प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, 13 साल की उम्र में ही अपनी आवाज का वर्चस्व जमाया

उस समय महिलाएं सिर्फ बैठकर 'वेदमती शैली' में गाती थीं. तीजन बाई पहली महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों की 'कापालिक शैली' चुनी और खड़े होकर दमदार आवाज़ में गाना शुरू किया.

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72 की उम्र में डॉ. तीजन बाई ने ली अंतिम सांस.
IANS
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  • प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई लंबे समय से बीमार थीं.
  • 27 मई को फेफड़ों में पानी, निमोनिया और लो BP के कारण AIIMS रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती थीं.
  • बड़े बेटे की मौत के सदमे के बाद BP की दवा बंद कर दी थी. इसके बाद 2024 में लकवा हो गया.

छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रायपुर के एम्स अस्पताल में निधन हो गया है. वह 70 वर्ष, 2 महीने और 11 दिन की थीं. 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गाँव में जन्मीं डॉ. तीजन बाई लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं. उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था. वह छत्तीसगढ़ की 'पारधी' अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं. बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी को छत्तीसगढ़ी हिंदी में महाभारत की कहानियां गाते सुनकर उन्हें ये कहानियां याद हो गई थीं, जिसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी लिया.

मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया था. उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर पंडवानी गाती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता है. तीजन बाई पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली 'कापालिक शैली' को चुना और खड़े होकर दमदार आवाज में प्रदर्शन करना शुरू किया.

देश के साथ विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सामने दीं शानदार प्रस्तुतियां

उनकी इस अनूठी प्रतिभा को प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना, जिसके बाद तीजन बाई का जीवन पूरी तरह बदल गया. उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं. उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का डंका बजाया.

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कई अवॉर्ड मिले, जापान से भी मिला पुरस्कार

कला के क्षेत्र में उनके इसी बेजोड़ योगदान के लिए भारत सरकार और अन्य संस्थाओं ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा. उन्हें साल 1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. इसके बाद साल 2018 में उन्हें प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जापानी पुरस्कार 'फुकुओका पुरस्कार' मिला और 2019 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से विभूषित किया गया. इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि भी दी गई थी.

लंबे समय से बेड पर थीं तीजन बाई

अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में वे काफी कठिन दौर से गुजरीं. बड़े बेटे की मौत के सदमे के बाद उन्होंने अपनी बीपी की दवाई लेना बंद कर दी थी, जिसके कारण साल 2024 में उन्हें अचानक पैरालिसिस यानी लकवा मार गया. तब से वह लगातार बीमारी से जूझ रही थीं, जिसकी वजह से उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था और वह लंबे समय से बेड पर थीं.

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हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होने के बाद उन्हें 27 मई को एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान रात 3:15 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली.

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