Indore Bhagirathpura Dirty Water Deaths: देश का सबसे साफ शहर उसकी एक बस्ती भगीरथपुरा इन दिनों शोक में डूबी है क्योंकि वहां गंदा पानी पीने से कई लोगों की मौत हो गई. सरकारी कागज़ों में मौतों की संख्या इक्कीस लिखी है, मोहल्ले के लोग पैंतीस गिनते हैं. लेकिन इन अंकों के बीच जो सच्चाई सांस लेती है, वह किसी रिपोर्ट में नहीं समाती. वह है दो साल की सिया प्रजापति जिसे घर में सब “लड्डू” कहकर पुकारते थे और एक आयुष्मान कार्ड, जो उसकी मृत्यु के दो दिन बाद सक्रिय हुआ.
बीमारी-गरीबी दोनों में आवाज धीमी होती है
लड्डू के पिता सिलाई का काम करते हैं, खाली समय में ऑटो भी चलाते हैं. परिवार के 3 सदस्य दो साल की बेटी सिया प्रजापति, पांच साल का बेटा शिवांश प्रजापति और पत्नी शामिल हैं, 27 दिसंबर, 2025 से एक्यूट डायरिया से पीड़ित थे. प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज के बाद पत्नी और बेटा ठीक हो गए, लेकिन बेटी की हालत शुरू में बेहतर होने के बावजूद बिगड़ती गई. इस दौरान मां सोनम ने अपनी हथेलियों पर कई बार जीवन और मृत्यु का स्पर्श महसूस किया है. वो 2018 में एक बेटे को खो चुकी हैं, दो बार गर्भपात सह चुकी हैं. इस बार जब लड्डू बीमार पड़ी, तो उन्होंने सोचा था यह बस दस्त है, दो-चार दिन में ठीक हो जाएगी. 27 दिसंबर से मोहल्ले में उल्टी-दस्त का प्रकोप फैल रहा था. लोग कहते हैं पानी खराब है. मगर बीमारी और गरीबी दोनों में आवाज़ धीमी होती है.
पिता की गोद उसकी एंबुलेंस बनी
पहले निजी डॉक्टर के पास गए 40-45 हज़ार रुपये खर्च हो गए. पत्नी और पांच साल का बेटा संभल गए, पर लड्डू की हालत बिगड़ती चली गई. बुखार 102 से नीचे नहीं उतरता था. पेट फूलता जा रहा था. उल्टियां रुकती नहीं थीं. एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल चाचा नेहरू,फिर एमवाय और अंत में सुपर स्पेशलिटी. पंद्रह दिनों तक पिता की गोद ही उसकी एम्बुलेंस बनी रही.
...फिर नींद कभी नहीं टूटी
इन दिनों एक और दौड़ चल रही थी आयुष्मान कार्ड की. “तकनीकी दिक्कत” बताई गई. आधार से लिंक नहीं है. शिकायतें की गईं, सीएम हेल्पलाइन पर दो बार गुहार लगाई.
मंगलवार की सुबह, वेंटिलेटर पर डाले जाने के छह घंटे बाद, लड्डू ने आख़िरी साँस ली. मां ने उसके माथे को चूमा, जैसे नींद से जगाने की कोशिश कर रही हों. पर वह नींद अब कभी नहीं टूटनी थी.
“आपका आयुष्मान कार्ड सक्रिय हो गया है”
पिता की आवाज़ कांप गई “अब क्या करूँ उस कार्ड का? मेरी गुड़िया चली गई. मैं मुआवज़ा नहीं चाहता. बस चाहता हूं, किसी और मां-बाप को यह दिन न देखना पड़े.” उसके पिता ने एनडीटीवी को फोन पर बताया “मैंने शुरू में प्राइवेट क्लीनिक में उसके इलाज पर 40,000 से 45,000 रुपये खर्च किए, साथ ही सरकारी अस्पतालों में जांच पर भी, क्योंकि हमारे आयुष्मान कार्ड में कुछ टेक्निकल दिक्कतें थीं. मैंने कार्ड को दोबारा एक्टिवेट करवाने के लिए पिछले हफ्ते दो बार CM हेल्पलाइन पोर्टल पर शिकायत की, मुझे बुधवार को बताया गया कि कार्ड सक्सेसफुली दोबारा एक्टिवेट हो गया है. लेकिन अब मैं इसका क्या करूंगा क्योंकि मैंने अपनी गुड़िया (बेटी) को हमेशा के लिए खो दिया है. मैं यह सब सरकारी मुआवजा पाने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि बस एक बेटी को खोने का दर्द बता रहा हूं ताकि यह पक्का हो सके कि भविष्य में किसी और परिवार को अपने किसी अपने, खासकर बच्चे को न खोना पड़े.”
Indore Dirty Water: दो साल की सिया प्रजापति अब इस दुनिया में नहीं है. इस परिवार को ऐसा दर्द मिला है जिसे मिटा पाना शायद नामुमकिन है.
अब इस 'आयुष्मान कार्ड' का क्या करें?
सोनम अपने मोबाइल में वह वीडियो दिखाती हैं, जिसमें लड्डू कुछ घंटे पहले तक हंस रही थी, खेल रही थी. फिर आँसू पोंछते हुए कहती हैं, “मैंने आधार दे दिया था.हमें क्या पता था कि इतना चक्कर लगाना पड़ेगा.अब कह रहे हैं आयुष्मान हो गया.बताइए, किसके लिए?” मैंने समग्र आईडी और आधार कार्ड सब दो दिन पहले ही दे दिया था बस मुझे नहीं पता था कि आयुष्मान में इतनी दिक्कत आएगी नहीं तो हम लोग पहले से ही करवा कर रख.ते आयुष्मान के लिए इतना लटके हम लोग लेकिन वह नहीं हो पाया, अब कल फोन लगाकर बताया की आयुष्मान हो गया तो अब बताओ हम क्या करेंगे मेरी गुड़िया तो चली गई अब तो वापस नहीं आएगी ... मैं कुछ नहीं चाहती बस इतना चाहती हूं कि जैसे मेरी गुड़िया गई किसी का बच्चा ना जाए, उस मां से पूछो जिसका बच्चा चला जाता है.”
'एक्स-रे भी मोबाइल पर दिया, प्रिंट नहीं"
सोनम ने बताया- उसको दस्त और उल्टी रुक नहीं रहे थे और बुखार भी 102 डिग्री 103 डिग्री से नीचे जा ही नहीं रहा था तो हम लोग उसको चाचा नेहरू अस्पताल लेकर गए. वहां एडमिट किया फिर खून की जांच की और कहा सब नॉर्मल है फिर हमने कहा कि पेट इसका ज्यादा फूल रहा है तो उन्होंने कहा कि एक्सप्रेस सोनोग्राफी करो तो फिर हमने उसे कराया. इसके बाद उन्होंने कहा- इनको हम रेफर कर रहे हैं स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल में. इसके बाद हमने दोबारा गुजारिश की तो उन लोगों ने इलाज किया जिससे बच्ची नॉर्मल दिखने लगी.
बाद में हमसे कहा गया कि तुम्हारा आयुष्मान कार्ड आधार से लिंक नहीं है. हम बहुत दौड़े नहीं हुआ कल फोन आया कि आयुष्मान लिंक हो गया तो अब क्या मतलब है इस कार्ड का.आयुष्मान के कारण उन्होंने हमें एक एक्स-रे तक हाथ में नहीं दिया. मोबाइल पर दिया बोला कि आयुष्मान रहेगा तभी एक्स-रे की कॉपी देंगे.” MY हॉस्पिटल में पीडियाट्रिक सर्जरी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अशोक लड्डा कहते हैं बच्ची के लिवर में पस था, ऑपरेशन हुआ, संक्रमण फैल गया. प्रशासन कहता है जाँच होगी, दोषी पाए गए तो सख़्ती होगी. इस मामले में एनडीटीवी ने इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा से सवाल पूछा तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा- अगर ऐसा है तो जांच करवा लेंगे अगर कोई देरी हुई है तो उसमें सख्त रहेंगे हमलोग.
दूसरी सबसे कम उम्र की बच्ची थी सिया
दो साल की बच्ची सिया, भागीरथपुरा इलाके की दूसरी सबसे कम उम्र की रहने वाली (पांच महीने के लड़के अव्यान साहू के बाद) है, जिसकी मौत दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में फैले जानलेवा डायरिया के बाद हुई है.
जबकि उनके परिवार वालों ने आरोप लगाया कि वह भी डायरिया के प्रकोप का शिकार हो गए थे, इंदौर में हेल्थ डिपार्टमेंट ने कहा कि उन्हें सांस की गंभीर दिक्कतें थीं और उनके परिवार वाले उन्हें हॉस्पिटल की सलाह के खिलाफ सोमवार को घर ले गए. कुछ घंटे बाद उनके घर पर उनकी मौत हो गई.
प्रशासन तो 16 मौतों की बात मानता है
खास बात यह है कि दिसंबर 2025 में डायरिया फैलने के बाद भागीरथपुरा के 35 लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन अधिकारियों ने डेथ ऑडिट कमिटी के नतीजों के आधार पर, उनमें से सिर्फ़ 16 मौतों को ही डायरिया फैलने की वजह माना है जिसे MP हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने नहीं माना है. MP हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुशील चंद्र गुप्ता की अगुवाई में एक सदस्यीय कमीशन हाल ही में MPHC की इंदौर बेंच ने भागीरथपुरा के पानी के खराब होने और इंदौर के दूसरे हिस्सों पर इसके असर से जुड़े सभी मामलों की जांच के लिए बनाया है.
वो बेटी अब लौट कर नहीं आएगी
पर इन सबके बीच एक घर है, जहां अब खिलौनों की खनक नहीं सुनाई देती. जहां सिलाई मशीन की घर्र-घर्र में सिसकियाँ घुल जाती हैं... जहां एक आयुष्मान कार्ड अब भी मोबाइल में “एक्टिव” दिखता है, पर वह उस जीवन को सक्रिय नहीं कर सकता, जो बुझ चुका है. कभी-कभी व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी उसकी उदासीनता होती है. वह देर से पहुंचती है इतनी देर से कि दरवाज़ा खुलते-खुलते घर उजड़ चुका होता है. भगीरथपुरा की गलियों में अब भी लोग पानी भरते हैं, बच्चे खेलते हैं. पर एक माँ की आँखों में स्थायी सूना-सा अंधेरा उतर आया है. लड्डू की उम्र दो साल थी और उसकी कहानी पूछती है क्या स्वच्छता के तमगों से अधिक ज़रूरी नहीं है संवेदना की सफ़ाई? क्योंकि कार्ड दो दिन बाद भी बन सकता है. पर एक बेटी वह लौटकर नहीं आती.
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