भारत नहीं, इस देश में सबसे कम उम्र तक जीते हैं लोग- जान लीजिए नाम

दुनिया के कई देश, खासकर सब सहारा अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्से, भारत से कम उम्र तक जीते हैं. नाइजीरिया, चाड और अफगानिस्तान में औसत जीवन प्रत्याशा 54-55 वर्ष है. जबकि भारत में ये लगभग 70 साल है.

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Country With Less Average Age: दुनिया के अलग अलग देशों में लोगों की औसत उम्र यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी काफी अलग अलग होती है. ये किसी देश की एजुकेशन, हेल्थ व्यवस्था और सोशल डेवलपमेंट को भी दर्शाती है. भारत में औसत जीवन प्रत्याशा यानी कि लाइफ एक्सपेक्टेंसी लगभग 70 वर्ष है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां लोग भारत से भी कम उम्र तक जीते हैं. खासतौर पर सब सहारा अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में हालात बेहद चिंताजनक हैं. गरीबी, बीमारियां और कमजोर स्वास्थ्य सेवाएं इन देशों में कम लाइफ एक्सपेक्टेंसी की बड़ी वजह हैं.

सबसे कम लाइफ एक्सपेक्टेंसी वाले देश

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया में सबसे कम उम्र तक जीने वाले देशों में कई अफ्रीकी और एशियाई देश शामिल हैं.

• नाइजीरिया: यहां लोगों की औसत उम्र लगभग 54 वर्ष है.

• चाड: औसतन लोग 55 वर्ष तक ही जी पाते हैं.

• सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक: यहां लाइफ एक्सपेक्टेंसी करीब 57 से 58 वर्ष है.

• दक्षिण सूडान: अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार यहां औसत उम्र 58 से 60 वर्ष के बीच है.

• अफगानिस्तान: ये भी दुनिया के सबसे कम लाइफ एक्सपेक्टेंसी वाले देशों में शामिल है. जहां औसत उम्र करीब 54 वर्ष है.

हेल्थ और स्वच्छता की बड़ी भूमिका

इन देशों में साफ पानी, न्यूट्रीशन और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है. मलेरिया, टीबी, एचआईवी/एड्स और डायरिया जैसी बीमारियां यहां आम हैं. जो समय पर इलाज न मिलने के कारण जानलेवा बन जाती हैं.

गरीबी और शिक्षा की कमी

गरीबी का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है. जब परिवारों के पास पर्याप्त भोजन और शिक्षा नहीं होती, तो बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी कम हो जाती है. शिक्षा की कमी के कारण हेल्थ अवेयरनेस भी सीमित रहती है.

भारत की स्थिति क्यों बेहतर?

भारत में अब भी कई चुनौतियां हैं. लेकिन वैक्सीनेशन, सरकारी हेल्थ स्कीम्स और शिक्षा में सुधार से औसत लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़कर लगभग 70 वर्ष तक पहुंच गई है.

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क्या सीखा जा सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन पर ध्यान देकर ही किसी देश की लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़ाई जा सकती है. ये मुद्दा न सिर्फ विकासशील देशों, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सीख है.

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