क्या बच्चों पर सोशल मीडिया बैन संभव है? डॉक्टर ने बताई असली मुश्किल

स्कूलों में अब यह शिकायत आम हो गई है कि बच्चे बिना लगातार डिजिटल उत्तेजना के पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं. नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के मनोचिकित्सक डॉ. यतन पाल सिंह बलहारा, जिन्होंने सोशल मीडिया की लत पर काफी काम किया है, चेतावनी दे चुके हैं कि ये प्लेटफॉर्म जानबूझकर इस तरह बनाए जाते हैं कि वे युवाओं को अपने साथ बांधे रखें.

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बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध अच्छा कदम.

Social Media Ban: कर्नाटक और आंध्र प्रदेश द्वारा बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में उठाए गए कदम भारत के तेजी से बदलते डिजिटल परिदृश्य में अब तक के सबसे साहसिक नीतिगत हस्तक्षेपों में से एक माने जा रहे हैं. कर्नाटक ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा है, जबकि आंध्र प्रदेश ने 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया की पहुंच रोकने की योजना घोषित की है, जिसे भविष्य में 16 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है.

दोनों राज्यों का उद्देश्य साफ है—बढ़ती स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की लत, खासकर छोटे वीडियो या “रील्स” के बढ़ते प्रभाव को रोकना, जो बच्चों और किशोरों की ध्यान क्षमता को लगातार प्रभावित कर रहे हैं. इस कदम के पीछे की मंशा पर कोई संदेह नहीं है. देश भर में शिक्षक, अभिभावक और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात को लेकर चिंता जता रहे हैं कि यह एक नई तरह की मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है. एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट और तुरंत मिलने वाले मनोरंजन के कारण सोशल मीडिया की लत को चिंता, ध्यान की कमी, नींद की समस्या और पढ़ाई में गिरावट से जोड़ा गया है.

स्कूलों में अब यह शिकायत आम हो गई है कि बच्चे बिना लगातार डिजिटल उत्तेजना के पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं. नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के मनोचिकित्सक डॉ. यतन पाल सिंह बलहारा, जिन्होंने सोशल मीडिया की लत पर काफी काम किया है, चेतावनी दे चुके हैं कि ये प्लेटफॉर्म जानबूझकर इस तरह बनाए जाते हैं कि वे युवाओं को अपने साथ बांधे रखें. ऐसे में जिन बच्चों की मानसिक नियंत्रण क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है, उनके लिए आत्मनियंत्रण और भी मुश्किल हो जाता है. इस दृष्टि से देखा जाए तो बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार का हस्तक्षेप उसी तरह है जैसे पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अन्य नशे से जुड़ी आदतों पर नियंत्रण के प्रयास किए गए थे. डॉ. बलहारा AIIMS में साइबर डी-एडिक्शन क्लिनिक भी चलाते हैं.

हालांकि शुरुआती सराहना के बाद अब इस फैसले को लागू करने और निगरानी से जुड़े कठिन सवाल सामने आने लगे हैं. भारत की व्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास मौजूद है. देश में सिम कार्ड खरीदने की कानूनी उम्र 18 वर्ष है, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि बड़ी संख्या में नाबालिगों के पास पहले से ही निजी मोबाइल नंबर हैं. कई बच्चे अनौपचारिक या अवैध माध्यमों से सिम कार्ड प्राप्त कर लेते हैं, या फिर माता-पिता, रिश्तेदारों या घरेलू सहायकों के नाम पर लिए गए सिम का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से इंटरनेट तक उनकी पहुंच अपने आप खत्म नहीं होती. बल्कि यह उन्हें और अधिक अनियंत्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर धकेल सकता है, जहां निगरानी और भी कम होती है.

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स्थिति तब और दिक्कत से भरी हो जाती है जब वाई-फाई के होना आज के समय में बेहद जरूरी हो गया है. शहरी और अर्ध-शहरी भारत में बच्चे घर के ब्रॉडबैंड, स्कूल नेटवर्क, पब्लिक वाई-फाई या मोबाइल हॉटस्पॉट के जरिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं. ऐसे में उम्र के आधार पर इंटरनेट की निगरानी करना तकनीकी और व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है. भौतिक वस्तुओं की तरह डिजिटल पहुंच को आसानी से जब्त या बंद नहीं किया जा सकता. कई नीति विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिबंध आधारित नीतियां अक्सर व्यवहारिक जीवन की वास्तविकताओं से टकराते ही कमजोर पड़ जाती हैं. इस मुद्दे का एक पीढ़ीगत पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान स्कूल जाने वाले बच्चों की पूरी पीढ़ी स्मार्टफोन के साथ बड़ी हुई है. लगभग दो वर्षों तक ऑनलाइन क्लास, रिकॉर्डेड लेक्चर, यूट्यूब के शैक्षिक चैनल और एक्सप्लेनर वीडियो पढ़ाई का सामान्य हिस्सा बन गए थे.

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इस पीढ़ी के लिए स्मार्टफोन केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सीखने, संवाद करने और भावनात्मक सहयोग पाने का माध्यम भी बन चुका है. इसलिए सवाल सिर्फ सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि उस पीढ़ी को इन आदतों से कैसे दूर किया जाए जिन्हें एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट के दौरान स्वयं प्रोत्साहित किया गया था. पहचान सत्यापन का मुद्दा भी इस बहस को जटिल बनाता है. पहले सरकार ने सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से जोड़ने का विचार रखा था ताकि उपयोगकर्ता की पहचान और उम्र की पुष्टि की जा सके. समर्थकों का मानना था कि इससे नाबालिग उपयोगकर्ताओं को आसानी से रोका जा सकता है.

पूरी तरह से खराब है सोशल मीडिया?

लेकिन आलोचकों ने गोपनीयता, निगरानी और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं जताईं. इन आपत्तियों के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका, और आज भी भारत के विकसित हो रहे डेटा संरक्षण ढांचे के संदर्भ में ये चिंताएं प्रासंगिक बनी हुई हैं. इसके साथ ही यह मान लेना भी गलत होगा कि सोशल मीडिया पूरी तरह हानिकारक है. आज बड़ी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा अच्छी तरह बनाए गए वीडियो, छोटे एक्सप्लेनर और शैक्षिक कंटेंट क्रिएटर्स के जरिए इन्हीं प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है. छात्र अक्सर इनका उपयोग कठिन विषयों को समझने, पढ़ाई दोहराने या पाठ्यपुस्तकों से परे अपनी रुचियों को विकसित करने के लिए करते हैं.

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ऐसे में पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से बच्चों को नुकसानदेह कंटेंट के साथ-साथ फायदेमंद शैक्षिक संसाधनों से भी दूर किया जा सकता है.

सोशल मीडिया बैन करने के नुकसान 

इतिहास भी एक महत्वपूर्ण सबक देता है. नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध होने के बावजूद दुनिया भर में उनकी लत खत्म नहीं हुई है. केवल प्रतिबंध से मांग समाप्त नहीं होती, बल्कि अक्सर उसका स्वरूप बदल जाता है. यही जोखिम यहां भी है. मुख्य प्लेटफॉर्म से दूर किए गए बच्चे अज्ञात ऐप्स, फर्जी अकाउंट या साझा कंटेंट की ओर जा सकते हैं, जिन पर माता-पिता और शिक्षकों की निगरानी और कठिन हो जाती है.

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क्या करें

फिर भी कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कदम ने बच्चों के डिजिटल स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय स्तर की बहस शुरू कर दी है, जो अपने आप में महत्वपूर्ण है. अब चुनौती यह है कि केवल प्रतिबंध तक सीमित रहने के बजाय अधिक संतुलित और व्यावहारिक समाधान खोजे जाएं.

बच्चों को जिम्मेदार डिजिटल उपयोग के बारे में शिक्षित करना, माता-पिता और शिक्षकों को लत के संकेत पहचानने के लिए तैयार करना, और प्लेटफॉर्म को उनकी लत बढ़ाने वाली डिज़ाइन के लिए जवाबदेह बनाना शायद अधिक टिकाऊ रास्ता साबित हो सकता है.

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जैसे-जैसे समाज इस नए तरह के डिजिटल नशे से जूझ रहा है, असली लक्ष्य तकनीक को पूरी तरह ठुकराना नहीं बल्कि सुरक्षा, स्वतंत्रता और जागरूक उपयोग के बीच सही संतुलन बनाना होना चाहिए.

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