गाजियाबाद में 3 बहनों की आत्महत्या की खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है, क्या हम अपने बच्चों को सच में समझ पा रहे हैं? आज के समय में पढ़ाई का दबाव, इंटरनेट का बहुत ज्यादा इस्तेमाल, अकेलापन और भावनात्मक संवाद की कमी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही है. ऐसे में एक्सपर्ट्स की राय समझना बेहद जरूरी हो जाता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
इस मामले पर डॉक्टर हेमा रत्नानी का कहना है कि आज के बच्चे बहुत कम उम्र में ही ऐसी चीजों से रूबरू हो रहे हैं, जिनके लिए उनका दिमाग तैयार नहीं होता. इंटरनेट, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन टाइम बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है. कई बार बच्चे घंटों ऑनलाइन रहते हैं, जिससे उनकी नींद, पढ़ाई और मानसिक संतुलन बिगड़ता है. डॉक्टर हेमा के अनुसार, बच्चों के लिए रोज 8-10 घंटे की नींद बेहद जरूरी है, लेकिन देर रात तक मोबाइल या इंटरनेट इस्तेमाल करने से यह संभव नहीं हो पाता.
वे यह भी बताती हैं कि कई बार बच्चे इंटरनेट पर ऐसी जानकारी या कंटेंट देख लेते हैं, जिसे वे सही-गलत के रूप में समझ नहीं पाते. धीरे-धीरे उनके मन में डर, भ्रम या निराशा घर करने लगती है. माता-पिता अक्सर इसे बच्चों की जिद या टाइम पास समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यही आदतें आगे चलकर गंभीर मानसिक परेशानी का कारण बन सकती हैं.
लिखावट बहुत कुछ बताती है?
सीनियर फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉक्टर अमरनाथ मिश्रा इस घटना को एक अलग नजरिए से देखते हैं. उनके मुताबिक, किसी भी सुसाइड केस में बच्चे की लिखावट, ड्रॉइंग और व्यवहार बहुत कुछ बताता है. लिखने का तरीका, अक्षरों का आकार, दबाव, कैपिटल या छोटे अक्षरों का इस्तेमाल ये सभी बातें बच्चे के मन की स्थिति को दर्शा सकती हैं. अगर लिखावट में अचानक बदलाव आए, गुस्सा, जल्दबाजी या असामान्य पैटर्न दिखे, तो यह संकेत हो सकता है कि बच्चा अंदर ही अंदर किसी तनाव से गुजर रहा है. गाजियाबाद में हुई घटना में बच्चों ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था.
बच्चों की चुप्पी को कैसे समझें माता-पिता?
डॉक्टर मिश्रा का कहना है कि बच्चे अक्सर अपनी परेशानी खुलकर नहीं बताते. अगर उनकी बात नहीं सुनी जाती या बार-बार टाल दी जाती है, तो वे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं. यही अकेलापन धीरे-धीरे उन्हें गलत कदम की ओर धकेल सकता है. इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी बनती है कि वे सिर्फ बच्चों के रिजल्ट या अनुशासन पर ही नहीं, बल्कि उनके व्यवहार, दोस्तों, क्लास टीचर और रोजमर्रा की आदतों पर भी ध्यान दें.
एक्सपर्ट्स की राय में सबसे जरूरी बात है संवाद. बच्चों के साथ बैठकर बात करना, उनकी बात बिना जज किए सुनना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं. अगर बच्चे के व्यवहार में उदासी, चिड़चिड़ापन, अचानक चुप्पी या पढ़ाई में गिरावट दिखे, तो इसे हल्के में न लें. समय पर काउंसलिंग और सही मार्गदर्शन कई जिंदगियां बचा सकता है.
गाजियाबाद की यह घटना हमें यह सिखाती है कि बच्चों की चुप्पी को समझना, उनके मन की बात पढ़ना और समय रहते मदद करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.
मनोवैज्ञानिक डॉ. कपिल कक्कड़ के अनुसार, इस पूरी घटना में तीन-चार अहम फैक्टर नजर आते हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है:
1. बच्चों का स्कूल न जाना और सोशल कटाव
डॉ. कपिल बताते हैं कि जब कोई बच्चा स्कूल जाना बंद कर देता है, तो वह सिर्फ पढ़ाई से ही नहीं कटता, बल्कि अपने सोशल सर्कल से भी अलग हो जाता है.
स्कूल बच्चों के लिए केवल पढ़ाई की जगह नहीं होता, बल्कि वहां वे टीचर्स और दोस्तों के साथ बातचीत करके अलग-अलग नजरिए सीखते हैं. इससे उनकी सोच विकसित होती है. घर में लगातार बंद रहना और बाहर की दुनिया से कट जाना बच्चों के मानसिक विकास के लिए खतरनाक हो सकता है.
2. इम्प्रेशनेबल उम्र और भावनात्मक असंतुलन
डॉ. कपिल कक्कड़ समझाते हैं कि बचपन और किशोरावस्था एक इम्प्रेशनेबल एज होती है. इस उम्र में बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता. ब्रेन के अंदर एक हिस्सा होता है जिसे एमिग्डाला कहा जाता है, जो भावनाओं को नियंत्रित करता है। यह हिस्सा जल्दी मैच्योर हो जाता है. वहीं दूसरी ओर, प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स जो सही-गलत का फैसला लेने, सोचने-समझने और परिणामों को आंकने का काम करता है, वह काफी देर से विकसित होता है. इस वजह से बच्चों में इमोशनल इम्बैलेंस होना स्वाभाविक है और वे कई बार बिना परिणाम सोचे फैसले ले लेते हैं।
3. डोपामाइन और डिजिटल एडिक्शन
डॉ. कपिल बताते हैं कि बच्चों में डिजिटल एडिक्शन की एक बड़ी वजह है डोपामाइन. डोपामाइन दिमाग का वह केमिकल है, जो हमें इनाम मिलने की उम्मीद पर खुशी और उत्साह देता है. ऑनलाइन गेम्स और ऐप्स इसी साइकोलॉजी पर काम करते हैं नेक्स्ट लेवल, नया चैलेंज, नया रिवॉर्ड. हर बार डोपामाइन रिलीज होता है और बच्चा उसी में फंसता चला जाता है. चूंकि बच्चों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता, वे इस एडिक्शन को कंट्रोल नहीं कर पाते.
4. माता-पिता की भूमिका क्यों अहम है
डॉ. कपिल कक्कड़ के अनुसार, जब बच्चा स्कूल नहीं जाता, पूरा समय स्क्रीन पर बिताता है और सोशल इंटरैक्शन खत्म हो जाता है, तो उसकी मानसिक दुनिया सिमटने लगती है.
ऐसे में माता-पिता की भूमिका बेहद अहम हो जाती है:
- बच्चे किससे बात कर रहे हैं
- क्या देख रहे हैं
- कितना समय ऑनलाइन बिता रहे हैं
- उनके व्यवहार में कोई बदलाव तो नहीं
एक्सपर्ट्स की राय में सबसे जरूरी बात है संवाद. बच्चों के साथ बैठकर बात करना, उनकी बात बिना जज किए सुनना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं. अगर बच्चे के व्यवहार में उदासी, चिड़चिड़ापन, अचानक चुप्पी या पढ़ाई में गिरावट दिखे, तो इसे हल्के में न लें. समय पर काउंसलिंग और सही मार्गदर्शन कई जिंदगियां बचा सकता है.
गाजियाबाद की यह घटना हमें यह सिखाती है कि बच्चों की चुप्पी को समझना, उनके मन की बात पढ़ना और समय रहते मदद करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.