Cycling Cities: सुबह ऑफिस जाने के लिए आप क्या चुनते हैं? बाइक, कार या कैब? लेकिन दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां लोग ऑफिस जाने के लिए सीधे साइकिल उठाते हैं और निकल पड़ते हैं. यही छोटी-सी आदत उन लोगों को बहुत बड़ा फायदा देती दिख रही है. वे शहर जहां रोजमर्रा की जिंदगी में साइकिल शामिल है, वहां मोटापे के आंकड़े लगातार कम देखने को मिलते हैं. यूरोप के कई शहरों पर हुए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि जो लोग रोज साइकिल से यात्रा करते हैं, उनका BMI सबसे कम होता है. यह रिसर्च एनवायरनमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुई, जिसमें सात यूरोपीय शहरों के 2000 से ज्यादा लोगों को लंबे समय तक ट्रैक किया गया. इसमें साफ दिखा कि साइकिल चलाने वालों का वजन कार चलाने वालों की तुलना में कम रहता है.
स्टडी कहती हैं कि शहरों में साइकिल चलाने का ट्रेंड विकसित हुआ वहां कई लोग कार छोड़कर साइकिल पर आए. आंकड़े बताते हैं कि उनका वजन भी घटा. पुरुषों में औसतन करीब 0.75 किलो वजन कम हुआ और BMI में भी गिरावट दर्ज की गई. यानी रोज की यात्रा में साइकिल जोड़ना सीधे-सीधे शरीर पर असर डालता है.
शहर जहां की सेहत साइकिल ने सुधार दी | Which Cities Have Had Their Health Improved by the Bicycle
एम्स्टर्डम (Amsterdam), नीदरलैंड
यह शहर साइकिल कल्चर के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. यहां बड़ी आबादी रोजमर्रा के कामों के लिए साइकिल का इस्तेमाल करती है.
कोपेनहेगन (Copenhagen), डेनमार्क
साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में यह शहर सबसे आगे माना जाता है. यहां सुरक्षित साइकिल ट्रैक और अलग लेन इसे बेहद आसान बनाते हैं.
बर्लिन (Berlin), जर्मनी
बर्लिन में भी तेजी से साइकिल का चलन बढ़ा है. वो इसलिए भी कि शहर में साइकिल फ्रेंडली रास्तों और सुविधाओं का विस्तार किया गया है.
बार्सिलोना (Barcelona), स्पेन
यह शहर भी साइकिल को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है. यहां पब्लिक बाइक सिस्टम और साइकिल ट्रैक ने इसे लोकप्रिय बनाया है.
पेरिस (Paris), फ्रांस
पिछले कुछ सालों में पेरिस ने साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर पर काफी काम किया है. अब यहां बड़ी संख्या में लोग साइकिल को रोजमर्रा के सफर के लिए अपना रहे हैं.
इन शहरों में सिर्फ लोगों की आदत ही नहीं, बल्कि सिस्टम भी साइकिल के पक्ष में काम करता है. अलग साइकिल लेन, सुरक्षित रास्ते, पार्किंग और कम दूरी पर जरूरी सुविधाएं, ये सब मिलकर साइकिल चलाना आसान बनाते हैं. जिन देशों में लोग रोजमर्रा के कामों के लिए पैदल या साइकिल का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, वहां मोटापा और डायबिटीज के मामले कम होते हैं. यानी एक्टिव ट्रैवल सिर्फ फिटनेस नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ से जुड़ा बड़ा फैक्टर है.
भारत में तस्वीर बिल्कुल उलट:
अब भारत की बात करें तो तस्वीर उलटी नजर आती है. यहां शहर तेजी से कार-डिपेंडेंट होते जा रहे हैं. साइकिल को अक्सर मजबूरी का साधन माना जाता है, न कि रोजमर्रा के स्मार्ट ट्रांसपोर्ट के रूप में. नतीजा यह है कि फिजिकल एक्टिविटी कम होती जा रही है और मोटापा बढ़ रहा है.
एक और बड़ी वजह है इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी. ज्यादातर शहरों में सुरक्षित साइकिल ट्रैक नहीं हैं, ट्रैफिक ज्यादा है और साइकिल चलाना जोखिम भरा माना जाता है. ऐसे में लोग चाहकर भी इसे अपने रूटीन का हिस्सा नहीं बना पाते.
सीधी बात यह है कि जहां शहरों ने साइकिल को अपनाया, वहां लोगों का वजन कंट्रोल में रहा और हेल्थ बेहतर हुई और जहां सड़कों पर सिर्फ गाड़ियां बढ़ीं, वहां कमर का घेरा भी बढ़ता गया. साथ ही पॉल्युशन भी बढ़ा. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन सा शहर आगे है, बल्कि यह है कि क्या भारतीय शहर भी अपनी सड़कों पर साइकिल के लिए जगह बना पाएंगे?