Gothic Gargoyles: डरावनी दिखने वाली गॉथिक इमारतों की रहस्यमयी कहानी, जहां देखने को मिलेगा इंजीनियरिंग, कला और आध्यात्मिकता का एक अद्भुत संगम

Gothic Gargoyles: गॉथिक वास्तुकला 12वीं सदी में फ्रांस में जन्मी मध्ययुगीन यूरोपीय शैली है, जो अपनी ऊंची, नुकीली मेहराबों, उड़ते बट्रेस और रंगीन कांच की बड़ी खिड़कियों के लिए जानी जाती है, जिससे इमारतें आसमान की ओर उठती और विशाल दिखती हैं.

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गॉथिक इमारतों के रहस्यमयी कहानी
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Gothic Gargoyles: यूरोप की पुरानी गॉथिक कैथेड्रल्स, किले और मध्यकालीन चर्चों में लगे अजीब, डरावने और काल्पनिक आकृतियों वाले पत्थर के शिल्प 'गार्गॉयल्स' आज भी दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करते हैं. देखने में भले ही ये डरावने लगते हों, लेकिन ये सिर्फ सजावटी मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि इंजीनियरिंग, कला और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है. ये पत्थर की मूर्तियां सदियों से खड़े भवनों की कहानी और उस समय की कल्पना शक्ति को दिखाती हैं.

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गॉथिक वास्तुकला क्या है?

गॉथिक वास्तुकला 12वीं सदी में फ्रांस में जन्मी मध्ययुगीन यूरोपीय शैली है, जो अपनी ऊंची, नुकीली मेहराबों, उड़ते बट्रेस और रंगीन कांच की बड़ी खिड़कियों के लिए जानी जाती है, जिससे इमारतें आसमान की ओर उठती और विशाल दिखती हैं, जैसे कि भव्य गिरिजाघर और महल आदि. गॉथिक वास्तुकला के शुरुआती दौर लगभग 12वीं से 16वीं शताब्दी में बड़े चर्चों और कैथेड्रल्स में बारिश का पानी एक बड़ी चुनौती था. छत से बहने वाला तेज पानी दीवारों को नुकसान पहुंचा सकता था. इस समस्या का अनोखा समाधान निकला गया, जिसमें ऐसी मूर्तियां तैयारी की गई जिनके मुंह से पानी बाहर निकले. इन पत्थर की आकृतियों के खुले मुंह और लम्बे शरीर इस प्रकार बनाए जाते थे कि वे बारिश का पानी दीवारों से दूर फेंक दें, जिससे इमारत का ढांचा सुरक्षित रहे.

Photo Credit: wikipedia

“Gargoyle” शब्द फ़्रेंच शब्द gargouille से आता है, जिसका अर्थ है “गला” या “नाली,” जो इन मूर्तियों के जल-निकास कार्य को दर्शाता है, जो मूर्तियां पानी नहीं गिरातीं उन्हें गार्गॉयल नहीं, बल्कि “ग्रोटेस्क” कहा जाता है. कारीगरों ने उनमें रचनात्मकता जोड़ना शुरू किया. धीरे-धीरे ये शिल्प ड्रैगन, राक्षस, आधे‑मानव जीव, पक्षी तथा कई काल्पनिक प्राणियों के रूप में बदलने लगे. इसके अलावा इमारतों में ऐसे ग्रोटेस्क और डरावने शिल्प भी लगाए जाते थे, जिनका जल-निकास से कोई संबंध नहीं था. इनका उद्देश्य था भवन को एक दृश्य कहानी में बदलना, जहां दीवारें सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं और मध्यकालीन संदेशों की किताब बन जाती थीं.

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आस्था का महत्व

मध्यकालीन समय में जब अधिकतर लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, चर्च अपने संदेश मूर्तियों के माध्यम से देते थे. गार्गॉयल्स की विकृत आकृतियां, बड़े मुंह और राक्षसी चेहरे अक्सर बुराई, पाप या अराजकता के प्रतीक माने जाते थे. चर्च की दीवारों के बाहर इनका होना यह याद दिलाता था कि पवित्र स्थल सुरक्षित है और बुराई बाहर खड़ी है. कई लोग मानते थे कि ये मूर्तियां नजर-बद या बुरी आत्माओं को दूर रखने का काम करती हैं.

आज भी क्यों महत्वपूर्ण हैं गार्गॉयल्स

गार्गॉयल्स उस युग की इंजीनियरिंग और कला दोनों की मिसाल हैं. उन्होंने दिखाया कि व्यावहारिक जरूरत यानी नाली को भी सुंदर और प्रतीकात्मक रूप दिया जा सकता है. इन मूर्तियों ने इमारतों को न सिर्फ संरक्षित रखा, बल्कि उन्हें कहानियों से भी भर दिया. आज भी ये मूर्तियां साहित्य, फिल्मों और कला में लोकप्रिय हैं. उनकी रहस्यमयी आकृतियाँ, बारीक नक्काशी और सदियों से खड़े रहने की क्षमता मध्यकालीन कारीगरी और विश्वास को दर्शाती है.

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