जब आप सौंदर्य को देखते हैं, तो आपके भीतर कुछ घटित होता है. मानो जीवन-ऊर्जा का कोई स्रोत अचानक खुल जाता है और वह आपको रोमांच और आनंद से भर देता है. और फिर अगला भाव आता है- उस पर अधिकार जताने का. आप किसी सुंदर वस्तु या किसी आकर्षक व्यक्ति को देखते हैं, तो भीतर कुछ हिल जाता है, मन में कुछ जाग उठता है. मन बहुत अच्छा अनुभव करता है. और इसे अपना बना लेना चाहता है.
यहीं से समस्या शुरू होती है. जिस क्षण आप सौंदर्य को ‘अधिकार' में लेने की कोशिश करते हैं, उसी क्षण आप उसे कुरूप बना देते हैं. आप देखेंगे- सुंदर पत्नी होने पर भी पुरुष बाहर और सुंदरता खोजता रहता है. या स्त्रियाँ ऐसे पुरुषों की तलाश करती हैं जिनके कंधे चौड़े हों, नाक और लंबी हो, जो उनके वर्तमान साथी में नहीं है. इसका अंत कहाँ है? जिस क्षण आप उसे पा लेते हैं, उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है. फिर अगली खोज शुरू हो जाती है. पूरा जीवन इसी मृगतृष्णा के पीछे दौड़ बन जाता है,
तो फिर क्या करना चाहिए?
जब आप सौंदर्य देखें, तो उसे नमन करें, उसके प्रति समर्पित हो जाएँ. यदि आप सौंदर्य के प्रति समर्पण नहीं करते, तो आप उसे अधिकार में लेना चाहते हैं लेकिन हम सौंदर्य को कैसे अपने अधिकार में ले सकते हैं? जो आपसे बड़ा है, उसे आप कैसे अपना बना सकते हैं? ईश्वर सर्वाधिक सुंदर है. जब हम उसकी उपासना करते हैं. उस क्षण ‘अधिकार की भावना' स्वतः विलीन हो जाती है.
ईश्वर सदा युवा है, नित नूतन है. मुझे तो ईश्वर बहुत शरारती लगता है- उसे आनंद और खेल बहुत प्रिय हैं शायद इसीलिए उसने संसार में इतना खेल रचा है,चिंताएँ भी उसी खेल का हिस्सा हैं. यह जो चूहा-बिल्ली की दौड़ चल रही है, वह भी एक तरह का खेल ही है. जीवन स्वयं एक उत्सव है!
सौंदर्य को पहचानना, सौंदर्य से प्रेम करना और सौंदर्य के प्रति समर्पित होने से जीवन में नीरसता कभी नहीं आती. तब आध्यात्मिक साधना भी बोझ नहीं लगती. हम अक्सर सोचते हैं कि आध्यात्मिकता का अर्थ है गंभीर चेहरा, कठोर मुद्रा, और जितना अधिक दिखावा उतनी अधिक आध्यात्मिक उन्नति. ऐसा नहीं है. सहजता, सत्य में बढ़ना, आंतरिक सौंदर्य और आंतरिक मौन में उतरना-यही सच्ची आध्यात्मिकता है.
प्रेमी सोचते हैं कि वे प्रेम करते हैं, पर फिर कहते हैं- अब प्रेम नहीं रहा. प्रेम के उस आंतरिक स्रोत को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि हम भीतर उतरें, कुछ अंतराल रखें. मौन में हम अत्यंत गहराई से संवाद कर सकते हैं; हृदय से संवाद कर सकते हैं. यदि हम प्रतिदिन उस मौन के क्षेत्र में नहीं उतरते- सब कुछ एक ओर रखकर दस मिनट आकाश को नहीं निहारते, तारों को नहीं नमन करते,तो हम जीवन के अपार सौंदर्य से वंचित रह जाते हैं.
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किसी वस्तु को अधिकार में लेने की कोशिश न करें- उसकी सराहना करें. “यह स्वेटर मुझे अच्छा लगा”-इसका अर्थ यह नहीं कि “यह स्वेटर मुझे पहनना ही चाहिए.” आप अपने कपड़ों को स्वयं नहीं देख सकते और अपने दाँतों को भी नहीं देख सकते. किसी और के सुंदर दाँत आपकी आँखों के लिए उत्सव बन जाते हैं. जो हमारे पास है, उसे हम देख ही नहीं पाते. और जो हमारे पास नहीं है, वही हमें अधिक सुंदर लगता है. क्यों? क्योंकि मन में यह भ्रांति बैठी है कि जो सुंदर है, उसे अपने पास होना चाहिए.
यदि आप इस भ्रम को मन से अलग कर दें कि सुंदर वस्तु का अर्थ अधिकार नहीं है, वह सुंदर है, वह है, बस उसकी उपस्थिति ही आनंद है,तो आप वास्तव में सौंदर्य का अनुभव करने लगते हैं.
सौंदर्य के तीन स्तर होते हैं- संकेत, अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण.
आध्यात्मिकता संकेत देती है, कला उसका अभिव्यक्त रूप है, और विज्ञान उसका प्रकटीकरण करता है.