सत्यम- हम सत्य हैं, शिवम्- हम उत्कृष्ट हैं और सुंदरम- हम सुंदर हैं.
आत्मा सुंदर, सत्य और परोपकारी है. सुंदरता ईश्वर है और ईश्वर सत्य है. तो जहां भी आप सुंदरता देखते हैं, उसके पीछे एक चेतना होती है, जिससे पूरा ब्रह्मांड अस्तित्व में आ रहा है. यह हिन्दू संस्कृति का एक बहुत ही अनूठा पहलू है. ईश्वर या दिव्यता को सुंदरता के रूप में भी जाना जाता है. सुंदरता के रूप में दिव्यता पर किसी अन्य शास्त्र या संस्कृति में उतना बल नहीं दिया गया है, जितना हिन्दू संस्कृति में दिया गया है. निःसंदेह, प्रत्येक संस्कृति में एक जैसी सत्यता है और सुंदरता की बात की जाती है, लेकिन इस संस्कृति में दिव्यता के सौंदर्य पर अधिक बल दिया गया है.
समझने वाली एक मूल बात यह है कि आपका शरीर एक कोशिका से बना है. एक कोशिका आपका पूरा शरीर बन गई. उस कोशिका को ठीक-ठीक पता था कि आँखें कहाँ बनानी हैं, कान कहाँ बनाने हैं, गुर्दे कहां होने चाहिए और एक कोशिका स्वयं को कई अलग-अलग तरीकों से गुणा करती है - नाखून, बाल, जीभ, माँसपेशी, हड्डी और सब कुछ. क्या आपने कभी इस विषय में सोचा है? एक कोशिका ने गुणित होकर मानव शरीर के कई अंगों को बनाया. मानव शरीर एक है, फिर भी यह बहुत अलग है, इसकी प्रकृति और बनावट में विविधता है.
अनेकता में एकता सम्पूर्ण सृष्टि में समान है. सम्पूर्ण सृष्टि- सूर्य, चन्द्रमा , सितारे, वायु, बादल, जल, पृथ्वी- एक ही पदार्थ से बनी है. प्रत्येक वस्तु एक ही तत्व से बनी है. उस एक तत्व को शिव कहते हैं.
सर्वं शिवमयं जगत
सम्पूर्ण जगत शिव का ही एक रूप है. आप इसे किसी भी नाम से बुला सकते हैं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. सम्पूर्ण सृष्टि के पीछे मूल बात यही है.
हमारी चेतना, हमारा मन भी शिव तत्व से बना है.
शिव सिद्धांत क्या है? यह वैसा नहीं है, जैसा कि आप शिव के चित्रों में देखते हैं. चित्र शिव की नीली आकृति को ध्यान में बैठे हुए दिखाती हैं. शिव को नीले रंग में चित्रित किया गया है, क्योंकि वे आकाश की तरह अनंत हैं. हमारी चेतना आकाश की तरह पारदर्शी है, इतनी खाली और समुद्र की तरह इतनी भरी हुई. शिव अनंत चेतना हैं, यह बहुत सजग हैं. यह कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं है. यह बहुत जीवंत है, जीवन से भरपूर और सुंदर है.
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जब भी आप सुंदरता का अनुभव करते हैं, तो आप होशपूर्वक या अज्ञात में अपने मूल स्रोत के सम्पर्क में होते हैं. आप कहीं जाते हैं और कहते हैं, "यह जगह बहुत सुंदर है." वहां रहने वाले लोगों से पूछें. शायद वे मुंबई जैसा शहर पसंद करते हैंहों, जहां ऊंची इमारतें और व्यस्त जीवनशैली है. एक अनुभव से दूसरे में परिवर्तन के समय मन आपके भीतर के पहलू के सम्पर्क में आता है और आप कहते हैं, "अहा...! बहुत सुंदर!" वह "अहा...!" तब आता है जब मन ने अभी-अभी आत्मा को स्पर्श किया है.
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लेकिन फिर स्वयं को सौंदर्य के स्रोत के रूप में देखने की अपेक्षा आप उस स्थान को उत्तरदायी ठहराते हैं और कहते हैं, "ठीक है, मैं यहां रहना चाहता हूं." यदि आप यहां आकर रहेंगे, तो आप बोर हो जाएँगे. यदि आप कुछ दोहराते चले जाते हैं, तो आप ऊब जाते हैं, आपको पुनरावृत्ति में कोई आनंद नहीं मिलता.
केवल एक ही ऐसा कार्य है जो बार-बार करने से आनंद मिलता है और वह है- ध्यान. यही स्वयं (शिव) के सम्पर्क में होना है - सत्यम शिवम् सुंदरम.