिप और रसीदों से छेड़छाड़ की गई. अभियोजन के अनुसार, 1999 से 2011 के बीच राजेंद्र भारती और सह-आरोपी रघुवीर शरण प्रजापति ने मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए.

ऑडिट में खुला घोटाला, विभाग ने दर्ज कराई शिकायत

यह पूरा मामला तब सामने आया जब राजेंद्र भारती बैंक के बोर्ड से हटे और ऑडिट टीम ने बैंक खातों में गंभीर अनियमितताएं पकड़ीं. इसके बाद सहकारिता विभाग ने मामले की जांच कर अदालत में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर यह लंबी कानूनी लड़ाई चली.

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