Bashir Badra Real Name: क्या आप जानते हैं बशीर बद्र का असली नाम? जानिए ‘बद्र’ शब्द का अर्थ और इसकी कहानी

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया. क्या आप जानते हैं कि उनका असली नाम क्या था और ‘बद्र’ शब्द का क्या अर्थ है? जानिए उनके नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी, उनकी शायरी का सफर...

विज्ञापन
Read Time: 3 mins

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी शायरी और उनका नाम हमेशा जिंदा रहेगा. उनके नाम के साथ जुड़ा ‘बद्र' सिर्फ एक उपनाम (तख़ल्लुस) नहीं, बल्कि उनकी शख्सियत और उनकी ग़ज़लों की खूबसूरती का आईना था. बहुत कम लोग जानते हैं कि बशीर बद्र का असली नाम कुछ और था और ‘बद्र' शब्द के पीछे भी एक खास मायने और कहानी छिपी हुई है. ऐसे में उनके निधन के साथ एक बार फिर उनका नाम और उससे जुड़ी दिलचस्प कहानी आपको जरूर जानना चाहिए. 

नहीं रहे उर्दू अदब के चमकते सितारे

दरअसल, मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 91 वर्ष के थे. उनके बेटे तैयब बद्र ने यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि बशीर बद्र ने अपने भोपाल स्थित घर में आखिरी सांस ली. उनके निधन से साहित्य और शायरी की दुनिया में शोक की लहर है.

अयोध्या से शुरू हुआ शायरी का सफर

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था. उनका असली नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू के शिक्षक के रूप में काम किया और यहीं से उनकी शायरी को पहचान मिलनी शुरू हुई. उनकी ग़ज़लों में भाषा की सादगी और गहराई उनका सबसे बड़ा हुनर था.

नाम के साथ ‘बद्र' क्यों जोड़ा? 

बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘बद्र' क्यों जोड़ा? पहले हम ये जान लेते हैं कि इसका मतलब क्या है? उर्दू-फारसी शायरी में ‘बद्र' शब्द का मतलब होता है पूरा चांद, जो खूबसूरती, रोशनी और ऊंचाई का प्रतीक माना जाता है.

Advertisement

बशीर साहब की शायरी भी बिल्कुल ऐसी ही थी साफ, चमकदार और दिल को छू लेने वाली. यही कारण है कि उन्होंने ‘बद्र' को अपने तख़ल्लुस (उपनाम) के रूप में चुना, जो उनकी शख्सियत और उनकी रचनाओं के मिजाज से मेल खाता था. 

दिल से जुड़ी शायरी, जो हर किसी को छू जाए

बशीर बद्र की शायरी आम इंसान के जज़्बात को बेहद आसान शब्दों में बयान करती थी. उनकी ग़ज़लों में प्यार, दर्द, उम्मीद और टूटन सब कुछ सादगी से नजर आता है.
उनका मशहूर शेर-  

Advertisement

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में”

आज भी समाज की सच्चाई को बयां करता है.

मेरठ दंगों ने बदल दी जिंदगी

अलीगढ़ के बाद बशीर बद्र मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष बने और करीब 17 साल तक वहां पढ़ाया. मेरठ में उनका एक खूबसूरत घर था, जहां उनकी जिंदगी भर की कमाई किताबें, गजलें और डायरी रखी थीं. लेकिन 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया. इस हादसे में उनका सब कुछ राख हो गया. इस सदमे ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया और उन्होंने काफी समय तक लिखना भी छोड़ दिया. बाद में उन्होंने उत्तर प्रदेश छोड़ दिया.

ये भी पढ़ें-
 

हजारों शेर जुबां पर रखने वाले बशीर बद्र को थी यादों को लील जाने वाली बीमारी! जानें कैसे डिमेंशिया छीन लेता है यादें

हजारों शेर जुबां पर रखने वाले बशीर बद्र को थी यादों को लील जाने वाली बीमारी! जानें कैसे डिमेंशिया छीन लेता है यादें

Advertisement
Featured Video Of The Day
Siddaramaiah Resigns: कर्नाटक में सिद्धारमैया के इस्तीफे को लेकर डिबेट में तीखी बहस! | DK Shivkumar